फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   modi sarkar did not follow surpreme court decision

क्या SC का फैसला नहीं मानेगी मोदी सरकार?

Thu, 19 Jun 2014 11:47 AM IST
Updated Thu, 19 Jun 2014 11:47 AM IST
विज्ञापन
modi sarkar did not follow surpreme court decision

संप्रग सरकार के कार्यकाल में नियुक्त राज्यपालों को हटाने की कोशिशों ने एक बार फिर निजाम बदलने के साथ गवर्नरों को बदले जाने की राजनीतिक बहस छेड़ दी है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने मई, 2010 में इस खेल पर विराम लगा दिया था।

विज्ञापन


सर्वोच्च अदालत की संविधान पीठ ने फैसले में कहा था कि मनमाने ढंग से राज्यपालों को हटाया नहीं जा सकता। यदि बाध्यकारी कारणों के बिना राज्यपाल को हटाया गया तो उस निर्णय पर न्यायिक पुनर्विचार किया जा सकता है।
विज्ञापन


यूपी के राज्यपाल बीएल जोशी इस्तीफा दे चुके हैं। उनके मामले में अब तक आधिकारिक तौर पर कोई विवादित कारण सामने नहीं आया है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

modi sarkar did not follow surpreme court decision

माना जा रहा है कि केंद्र के दबाव के चलते संप्रग के समय नियुक्त अन्य राज्यपाल भी पद छोड़ देंगे। जबकि सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 7 मई, 2010 को व्यवस्था दी थी कि किसी राज्यपाल को सिर्फ बाध्यकारी कारणों से ही बदला जा सकता है और वह भी तब जबकि उनके खिलाफ दुराचरण या अनियमितता का मामला साबित हो चुका हो।

सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि राज्यपाल, राष्ट्रपति की ओर से नियुक्त किया जाता है। इसलिए उसे सिर्फ इस आधार पर नहीं हटाया जा सकता कि वह सत्ता में मौजूद पार्टी के अनुरूप नहीं है।

राज्यपाल को सिर्फ बाध्यकारी कारणों से ही हटाया जा सकता है, जो किसी खास मामले में तथ्यों और स्थितियों पर निर्भर करते हैं। अदालत बाध्यकारी कारणों के बिना राज्यपाल को हटाने के मामले में न्यायिक पुनर्विचार कर सकती है।

याचिका पर ही दिया था फैसला

modi sarkar did not follow surpreme court decision

यह महत्वपूर्ण फैसला अदालत ने तत्कालीन भाजपा सांसद बीपी सिंघल की ओर से वर्ष 2004 में दायर जनहित याचिका पर दिया था। सिंघल ने केंद्र में आई संप्रग सरकार के उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा और ओडिशा के राज्यपालों को हटाए जाने के निर्णय को चुनौती दी थी।

याचिका में कहा गया था कि संवैधानिक प्रावधान की अनदेखी कर केंद्र की सलाह पर राष्ट्रपति राज्यपालों को नहीं हटा सकते थे क्योंकि संविधान में राज्यपालों के लिए पांच साल के तय कार्यकाल का प्रावधान है।

गौरतलब है कि संप्रग सरकार ने भी तब अपनी पूर्ववर्ती एनडीए सरकार में नियुक्त विष्णुकांत शास्त्री, बाबू परमानंद, कैलाशपति मिश्र और केदारनाथ साहनी को उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात और गोवा के राज्यपाल पदों से हटा दिया था।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed