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मोदी के दुख की नई कहानी, जोशी-आडवाणी

Sat, 01 Mar 2014 06:37 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली Updated Sat, 01 Mar 2014 06:37 PM IST
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modi's tension on varanasi and ahmedabad, joshi-advani in the race

भाजपा की तरफ से पीएम पद के दावेदार बनाए गए नरेंद्र मोदी के सामने अब तक जितनी चुनौतियां और मुश्किलें खड़ी थीं, वो बाहर की तरफ से आ रही थीं। ताजपोशी के वक्त जरूर लालकृष्ण आडवाणी ने कुछ दुविधा पैदा की थी, लेकिन मामला राजनाथ सिंह ने संभाल लिया।

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लेकिन अब लोकसभा चुनाव सिर पर आ खड़े हुए हैं और चर्चा सीटों पर जारी है। लेकिन इसी बीच नरेंद्र मोदी के लिए नई मुसीबत खड़ी हो गई है। यह मुश्किल उस लोकसभा सीट से जुड़ी है, जिससे मोदी आगामी चुनावों में खड़े होंगे।
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यूं भी मोदी के लड़ने के बारे में कयास जारी है। दो खबरें तैर रही हैं। पहली यह है कि वह गुजरात में किसी सीट से लड़ेंगे और दूसरी यह कि पार्टी में नई जान फूंकने के लिए वह उत्तर प्रदेश की किसी सीट से किस्मत आजमा सकते हैं। लेकिन अब इन दोनों मोर्चों पर मुसीबत दिख रही है।
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आडवाणी ने गांधीनगर पर दावा किया

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पहले बात करते हैं गुजरात की। इसकी वजह यह है कि लालकृष्‍ण आडवाणी ने शुक्रवार को साफ कर दिया कि वह रिटायरमेंट के मूड में नहीं हैं और एक बार फिर गांधीनगर से लड़ना चाहते हैं।

आडवाणी का यह बयान अहमियत इसलिए रखता है, क्योंकि इस सीट से नरेंद्र मोदी खड़े हो सकते थे। कयास थे कि अगर मोदी गुजरात से लड़े, तो गांधीनगर वो हाई-प्रोफाइल सीट हो सकती है, जो उनके कद के साथ न्याय करेगी।

ऐसा इसलिए, क्योंकि यह सबसे सुरक्षित सीट है और यहां से मोदी के जीतने की संभावना सबसे ज्यादा होती। अगर ऐसा होता है, तो मोदी देश भर में पार्टी के लिए चुनाव प्रचार कर सकते हैं।

दोनों आ सकते हैं आमने-सामने

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लाख कोशिशों के बावजूद मोदी और आडवाणी के बीच टेंशन बार-बार सामने आ जाती है। शुक्रवार को विजिलेंस कमेटी की बैठक में हिस्सा लेने गांधीनगर पहुंचे आडवाणी ने कहा कि उन्होंने अपनी दिलचस्पी बता दी है और अब तय पार्टी को करना है।

आडवाणी 1991 से सीट से लड़ रहे हैं। दोनों नेताओं के बीच तल्‍खी पुरानी है। जब मोदी ने सद्भावना मिशन शुरू किया था, आडवाणी ने बिहार से यात्रा निकाली और उसे रवाना किया नीतीश कुमार ने, जो मोदी के विरोधी माने जाते थे।

अब मोदी गफलत में हैं। अगर वह गांधीनगर से नहीं लड़ते, तो पार्टी को नए सिरे से उनके लायक हाई-प्रोफाइल सीट खोजनी होगी। और अगर वह यहीं से लड़ने पर अड़ते हैं और आडवाणी को बेदखल कर दिया गया, तो मोदी को काफी कड़े सवालों का सामना करना होगा।

बनारस में मुरली ने बजाई अपनी धुन

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यह ‌कलेश केवल अहमदाबाद तक सीमित नहीं है। मोदी की अगली टेंशन बनारस है। दरअसल, ऐसा माना जा रहा था कि अगर लोकसभा चुनावों के लिए मोदी गुजरात से बाहर कदम रखते हैं, तो वो सूबा उत्तर प्रदेश होगा। और उत्तर प्रदेश में मोदी की सीट वाराणसी हो सकती है।

लेकिन यहां से मुरली मनोहर जोशी ने खम ठोंक दिया। जब आरएसएस और भाजपा के बीच मोदी के लिए बनारस सीट पर चर्चा चल रही थी, जोशी ने वहां अपना चुनाव कार्यालय खोल दिया।

यही नहीं, उनके समर्थकों ने एक बुकलेट बांटनी शुरू की, जिसमें यह बताया है कि बीते पांच साल के दौरान जोशी ने अपने लोकसभा क्षेत्र के लिए क्या-क्या किया है। बनारस में रैली करने वाले नरेंद्र मोदी की इस सीट से जुड़ी उम्मीद भी दम तोड़ रही है। दिक्कत यह है‌ कि अगर किसी भी सीट को लेकर मोदी का अपनी पार्टी के नेता से विवाद होता है, तो छीछालेदर काफी ज्यादा होगी।

मोदी की चलेगी या मुरली की?

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मुरली मनोहर जोशी की वाराणसी से ही लोकसभा चुनाव लड़ने की इच्छा ने आरएसएस की चुनावी रणनीति में सेंध लगा दी है। जोशी के समर्थक यह भी दिखा सकते हैं किस तरह मोदी और उनके मैनेजर आडवाणी के बाद अब दूसरे वरिष्ठ नेता को तंग कर रहे हैं।

जोशी तीन बार इलाहाबाद से चुने गए, लेकिन 2004 में हार गए। साल 2009 में उन्हें वाराणसी सीट दी गई, जहां उन्होंने 18 हजार वोट से बहुजन समाज पार्टी के मुख्तार अब्बास नकवी को हराया।

बीते कुछ महीनों से खबर गर्म है कि मोदी बनारस, लखनऊ या कानपुर से लड़ सकते हैं और जोशी को राज्यसभा में भेजा जा सकता है। अब देखना यह है कि अटल बिहारी वाजपेयी-आडवाणी के साथ बेहद अहम किरदार निभाने वाले जोशी का क्या होता है। वाराणसी में उनकी चलती है या फिर मोदी की चलती है और उन्हें राज्यसभा की ओर चला दिया जाएगा।

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