मोदी की ड्रीम योजना 'नमामि गंगे' का सालभर बाद क्या है हाल?
गंगा की स्वच्छता को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिबद्धता के बावजूद नमामि गंगे योजना धरातल पर नहीं उतर पा रही है। उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान गंगा की सफाई को एक अहम मुद्दे के तौर पर उठाया था। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी मोदी ने नमामि गंगे अभियान की जोर-शोर से शुरुआत की थी और उसके बाद से अब तक कई दौर की बैठकें भी हो चुकी हैं लेकिन गंगा की हालत जस की तस है।
नमामि गंगे पर मोदी ने पहली उच्च स्तरीय बैठक बीते साल 8 सितंबर को ली थी, जिसमें उन्होंने गंगा में गिरने वाले गंदे पानी पर रोक की बात कही थी। गंगा स्वच्छता को जन आंदोलन बनाने और इसके लिए वालंटियर बनाने की भी बात हुई। गंगा की सफाई के लिए एक विशेष कोष के गठन का भी ऐलान हुआ, जिसमें देश ही नहीं अप्रवासी भारतीयों से भी योगदान करने को कहा गया। पीपीपी के सहारे गंगा किनारे स्थित शहरों में करीब 500 एसटीपी बनाने का लक्ष्य रखा गया।
गंगा स्वच्छता अभियान को धार देने के लिए पीएम मोदी ने बीते साल 8 नवंबर को खुद बनारस के अस्सी घाट पर श्रमदान किया। नौ गणमान्य लोगों और संस्थाओं को भी नामित किया। इस साल 6 जनवरी को नमामि गंगे की दूसरी उच्चस्तरीय बैठक हुई। इसमें पीएम ने समयबद्ध कार्ययोजना बनाने और प्रदूषण फैलाने वाले कारणों पर रोक की बात कही। पीएम ने माना कि 764 औद्योगिक यूनिट गंगा में प्रदूषण को बढ़ावा दे रही हैं।
पीएम के अनुसार गंगा प्रदूषण के लिए शहरी कचरा और औद्योगिक कचरा जिम्मेदार है। इसके अलावा मोदी सरकार के आने के बाद से राष्ट्रीय नदी गंगा बेसिन प्राधिकरण की दो बैठके हुई हैं। पहली बैठक बीते साल 27 अक्तूबर को हुई तो दूसरी इस वर्ष 26 मार्च को संपन्न हुई थी। मार्च की बैठक में मोदी खुद उपस्थित थे। मोदी ने कहा कि गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने के लक्ष्य से समझौता नहीं होगा।
साल भर में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ी योजना
भाजपा नेतृत्व वाली राजग सरकार को केंद्र में सत्तासीन हुए इस महीने पूरे एक साल हो जाएंगे लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गंगा सफाई को लेकर महत्वाकांक्षी नमामि गंगे योजना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकी है। योजना की कार्ययोजना कैबिनेट की मंजूरी के इंतजार में है। गंगा की निर्मलता और अविरलता के लिए जोर-शोर से शुरू किए गए इस अभियान की कछुआ चाल पर संसदीय समिति ने भी अपनी चिंता जताई है।
संसदीय समिति ने सरकार से आग्रह किया है कि वह केंद्रित होकर नमामि गंगे अभियान के कार्य को आगे बढ़ाए। हालांकि गंगा को निर्मल बनाने के लिए खुद प्रधानमंत्री ने पिछले 11 महीने के दौरान अपने स्तर पर कई बैठकें की लेकिन योजना पर इन बैठकों के दौरान चर्चाओं और रूपरेखा से आगे बात नहीं बढ़ सकी। सर्वोच्च अदालत की गंगा की सफाई को लेकर लगाई गई फटकार के बावजूद सरकार के पास अभी कहने और करने को कुछ ठोस नहीं है।
