झाड़ू इफेक्ट से मुश्किल में मोदी सरकार और केजरीवाल
दिल्ली के चुनाव में भाजपा को लगी झाड़ू की उड़ रही धूल से संसद में मोदी सरकार का एजेंडा खराब होने की नौबत आ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाजपा की हार से आत्मविश्वास में आया विपक्ष अब झाड़ू की ताकत के बल पर मोदी सरकार को संसद में झटका देने के लिए तैयार है।
लिहाजा, संसद के बजट सत्र में मोदी सरकार को आधा दर्जन के करीब अध्यादेशों को कानूनी जामा पहनाने में नाकों चने चबाने की नौबत आ सकती है। सरकार के आर्थिक सुधारों के एजेंडे पर भी चुनौतियों के बादल गहराने के आसार बन गए हैं। सरकार के खेमे में इसे लेकर आज से ही चिंता शुरू हो गई है। सरकार के रणनीतिकार इससे दो-चार होने की योजना बनाने लगे हैं। जबकि आप की जीत से गैर भाजपाई दलों का हौसला बुलंद हो गया है।
दिल्ली में खाता खोलने में नाकाम रही कांग्रेस भी अब आम आदमी पार्टी समेत दूसरे दलों को साथ मिलकर हार से हिली मोदी सरकार का जीना हराम करने के मूड में है। सिर्फ राज्यसभा ही नहीं बल्कि लोकसभा में भी विपक्ष आक्रामक होने को तैयार है। कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने कहा कि आप की जीत से विपक्ष भी मजबूत होगा। संसद में हम आप के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार है। कांग्रेस ही नहीं जदयू, तृणमृल कांग्रेस, वामदल और सपा ने तो पहले ही आम आदमी पार्टी को दिल्ली चुनाव में समर्थन दिया है। अब समर्थन का यह सिलसिला संसद के बजट सत्र में भी चल सकता है। सरकार बीमा, कोयला, खनन, भूमि अधिग्रहण और ई-रिक्शा के क्षेत्र को लेकर सरकार अध्यादेश ला चुकी है। इसे बजट सत्र में कानूनी जामा पहनाने की सरकार की तैयारी है।
विपक्ष के तेवरों को देखकर सरकार के उच्च पदस्थ सूत्र संकेत दे रहे है कि वे विपक्ष के साथ बातचीत की पेशकश कर सकता है। मगर विपक्ष भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर सबसे ज्यादा नाराज है। आम आदमी पार्टी ने भी इसका विरोध किया है। पंजाब में उनकी पार्टी इसे लेकर राज्य की भाजपा-अकाली सरकार के खिलाफ ताल ठोक रही है।
केजरी को काफी हद तक केंद्र पर होना पड़ेगा निर्भर
आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भले दिल्ली में ऐतिहासिक जीत हासिल की हो लेकिन केंद्र के साथ मधुर संबंध बनाए बिना सफलतापूर्वक शासन करना उनके लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकता है। इसकी वजह है दिल्ली का केंद्र शासित राज्य होना और दिल्ली सरकार का ज्यादातर कामों के लिए केंद्र पर निर्भर होना।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केजरीवाल को जीत के बाद चाय का न्योता देकर दिल्ली और केंद्र के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध बनाने का संकेत दिया है लेकिन उनकी सरकार केजरीवाल की सरकार पर कितनी मेहरबान होगी, यह देखना दिलचस्प होगा। केजरीवाल ने भी अपनी तरफ से सकारात्मक शुरुआत की पहल करते हुए प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात का वक्त मांगा है। केजरीवाल और राजनाथ के बीच बुधवार को मुलाकात तय भी हो गई है।
विशेष दर्जे के तहत केंद्र शासित राज्य होने की वजह से दिल्ली सरकार को कोई भी बिल विधानसभा में पेश करने से पहले केंद्र की मंजूरी की जरूरत पड़ती है। ऐसे में कई विधेयकों पर दोनों के बीच तकरार की संभावना अभी से जताई जा रही है। साथ ही दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के केंद्र के अधीन होने के चलते केजरीवाल को कॉलेज और स्कूल खोलने के चुनावी वादों को पूरा करने में खासी मशक्कत करनी पड़ सकती है। दिल्ली पुलिस भी गृह मंत्रालय के तहत आती है। भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा, कानून व्यवस्था से जुड़े मामलों पर केजरीवाल को केंद्र से सहयोग की दरकार होगी। बिजली और पानी का मसला भी लंबे समय से दिल्ली और केंद्र सरकार के बीच तकरार का मुद्दा रहा है। इन पर बड़े वादे कर चुके केजरीवाल को केंद्र से हमेशा दो चार होना पड़ेगा।