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ओबामा से 'दोस्ती' के बाद भी देश के हाथ खाली!

Wed, 28 Jan 2015 09:09 AM IST
Updated Wed, 28 Jan 2015 09:09 AM IST
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Modi Obama's 'friendship' is larger than expected investment

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेहतरीन तालमेल के बावजूद निकट भविष्य में इसकी कम ही संभावना है कि देश में कोई बड़ा निवेश देखने को मिले। इसकी वजह यह है कि ज्यादातर अमेरिकी सीईओ और अधिकारियों ने भारत सरकार और पीएम मोदी के सामने देश में निवेश के रास्ते में मौजूद कई अड़चनों को लेकर अपनी चिंता जाहिर की है।

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इन अड़चनों में कई लाइसेंस हासिल करना, लालफीताशाही, सहयोग न करने वाली नौकरशाही, परियोजनाओं की मंजूरी में देरी, अस्थिर कर व्यवस्था, सुस्त श्रम सुधार, भ्रष्टाचार के साथ ही राज्य सरकारों का असहयोग भी शामिल है।
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दोनों नेताओं के बीच बनी केमिस्ट्री का असर भविष्य में भारत-अमेरिका के मजबूत रिश्तों के रूप में परिलक्षित हो सकता है लेकिन निवेश को लेकर हाल फिलहाल कोई बड़ा फायदा नहीं होने वाला। ओबामा के साथ दौरे पर आए शीर्ष अमेरिकी सीईओ और अधिकारियों ने मोदी सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों को निवेश के रास्ते में आने वाली बाधाओं से अवगत कराया है।
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साथ ही इन्होंने इस बारे में भारत-अमेरिकी बिजनेस सीईओ फोरम के दौरान बंद कमरे में हुई बैठक में प्रधानमंत्री मोदी को भी जानकारी दी। यहां तक कुछ सीईओ ने तो इस बारे में पीएम को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा आयोजित भोज में बताया था।

प्रधानमंत्री मोदी के साथ बातचीत में उठाया यह मुद्दा

Modi Obama's 'friendship' is larger than expected investment

एक अग्रणी पांच सितारा होटल श्रृंखला के सीईओ ने इस बारे में अपनी चिंता प्रकट की। उनकी कंपनी को भारत में होटल खोलने के लिए विभिन्न लाइसेंस के अतिरिक्त कम से कम 47 जगह से मंजूरी लेनी पड़ी। प्रधानमंत्री मोदी के साथ बैठक में सीईओ ने कहा कि निवेश के रास्ते की अड़चनों को दूर करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

साथ ही कागजी कार्यवाही कम की जाए और लाइसेंस राज, इंस्पेक्टर राज और भ्रष्टाचार तथा निवेश के इच्छुक लोगों को परेशान किए जाने की घटनाओं पर अंकुश लगाया जाना चाहिए। बैठक में मौजूद ज्यादातर सीईओ का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी निवेश को बढ़ावा देने के इच्छुक हैं लेकिन ऐसे ही विचार राज्य सरकारों के भी होने चाहिए।

ज्यादातर कंपनियों का कहना था कि उन्हें जमीन अधिग्रहण और विनिर्माण इकाई खोलने के लिए राज्य सरकारों से पाला पड़ता है, ऐसे में उनका नजरिया भी सहयोगात्मक होना जरूरी है। यहां तक कि भाजपा शासित राज्य सरकारें भी इस संदर्भ ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखा रही हैं।

एक सीईओ ने कहा कि भारत सरकार को आधारभूत मुद्दों को लेकर और निर्णयात्मक होना होगा। उसे व्यापक स्तर पर श्रम सुधार, स्थिर कर व्यवस्था के साथ ही ‘भर्ती करो और निकालो’ सरल भूमि अधिग्रहण नीति भी लागू करनी होगी। मौजूदा वक्त में जिस तरह से पीएम मोदी या कैबिनेट में शामिल उनके कुछ अन्य सहयोगी सोचते हैं, वैसा नौकरशाही नहीं सोचती है और उनकी सोच में बदलाव लाने की जरूरत है।

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