नमामि गंगे अभियान के तहत वर्ष 2020 तक गंगा को स्वच्छ करते हुए इसकी निर्मलता और अविरलता को बहाल करने के लिए जल संसाधन मंत्रालय ने जो कार्ययोजना भेजी है, उस पर भी संसदीय समिति ने आश्चर्य जताया है। संसदीय समिति का कहना है कि सरकार को सीवेज के गंदे पानी को गंगा में प्रवेश से रोकने के लिए ठोस कार्ययोजना लाने की जरूरत है।
समिति का मानना है कि नमामि गंगे अभियान की सफलता के लिए सरकार को अन्य मंत्रालयों के साथ सहयोग बैठाते हुए लक्ष्य बनाकर समयबद्ध योजना बनाने की भी जरूरत है। मंत्रालय ने समिति को कार्ययोजना की जानकारी देते हुए बताया कि अगले चार-पांच सालों में 20000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। जबकि गंगा नदी बेसिन प्रबंधन प्लान तैयार करने वाले आईआईटी समूह का कहना है कि गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए जगह-जगह लगने वाले जलशोधन यंत्रों पर 74000 करोड़ और अगले पांच साल तक इनके रखरखाव में 17400 करोड़ रुपये खर्च होंगे।
गंदगी के लिए निकाय का कचरा और औद्योगिक कचरा जिम्मेदार
गंगा प्रदूषण के कारणों पर सरकार का मानना है कि गंगा में गंदगी 75 प्रतिशत नगर निकाय के कचरे और 25 प्रतिशत औद्योगिक कचरे से होती है। नगर निकाय के कचरे से छुटकारा पाने के लिए सरकार ने गंगा किनारे के शहरों में जलशोधन यंत्र (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, एसटीपी) लगाने पर जोर देने की बात कही है। गंगा बेसिन के पांच राज्यों से प्रतिदिन 7,300 मिलियन लीटर गंदा पानी गंगा में गिरता है।
इस गंदे पानी को साफ करने के लिए वर्तमान में 2,126 मिलियन लीटर के एसटीपी मौजूद हैं। 1,188 मिलियन लीटर की क्षमता वाले एसटीपी बन रहे हैं या प्रस्तावित हैं। सरकार का कहना है कि 2018-19 तक वह 2,500 मिलियन लीटर के एसटीपी की क्षमता का वह और विस्तार कर लेगी। आईआईटी की रिपोर्ट के अनुसार सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद भी 6,334 मिलियन लीटर गंदा पानी गंगा में गिरता रहेगा।
कार्ययोजना पर जल संसाधन मंत्रालय कुछ भी कहने की स्थिति तक में नहीं
गंगा स्वच्छता की कार्ययोजना को लेकर संसदीय समिति के जरिए पूछे गए सवाल पर जल संसाधन मंत्रालय, गंगा एवं नदी विकास मंत्रालय के सचिव ने कहा है कि कार्ययोजना पर निर्णय को लेकर वह अभी कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि कार्ययोजना का पहला पायदान कैबिनेट की मंजूरी होता है। उन्होंने कहा है कि गंगा स्वच्छता के लिए उठाए जाने वाले कदमों को उन्होंने कैबिनेट के पास भेजा है लेकिन कैबिनेट से अभी मंजूरी नहीं मिल सकी है।
वाराणसी में भी कागजों पर नमामि गंगे योजना
