भ्रष्ट अफसरों को बचाने वाला कानून ला रही मोदी सरकार?
सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की सीबीआई या अन्य एजेंसियों से जांच के लिए लोकपाल की पूर्व अनुमति को अनिवार्य किया जा सकता है। केंद्र सरकार इस संबंध में भ्रष्टाचार रोधी कानून में परिवर्तन करने पर विचार कर रही है।
इस कदम को भ्रष्ट कर्मचारियों को बचाने वाला बताया जा रहा है। हालांकि सरकार का कहना है कि कर्मचारियों के कामकाज में कुशलता और पारदर्शता लाने के लिए ऐसा किया जा रहा है।
लोकपाल और लोकायुक्त कानून के प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार, अभियोजन की अनुमति देने का अधिकार लोकपाल को होगा। अधिकारियों के अनुसार, इसका अर्थ यह है कि सीबीआई और अन्य जांच एजेंसियों को भ्रष्टाचार के किसी आरोप की जांच से पहले केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त अथवा समान निकाय से अनुमति लेनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट कर चुकी है ऐसे कानून पर टिप्पणी
वहीं, आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 197 या दिल्ली स्पेशल पुलिस स्थापना अधिनियम की धारा 6ए कहती है कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत कथित रूप से होने वाले किसी भी अपराध की जांच केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बिना नहीं की जा सकती है।
सीआरपीसी और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम में भी इस तरह का प्रावधान है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल मार्च में ऐसे सभी कानूनी प्रावधानों को अवैध और असंवैधानिक बताया था, जिनमें भ्रष्ट अफसर की जांच से पहले सीबीआई के लिए मंजूरी लेना अनिवार्य था।
शीर्ष अदालत का कहना था कि इसे भ्रष्ट अफसरों का बचाव होता है। इस संबंध में संपर्क किए जाने पर केंद्रीय कार्मिक मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि ऐसा कर्मचारियों के काम में पारदर्शिता और दक्षता लाने के लिए किया जा रहा है।
बाबुओं को इस वर्ष दो बार देना होगा संपत्ति का विवरण
सरकार किसी भी स्तर पर किसी भी कर्मचारी के खिलाफ भेदभाव नहीं करना चाहती। केंद्र सरकार ने अभी तक भ्रष्टाचार निरोधक निकाय लोकपाल का गठन नहीं किया है। इस संबंध में एक संशोधन विधेयक की एक संसदीय समिति द्वारा पड़ताल की जा रही है। लोकपाल-लोकायुक्त और इससे संबंधित अन्य संशोधन विधेयक गत वर्ष आठ दिसंबर को लोकसभा में पेश किए गए थे।
केंद्र सरकार के सभी अधिकारियों को इस साल अपनी संपति और जिम्मेदारियों से संबंधित ब्योरा दो बार देना होगा। लोकपाल अधिनियम के कार्यान्वयन के मद्देनजर यह फैसला लिया गया है। लोकपाल-लोकायुक्त अधिनियम के तहत अधिकारियों को पहली अगस्त, 2014 तक का पहला रिटर्न इस साल 30 अप्रैल से पहले जमा करना होगा।
अधिनियम के तहत 31 मार्च 2015 को समाप्त हो रहे मौजूदा वित्तीय वर्ष के लिए रिटर्न 31 जुलाई से पहले देना होगा। केंद्रीय कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग द्वारा जारी आदेश में यह जानकारी दी गई है।