'मोदी खाएं आम, नवाज गिनाएं पेड़'
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भारत में नरेंद्र मोदी की सरकार ने 100 दिन पूरे कर लिए हैं। प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल के पहले सौ दिनों की जो अंधाधुंध मीडिया कवरेज हो रही है वो अभूतपूर्व है। हर कोई चाहे वह राजनीतिक पार्टी हो या विश्लेषक मोदी सरकार के कामकाज का लेखा-जोखा अपने हिसाब से कर रहा है।
ऐसे में अगर कोई मोदी सरकार के कामकाज का आकलन पाकिस्तान के नजरिये से जानना चाहे तो क्या होगा। ऐसे समय जब यहां पाकिस्तान में राजनीतिक हिसाब से एक-एक दिन भारी हो और रात भी काटे न कटे, दिल्ली से एक मित्र ने फोन किया कि पाकिस्तान में मोदी सरकार के पहले 100 दिन को किस दृष्टि से देखा जा रहा है?
नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ मैंने कहा कि यहां तो अपनी ही नजर ढीली हो रही है, एक के चार-चार दिखाई दे रहे हैं और आपको मोदी सरकार के 100 दिन पर नजर डलवाने की पड़ी हुई है।
बल्कि मुझे तो उलटे आपसे पूछना चाहिए कि मोदी सरकार ने अपने पहले 100 दिन में पाकिस्तान को किस दृष्टि से देखा। दोनों आंखों से देखा, कि आंखें फाड़-फाड़कर देखा, कि एक आंख मीचकर देखा, कि दोनों आंखें बंद करके या फिर देखा भी कि नहीं देखा। वो मित्र शायद परेशान हो गए और उन्होंने मुझे पागल समझते हुए हड़बड़ाकर फोन रख दिया।
मोदी-नवाज, एक ही बात
अब आप ही दिल पर हाथ रखकर बताइए कि सुबह-सुबह जो कि अधिकतर पत्रकारों और टिप्पणीकारों के सोने का वक्त होता है, अगर आपको कोई नींद से उठाकर मोदी सरकार के 100 दिनों पर दृष्टि डलवाए तो आप क्या कहेंगे? भले ही वो आपकी पत्नी क्यों न हो।
तो बात यह है कि हम मोदी सरकार के 100 दिनों को उसी दृष्टि से देखते हैं, जैसे कि नवाज शरीफ के पहले 100 दिनों को देखते थे। भारत में तो पता नहीं, लेकिन पाकिस्तान में जब भी कोई नया थानेदार आता है तो शुरू-शुरू में वह थाने की रोज सफाई करवाता है, सिपाहियों को बिना इस्तरी की पतलून पहनने और जूते चमकाकर न रखने पर डांटता है और इलाके में पिछले थानेदार को भत्ता देने वाले ठेले वालों को भगाकर सड़क चौड़ी करवा देता है।
फिर आहिस्ता-आहिस्ता जिदगी वैसी ही हो जाती है, जैसी होती है। हमने सुना है कि मोदी जी ने पहले 100 दिनों में दिल्ली सरकार में बाबूगिरी कम करने के लिए कुछ सख्ती की है। फाइलों को पहिए लग गए हैं।
जी प्रधानमंत्री जी
नवाज शरीफ सरकार ने भी शुरू के 100 दिनों में लगभग यही किया था। फिर मालूम हुआ कि इस्लामाबाद में सब फैसले बस चार-पांच लोग ही करते हैं।
हमें लगता है कि मोदी सरकार में भी फ़ैसले चार-पांच लोग ही करते होंगे, बाकी लोग 'जी प्रधानमंत्री जी' ही जपते होंगे। देखें तो शुरू के 100 दिन में थानेदार हो या सरकार, सब फ़ुर्ती दिखाते हैं।
मजा तो तब है कि आखिरी 100 दिन में भी वैसी ही फुर्ती दिखाई जाए। पर मैंने तो अपनी 52 साल की बाली उमरिया में सब सरकारों का हाल उस बंदर की तरह देखा है जिसे जंगल का राजा चुन लिया गया।
ऐसी फुर्ती किस काम की?
राजा हर किसी जानवर की समस्या का समाधान ढूंढने के लिए एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कूदता रहता। एक दिन बंदर के वजीर बारहसिंगा ने पूछा कि महाराज आप जंगल के जानवरों की समस्याएं सुलझाने के बजाय कभी पेड़ पर लटक रहे हैं, कभी राजमंच से कूद रहे हैं, कभी जमीन पर गुलाटियां खा रहे हैं।
बंदर महाराज ने जवाब दिया- 'अरे मूर्ख, देख नहीं रहा, मैं भी आराम से नहीं बैठा हूं। ये सारी फुर्ती, कसरतें और तपस्याएं जनता के लिए ही तो हैं'।
अरे हां, सुना है कि 100 दिन पूरे होने की खुशी में नवाज शरीफ अपने ऊपर आई मुश्किल घड़ी में भी मोदी को चौसा, दशहरी और सिंदरी आमों का तोहफा भेजना नहीं भूले। मोदी जी आप भी तो कुछ भेज दें। अच्छा नहीं लगता कि आप तो खाएं आम और नवाज शरीफ गिनते रहें पेड़...