मोदी सरकार की नमामि गंगे परियोजना से गंगा निर्मलीकरण का सपना कब तक साकार होगा, कहना मुश्किल है। इस योजना के जरिए कोशिश होगी कि ढाई साल में गंगोत्री से गंगासागर तक एक बूंद भी नालों का पानी गंगा में न गिरने पाए लेकिन काशी में 23 नालों का दूषित जल गंगा में गिर रहा है। योजना के तहत अब तक एक भी नाले को रोका नहीं जा सका है। यह जरूर है कि इन नालों को रोकने और गंदे पानी को शोधित करने की योजना कागज पर तैयार कर ली गई है। अभी इस पर अमल होना बाकी है। अफसर बजट की बाट जोह रहे हैं।
नमामि गंगा परियोजना को भोले की नगरी में कामयाब बनाने के लिए नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के मिशन डायरेक्टर टीबीएसएन प्रसाद हाल में ही दौरा कर चुके हैं। गंगा निर्मलीकरण के लिए नालों को बंद करना बड़ी चुनौती है। इसके लिए शहर के घरेलू और औद्योगिक डिस्चार्ज को शोधित करने के लिए दो नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) बनाए जाने हैं। रमना में 50 एमएलडी क्षमता का ट्रीटमेंट प्लांट बनाने के लिए तैयार डीपीआर को मंजूरी मिल गई है। इसी तरह 140 एमएलडी क्षमता का
दूसरा एसटीपी दीनापुर में बनाया जाएगा।
गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई के महाप्रबंधक जेबी राय ने बताया कि इन दो नए एसटीपी के अलावा मौजूदा 9.8 एमएलडी क्षमता वाले भगवानपुर, 80 एमएलडी क्षमता के दीनापुर और 12 एमएलडी क्षमता के डीएलडब्ल्यू के ट्रीटमेंट प्लांट को नए मानक के अनुरूप दुरुस्त किया जाएगा। इसके अलावा गंगा में बहने वाले फूलमाला और कचरा साफ करने के लिए विशेष नावें भी चलाई जाएंगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर अस्सी घाट से मिट्टी का ढेर हटा दिया गया है। जन सहभागिता से महानिर्वाणी, शिवाला, प्रभु घाट, मणिकर्णिका, हरिश्चंद्र घाट, राजेंद्र प्रसाद और बबुआ पांडेय घाटों की सफाई हुई है। परियोजना के तहत गंगा के किनारे 500 मीटर के दायरे में साफ-सफाई के विशेष बंदोबस्त किए जाने हैं और इस इलाके में गंदगी न फैले इस पर निगरानी के लिए टास्क फोर्स बननी है। यह काम अभी शुरू नहीं हुआ है।
बिहार में सिमटती जा रही गंगा की स्थिति बदहाल
गंगा को लेकर केंद्र और राज्य दोनों जगहों की सरकारें अब तक उदासीन ही रही हैं। कार्यशैली के आधार पर देखा जाए तो नमामी गंगे मिशन भी पूर्व की गंगा एक्शन प्लान की तरह ही सफेद हाथी साबित हो रहा है। गंगा न ही पटना के करीब आई है और न तो स्वच्छ हुई है। पिछले एक साल में गंगा पर बातें बहुत हुई हैं, लेकिन इस दिशा में कोई नीति तैयार नहीं हो पाई है, फंड दूर की बात है।
तीन बैठकें हुई हैं और एक पत्राचार भी राज्य और केंद्र के बीच हुआ है, लेकिन इसके बाद गंगा को भुला दिया गया। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 20 अप्रैल को गंगा पर आयोजित बैठक में शामिल हुए और बिहार का पक्ष रखा। इससे इतना जरूर हुआ कि फरक्का से इलाहाबाद तक गंगा पर बैराज बनाने की योजना केंद्र ने वापस ले ली। बिहार के विरोध के बाद नीतिन गडकरी ने कहा कि हम अब हल्दिया से इलाहाबाद तक गंगा से बालू साफ (ड्रेजिंग) करेंगे और जलमार्ग विकसित करेंगे।
