जहां मोदी ने उठाई झाड़ू, देख लीजिए उन गलियों की सूरत
प्रधानमंत्री मोदी ने काशी में स्वच्छता अभियान को रफ्तार देने के लिए खुद अस्सी घाट पर फावड़ा चलाया, गलियों में झाड़ू लगाई। सफाई नवरत्न बनाए लेकिन इतना सबके बाद भी अभियान कदम दो कदम चलकर ठहर गया।
स्वच्छता अभियान के एक साल पूरे होने के बाद भी काशी की तस्वीर नहीं बदली। तंग गलियों और जाम से बेहाल सड़कों पर उफनाता सीवर, खुले मैनहोल, कूड़ा घरों के बाहर दुर्गंध मारता कचरा, कुंडों-तालाबों और घाटों पर फैली गंदगी इस प्राचीन शहर की खूबसूरती पर धब्बे की तरह हैं।
इन हालात के लिए सिर्फ सरकारी तंत्र की उदासीनता जिम्मेदार नहीं, कहीं न कहीं हमारी-आपकी स्वच्छता के प्रति अनदेखी और लापरवाही भी एक बड़ा कारण है।
सीधे गंगा में गिर रहे हैं नाले और सीवर
कुछ मौकों पर सामाजिक संगठनों, सरकारी विभागों और भाजपा की तरफ से सफाई का अभियान चलाया गया लेकिन यह सब रस्मअदायगी से आगे नहीं बढ़ पाया। अलबत्ता, स्वच्छता अभियान को व्यापक बनाने के लिए ‘दिव्य काशी’ की शुरुआत जरूर हुई।
केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन राज्य मंत्री महेश शर्मा ने झाड़ू लगाकर इस अभियान की शुरुआत की लेकिन इस अभियान का कहीं कोई असर अब तक नजर नहीं आया। काशी की जनता सीवर, कचरा, धूल-धुआं से परेशान है। गलियों, सड़कों, मुहल्लों से तालाबों-कुंडों और धार्मिक-पर्यटन स्थलों तक कहीं भी सफाई का कोई पुरसाहाल नहीं है।
शहर से प्रतिदिन निकलने वाले 600 एमटी कूड़ा में से करीब 450 एमटी का ही निस्तारण हो पाता है जबकि शेष कूड़ा गलियों, चौराहों और कूड़ा घरों के बाहर सड़ रहा है। सीवेज ट्रीटमेंट की योजनाएं भी अधर में हैं। नाले-सीवर सीधे गंगा में गिर रहे हैं और इससे गंगा स्वच्छता की मुहिम को भी पलीता लग रहा है।
नवरत्नों के घरों के बाहर ही फैला है कचरा
काशी में स्वच्छता अभियान को गति देने के लिए पीएम ने प्रो. देवी प्रसाद द्विवेदी और साहित्यकार मनु शर्मा को नवरत्न बनाया। इन्होंने अपने नवरत्न बनाए और फिर नवरत्न की एक शृंखला बन गई।
शुरुआत में लगा भी कि शायद स्वच्छता की यह मुहिम जन आंदोलन का रूप ले लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। नवरत्न तो एक के बाद एक बनते गए लेकिन सफाई के नाम पर सिवाय रस्मअदायगी के कुछ नहीं हुआ। औरों को प्रेरित करना तो छोड़िए, खुद नवरत्नों के घरों के बाहर कचरा फैला रहता है।
पीएम आए भी तो सफाई पर नहीं हुई बात
अभियान शुरू होने के बाद से पीएम मोदी तीन बार काशी आए लेकिन सफाई पर उन्होंने कोई ठोस बात नहीं की। जिस अस्सी घाट पर फावड़ा चलाकर घाटों की सफाई का आगाज किया, दोबारा वहां देखने तक नहीं गए।
शुरुआती दौर में घाटों की सफाई में रुचि लेने वाली संस्थाएं भी बाद में या तो पीछे हट गईं या फिर उदासीन बन गईं। अभियान की निगरानी का जिम्मा जिन्हें सौंपा गया, वे झाड़ू लेकर फोटो खिंचाने और उसकी कटिंग, फोटोग्राफ्स दिल्ली दरबार तक भेजने में ही लगे रह गए।