भूमि अधिग्रहण बिल पर झुकने के बाद भी हारी मोदी सरकार
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भूमि अधिग्रहण बिल पर विपक्ष के आगे झुकने के बाद भी मोदी सरकार को बड़ी सियासी हार का सामना करना पड़ा है। बिल पारित कराने के लिए विरोधियों की सारी शर्तें मानने के बावजूद सोमवार को विपक्ष की दो नई शर्तों ने सरकार को सियासी मोर्चे पर उलझा दिया।
बिल पर गठित संसद की संयुक्त समिति में विपक्ष ने 1894 कानून के तहत हुए अधिग्रहण के सभी मामलों में नए कानून के तहत मुआवजा, पुनर्वास तय करने की शर्त रखी।
इसके अलावा विपक्ष ने अधिग्रहण के 5 साल बाद तक जमीन का उपयोग न करने की स्थिति में भूस्वामी को अधिग्रहीत जमीन वापस करने का नए बिल में प्रावधान करने की वकालत की।
इसके बाद सरकार ने मानसून सत्र की जगह अब बिल को शीतकालीन सत्र में संसद में पेश करने का मन बनाया है। इस बीच नए सिरे से मचे सियासी संग्राम के बीच सरकार बिल पर एक और अध्यादेश लाने को लेकर दुविधा में है।
भूमिबिल पर अब तक मोदी सरकार
बीते साल नवंबर में सरकार ने वर्ष 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के कई प्रावधानों को रद्द कर बिल पर नया अध्यादेश जारी किया था। विपक्ष के साथ-साथ संघ परिवार के तीखे विरोध के कारण बीते नौ महीने से भी अधिक समय में सरकार ने नए बिल में किए गए कई प्रावधानों को वापस ले लिया।
बिल को कानूनी जामा पहनाने के लिए सरकार ने इसी महीने वर्ष 2013 के करीब करीब सभी प्रावधानों को अक्षरश: लागू करने पर सहमति दे दी थी। मगर बिल को किसी कीमत पर कानूनी जामा न पहनाने देने पर अड़े विपक्ष ने समिति के समक्ष अचानक दो नए बिंदुओं को शामिल करने की शर्त रख सरकार के सुधारवादी एजेंडे को नए सिरे से फंसा दिया है।
विपक्ष ने रखी दो नई शर्तें
सोमवार को हुई समिति की बैठक में अध्यक्ष एसएस आहलूवालिया ने बिल पर सहमति बनाने की पुरजोर कोशिश की। उन्होंने जब यह कहा कि सरकार समिति से सर्वसम्मत प्रस्ताव चाहती है तो विपक्ष भड़क गया।
टीएमसी के डेरेक ओब्रायन ने कहा कि यह कैसे संभव है। समिति को सदस्यों की असहमति को भी शामिल करना होगा। इसके बाद कांग्रेस के जयराम रमेश ने वोटिंग कराने की मांग कर डाली और इस दौरान बीजेडी और माकपा ने भी उनका साथ दिया।
चूंकि इन प्रावधानों को बिल में शामिल करने के पक्ष में 17 और विपक्ष में 13 सदस्य थे, इसलिए आहलूवालिया ने अपने कदम पीछे खींच लिए।
आहलूवालिया ने विपक्ष को उनकी सभी पुरानी मांगें मान लेने की दलील देते हुए बिल पर सहमति देने की अपील की। विपक्ष को मनाने में नाकाम रहने के बाद आहलूवालिया ने कहा कि अब सरकार मानसून सत्र की जगह बिल को शीतकालीन सत्र में पेश करेगी।
सरकार ने पीछे खींचे कदम
इससे पहले समिति ने धीरे धीरे एक एक कर विपक्ष के 6 संशोधनों को स्वीकार कर लिया था। इसमें प्रमुख रूप से अधिग्रहण में किसानों की सहमति और अधिग्रहण का सामाजिक-आर्थिक पक्ष का अध्ययन शामिल था।
सरकार को उम्मीद थी कि चूंकि इन संशोधनों को स्वीकार करने के बाद वर्ष 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून और नए कानून में कोई बड़ा अंतर नहीं रह जाएगा, इसलिए अंत में वह विपक्ष को मना लेगी।
समिति में शामिल भाजपा के एक सांसद का कहना था कि विपक्ष की नई शर्त मानने पर मुआवजा और पुनर्वास की व्यवस्था बेहद जटिल प्रक्रिया साबित होगी। तब संसद भवन, राष्ट्रपति भवन और लुटियन जोन के लिए हुए अधिग्रहण मामले को नए कानून के तहत निपटाना होगा।