बिहार में गंगा का प्रवेश चौसा में होता है जहां यूपी से चार सौ क्यूमैक जल बिहार में आता है। वहीं कहलगांव में गंगा के माध्यम से पंद्रह सौ क्यूमैक जल बंगाल को जाता है। बिहार की आपत्ति यह है कि बिहार में गोमुख का एक बूंद जल नहीं पहुंचता है, ऐसे में खुद से खुद पानी साफ कर लेने की क्षमता बिहार में बहनेवाली गंगा में नहीं है। ऊपर से बांग्लादेश को दिए जानेवाले गंगाजल में तीन चौथाई पानी तो बिहार की नदियों का है। दरअसल गंगा के अविरल नहीं होने से बिहार में गंगा सूख रही है।
पटना के गायघाट स्थित गंगा के मुख्य केंद्र यानी बीच गंगा में दो से तीन फुट ही पानी है। फरुक्का बैराज की गहराई जो निर्माण काल में 75 फुट के करीब थी वो अब महज 15 फुट रह गई है। केंद्र फरक्का बैराज को इसके लिए जिम्मेदार मानने को तैयार नहीं है। बिहार सरकार ने मुंबई की एक एजेंसी को इसका अध्ययन करने का काम सौंपा है। गंगा मंत्रालय ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया है। पटना में बहने वाली गंगा में ऑक्सीजन की मात्रा भी कम होती जा रही है। बीते 24 वर्षो में इसमें ऑक्सीजन की मात्रा 25 से 28 फीसदी तक कम हो गई है।
इससे नदी में रहने वाले जीवों के जीवन पर संकट उत्पन्न हो रहा है। डॉल्फिन यानी सोंस की संख्या विस्मयकारी ढंग से घटी है। यह घटना गंगा पर संकट का संकेत है। इसके अलावा गंगा के सभी तटवर्ती शहरों में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण होना था, लेकिन पटना में ही कोई काम नहीं हुआ। परिणाम यह है कि गंगा न सिर्फ मैली हुई, बल्कि विषैली भी हो गई। राजधानी पटना में कुल छह मुख्य नाले हैं। इनसे होकर ही पूरे पटना का गंदा पानी गंगा में आकर बदस्तूर गिर रहा है।
अस्पताल, पाटलिपुत्र औद्योगिक क्षेत्र का रसायनयुक्त जहरीला पानी, अन्य छोटे-बड़े उद्योगों का कचरा, यहां तक की मल-मूत्र भी नाला से होकर गंगा में गिरते हैं। गंगा आंदोलन से जुडे़ पंकज मालवीय का कहना है कि गंगा पर मंथन के अलावा चिंतन की जरूरत है।
पांच साल में बहेगी गंगा में अविरल धाराः पीवीएसएन प्रसाद
वहीं इस संबंध में बात करने पर नेशनल मिशन ऑफ क्लीन गंगा के निदेशक पीवीएसएन प्रसाद दावा करते हैं कि दो साल बाद बनारस का कोई प्रदूषण गंगा में नहीं गिरेगा और पांच साल बाद नदी में अविरल धारा बहेगी। पांच मई को हम अहम बैठक करने जा रहे हैं। 20 मई से 20-20 जिलों के जिलाधिकारियों के साथ चर्चा होगी और गंगा के किनारे के 118 जिलों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। पांच राज्यों से साथ मिलकर योजना को अमली जामा पहनाने की दिशा में काम चल रहा है।
पिछले तीन साल में सरकार ने गंगा को साफ-सुथरा बनाने के लिए चार हजार करोड़ रुपये खर्च किया है। केन्द्र सरकार के पास गंगा की सफाई के लिए 25 हजार करोड़ रुपये का प्रस्ताव तैयार करके भेजा गया है। इसे वित्त मंत्रालय की मंजूरी मिल गई है और कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद तेजी से काम दिखाई देने लगेगा। इस योजना में विश्वबैंक का एक अरब डालर(छह हजार करोड़)और जाइका का 10 हजार करोड़ रुपए भी खर्च होना है।
