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मोदी-राहुल दोनों दावेदार, पर क्यों नहीं होता ऐलान?
भरत शर्मा
Updated Wed, 17 Jul 2013 11:17 AM IST
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चुनावी बिसात बिछाई जा चुकी है। सेनाओं ने तरकश भर लिए हैं। सैनिकों को जिम्मा सौंप दिया है। मुद्दे खोज लिए गए हैं। दूसरों की कमियां उछाली जा रही हैं। अपनी छिपाई जा रही हैं। सेना के साथ सेनापति भी कमर कस चुके हैं।
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लेकिन यह जंग खास है। सेनापति कौन हैं, ये शीशे की तरह साफ भले हो, लेकिन खास रणनीति के तहत उनके नामों का ऐलान नहीं किया गया। हिंदुस्तान की राजनीति ही ऐसी है। जो साफ दिखता है, वह भी नहीं कहा जाता।
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कांग्रेस ने कह दिया है कि वह राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार नहीं घोषित करेगी। भले कांग्रेस के भीतर और बाहर, सभी इस बात से वाकिफ हैं कि पार्टी को जीत मिली, तो राहुल बाबा से ऊंचा कद किसी का नहीं।
दूसरी ओर हिंदुत्व और विकास के तीरों से कांग्रेस का किला भेदने की कोशिश में जुटी भाजपा है, जिसके खेमे में साफ दिख रहा है कि सबसे बड़ा नेता बनकर कौन उभरा है। लेकिन वक्त और हालात का तकाजा है कि नरेंद्र मोदी का नाम जगजाहिर होते हुए भी जुबान पर नहीं लाया जा सकता।
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आखिर क्या वजहें हैं, जो बार-बार नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के नाम कालीन से बाहर आने के बाद फिर उन्हें भीतर सरका दिया जाता है। आइए गौर करें ऐसी वजहों परः
मोदी से फायदा होगा या नुकसान?
दरअसल, भाजपा यह सटीक अंदाजा अभी तक नहीं लगा पाई है कि नरेंद्र मोदी को पीएम पद का दावेदार बनाने पर उसे फायदा होगा या नुकसान। ये चार वजहें उसे मोदी के नाम पर औपचारिक मुहर लगाने से बार-बार रोक लेती हैं।
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अंदरूनी कलहः भाजपा में अंदरूनी कलह इतनी है कि मोदी को दावेदार बताते ही सिर-फुटौव्वल शुरू हो जाएगा। इसकी एक बानगी उन्हें चुनाव प्रचार समिति का प्रमुख बनाते वक्त दिखी थी, जब लालकृष्ण आडवाणी ने इस्तीफा दे दिया था। अगर उनके नाम का ऐलान हुआ, तो आडवाणी खेमा खफा होकर पार्टी को ही नुकसान पहुंचा सकता है।
एनडीए की मजबूरीः भगवा दल की मुश्किल यह भी है कि मोदी के नाम पर औपचारिक मुहर लगते ही एनडीए के बचे-खुचे दल भी छिटक सकते हैं। इसलिए पार्टी चुनावों से पहले यह जोखिम नहीं उठा सकती। मोदी के नाम पर जेडी-यू के नाता तोड़ने के बाद यह शक और पुख्ता हुआ है।
ध्रुवीकरण की धारः मोदी को सामने लाने का मकसद हिंदू वोट का ध्रुवीकरण है, क्योंकि उनकी छवि एक हिंदुत्व नेता की है। लेकिन पार्टी इसे लेकर पूरा यकीन नहीं रखती कि यह दांव कामयाब रहेगा या नहीं। राम मंदिर का मुद्दा भी दोबारा उठाया गया है, लेकिन यह देखना बाकी है कि वोटों का ध्रुवीकरण हो पाता है या नहीं।
कितने असरदारः गुजरात में नरेंद्र मोदी का प्रदर्शन धमाकेदार रहा है, इस बात से इंकार नहीं है। वहां हिंदुत्व और विकास के मुद्दे को लेकर जो उन्हें समर्थन बार-बार मिला है, उसी ने मोदी का कद इतना ऊंचा बना दिया है। लेकिन उनका इम्तहान होना बाकी है। क्या देश भी उन्हें गुजरात की तरह चाहेगा या नहीं, यह अभी तय नहीं है।
राहुल बाबा पर कांग्रेस की चुप्पी के मायने?
भाजपा की तरह कांग्रेस भी सब कुछ जाहिर होते हुए राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित नहीं कर रही। खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उनके लिए गद्दी छोड़ने को तैयार हैं, लेकिन नाम का ऐलान नहीं होता। वजह क्या हैं?
मौजूदा पीएम का क्याः अगर राहुल गांधी को अभी से प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया जाता है, तो फिलहाल यह पद संभाल रहे मनमोहन सिंह की हालत खराब हो जाएगी। यह सवाल उठने लगेगा कि क्या मनमोहन केवल औपचारिकता के लिए पद संभाल रहे हैं, जबकि असलियत में वह कुर्सी राहुल की है।
मशीनरी बैठ जाएगीः अगर यूपीए और कांग्रेस के सत्ता में रहते हुए अभी से राहुल गांधी को आगामी चुनावों का सेनापति नियुक्त किया जाता है, तो यह जाहिर है कि कैबिनेट और सरकारी मशीनरी का तुरंत पीएम मनमोहन सिंह पर से भरोसा उठ जाएगा। जाहिर है फिलहाल सरकार या कांग्रेस ऐसा कतई नहीं चाहेगी।
छवि धूमिल होगीः देश में मनमोहन सिंह को भले कितना कमजोर बताया जाए, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनमोहन सिंह की छवि मजबूत और जानकार नेता की है। ऐसे में राहुल को अभी से फ्रंट पर लाने का मतलब होगा कि कोई भी सरकार टीम मनमोहन से बातचीत में दिलचस्पी नहीं लेगी। सारी सामरिक और रणनीतिक बातचीत ठंडे बस्ते में चली जाएगी।
टेस्ट बाकीः गांधी परिवार से ताल्लुक रखने के कारण राहुल को कांग्रेस में भले कितनी तरजीह मिले, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जनता दरबार में उन्हें कोई बड़ी कामयाबी नहीं मिली है। सोनिया अब सक्रिय राजनीति से दूर हो रही हैं, ऐसे में आगामी वक्त में कांग्रेस की जिम्मेदारी राहुल के कंधों पर होगी।