पहले गंगा परियोजना में राज्य सरकारों(पांच राज्यों) का भी 30 प्रतिशत का योगदान था। लेकिन केन्द्र से नए प्रस्ताव पर मंजूरी मिलने के बाद अब राज्य सरकारों का हिस्सा घट जाएगा और केन्द्र का बढ़ जाएगा। फिल वक्त 5900 करोड़ रुपये से गंगा के किनारे के पांच शहरों में काम चल रहा है। वाराणसी में कुल 23 लाने नदी में गिरते हैं। इनमें से अस्सी, कोइना और वरुणा नाला को छोड़कर बाकी अन्य को गंगा में गिरने से रोका जा चुका है।
वरुणा, कोइना और अस्सी नाले के बारे में पांच मई को निर्णय ले लिया जाएगा। इलाहाबाद में भी मुख्य शहर के नाले को रोकने तथा कानपुर के 20 नाले को नदीं में सीधे गिरने से रोका गया है। पांडुनदी में गिरने वाला गंदा नाला, सीसा नाला, जाजमऊ नाला सबसे बड़ी समस्या हैं। इनके लिए भी पांच मई 2015 की बैठक में समाधान निकाल लिया जाएगा। 30 दिसंबर 2015 से गंगा में प्रदूषण नियंत्रण प्रणाली भी प्रभावी हो जाएगी। देखिए एसटीपी कभी भी सड़क पर नहीं बनती। इसके बनने के बाद भी समय लगता है। इसलिए अभी यही कह सकते हैं कि अगले दो साल में लोगों को बदलाव साफ दिखने लगेगा।
गंगा के गिनारे के शहरों (118) की नगर पालिकाओं से सहयोग लेकर नदी में जाने वाले ठोस अपशिष्ट पदार्थ को निकालने के लिए हर जिले में निर्मल गंगा सहभागिता विभाग बनाया जा रहा है। घाट के ऊपर टॉयलेट, चेंजिंग रूम आदि की व्यवस्था की जा रही है। मॉडर्न कैफेटेरिया बनाने के लिए भी राज्य सरकारों को प्रस्ताव भेजा गया है। 20 मई 2015 से गंगा को निर्मल बनाने की कार्ययोजना के तहत 20-20 जिलों के जिलाधिकारी के साथ बैठक करके इसे अंतिम रूप दिया जाएगा।
जून में राज्यों के साथ चर्चा होगी। नेहरू युवा केन्द्र के साथ आपसी सहमति पत्र पर दस्तखत हो चुके हैं और वह लोगों की गंगा में सफाई पर भागेदारी बढ़ाने में सहयोगी के तौर काम करेगा। संगठन को गंगा को साफ-सुथरा रखने के लिए स्वयं सेवकों(वालेंटियर) को तैयार करने की भी जिम्मेदारी दी गई है। सेना के रिटायर जवान और अफसर इस परियोजना से जुड़ेंगे। इसके लिए टेरिटोरियल आर्मी के साथ योजना को अंतिम रुप दिया जा रहा है। यह लोगों को साफ-सफाई, घाटों पर सफाई, अनुशासन की सीख देने तथा मॉनिटरिंग का काम करेंगे। इसके अलावा अप्रवासी भारतीय(एनआरआई) समेत अन्य का भी सहयोग लिया जाएगा। घाटों पर बॉयो टॉयलेट आदि का खर्च वह करके वह उसे अपने पुरुखों के नाम पर चलाने की जिम्मेदारी उठा सकते हैं।
अब तक हुई दो बैठक
नमामि गंगे की घोषणा के बाद से अबतक दो प्रमुख बैठक हुई है। इसमें से एक बैठक की अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने की है। जबकि दूसरे की जलसंसाधन, गंगा पुनरुद्धार मंत्री उमा भारती ने।
(अमर उजाला नेटवर्क से बातचीत पर आधारित)
यह है नमामि गंगे अभियान और उसकी कार्ययोजना
गंगा संरक्षण के लिए एकीकृत कार्ययोजना बनाने के मकसद से वित्त वर्ष 2014-15 में 2,037 के प्रस्ताव के साथ नमामि गंगे अभियान की शुरूआत हुई। अभियान का उद्देश्य गंगा नदी के पुनरोद्धार के लिए किए जा रहे वर्तमान प्रयासों को प्रभावि बनाना और कारगर नीति तैयार करना है। शहरी नागरिकों के सुविधाओं को ख्याल में रखते हुए सरकार ने नदियों पर घाट बनाने और उसकी सुंदरता सुनिश्चित करने के काम को भी इस प्रयास में शामिल कर दिया है
वित्त वर्ष 2014-15 में वित्त मंत्रालय ने घाटों के सौंदर्यकरण के मद में 100 करोड़ के प्रावधान के साथ केदारनाथ, हरिद्वार, कानपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, पटना और दिल्ली के घाटों को चमकाने का लक्ष्य रखा। गंगा स्वच्छता के लिए कार्ययोजना बनाने में जून 2014 से जल संसाधन, गंगा पुनरोद्धार और नदी विकास मंत्रालय के साथ वन एवं प्रर्यावरण, जहाजरानी, पर्यटन, शहरी विकास और पेयजल एवं स्वच्छता व ग्रामीण विकास मंत्रालय मिलकर कार्ययोजना बनाने में जुटे
जिसकी रिपोर्ट 28 अगस्त को पीएम मोदी को सौंप दी गई। इसमें आईआईटी के 7 समूहों के जरिए गंगा नदी बेसीन प्रबंधन प्लान के तहत बनाए रिपोर्ट को भी सरकार ने चिन्हित किया। गंगा स्वच्छता के लिए विभिन्न योजनाओं के नाम पर सरकार के जो कार्यक्रम चल रहे हैं उसमें निकायों के सीवेज प्रबंधन के लिए शहरी मंत्रालय के अंतर्गत निर्मल धारा, अविरल धारा सरीखे कार्यक्रम हैं।
कार्ययोजना
गंगा किनारे बसे शहरों में 100प्रतिशत सीवेज इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास, एसटीपी का पुनरोद्धार और अपग्रेडेसन, नदी के किनारे का प्रबंधन, घाट सौंदर्यिकरण, कानपुर के औद्योगिक कचरों के रोक पर प्राथमिकता, चारधाम यात्रा के लिए कार्ययोजना, गंगा में बसने वाले जीव जंतुओं का संरक्षण और जनता को जागरूक बनाने पर जोर है। इसके अलावा सरकार ने गंगा स्वच्छता अभियान को सूचारू बनाने के लिए कई विभागों के काम को छीनकर गंगा पुनर्रोद्धार और नदी विकास मंत्रालय को सौंपा है।
गंगा पुनर्रोद्धार के लिए बजट
वित्त वर्ष 2014-15 के तहत राष्ट्रीय नदी संरक्षण और गंगा नदी बेसीन प्राधिकरण के मद में सरकार ने 530 करोड़ , राष्ट्रीय गंगा प्लान के मद में 1500करोड़ और घाटों के सौदर्यिकरण के मद में 100 करोड़ का प्रावधान किया था। वित्त वर्ष 2015-16 के बजट में इन मदों में बढ़ोत्तरी करते हुए वित्त मंत्री ने राष्ट्रीय नदी संरक्षण और गंगा नदी बेसीन प्राधिकरण के मद में 546 करोड़, राष्ट्रीय गंगा प्लान के मद में 2100 करोड़ और घाट सौंदर्यिकरण के लिए 100 करोड़ का प्रावधान किया है। इसके अलावा गंगा स्वच्छता अभियान का खर्च जुटाने के लिए सरकार ने नेशनल क्लीन एनर्जी फंड नामक विशेष कोष बनाया है। कारपोरेट और सामाजिक कार्यों के फंड और दानदाताओं के जरिये रकम जुटाई जाएगी।
नमामि गंगे से होने वाले काम
- हरिद्वार से गंगा सागर तक गंगा में प्रदूषण रोकने के लिए तटीय शहरों, बस्तियों में गंगा रक्षक दल का गठन
- 2525 किमी लंबी गंगा में गिरने वाले नालों को पूर्णतया बंद करना
- गंगा में बहने वाले फूलमाला और अन्य कचरा की सफाई के लिए विशेष तरह की नावों को चलाना
- गंगा तट से 500 मीटर के दायरे को कूड़े, कचरे हटाकर नियमित स्वच्छ रखना