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एक और महत्वपूर्ण बिल पर पलटी मार रहे मोदी

Sat, 27 Dec 2014 10:48 PM IST
Updated Sat, 27 Dec 2014 10:48 PM IST
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modi government made u turn on Land Acquisition bill

मोदी सरकार अध्यादेश के जरिए भूमि अधिग्रहण मुआवजा एवं पुनर्वास अधिनियम-2013 से जिन प्रावधानों को बदलने जा रही है, उन्हें तत्कालीन भाजपा भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने पार्टी के किसान एजेंडे के तहत भाजपा के संशोधन प्रस्तावों के रूप में विधेयक में जुड़वाया था।

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लोकसभा और राज्यसभा में तत्कालीन नेता विपक्ष सुषमा स्वराज और अरुण जेटली ने इनके समर्थन में भाषण दिए थे। संसद में तब सभी दलों की सहमति से यह विधेयक पारित हुआ था।
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भाजपा की किसान राजनीति से जुड़े एक नेता के मुताबिक वित्त मंत्री अरुण जेटली इस कानून के उन प्रावधानों को नरम करने में सबसे ज्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं, जिन्हें लेकर उद्योग जगत को एतराज है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भाजपा सांसदों को दिए गए रात्रि भोज में जेटली अध्यादेश के प्रारूप को बंटवाना चाहते थे, लेकिन प्रधानमंत्री ने यह कहते हुए कि अभी इस मुद्दे पर विचार करना है, उन्हें रोक दिया।

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पार्टी के अंदर ही उठ रहे विरोध के सुर

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केंद्र सरकार के इस कदम से भाजपा के किसान नेता बेहद असहज हैं। हाल ही में हरियाणा के भाजपा विधायकों की एक बैठक जिसमें केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री वीरेंद्र सिंह और हरियाणा के मंत्री ओम प्रकाश धनकड़ भी मौजूद थे, में यह मुद्दा उठने पर धनकड़ ने कहा कि किसानों के हितों की सुरक्षा की सीधी जिम्मेदारी केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री की है।

यूपीए सरकार जब भूमि अधिग्रहण का नया कानून बना रही थी तब भाजपा ने विधेयक को लचर बताकर किसानों के हित में और कड़े प्रावधान करने की मांग की थी।

तत्कालीन नेता विपक्ष सुषमा स्वराज ने कहा कि किसानों की भूमि अधिग्रहीत करने के लिए कम से कम उस क्षेत्र के अस्सी फीसदी किसानों की सहमति होनी चाहिए।

यूपीए सरकार में भाजपा ने खुद करवाया था प्रावधान

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28 मार्च 2012 को तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने ग्रामीण विकास मंत्रालय की संसदीय स्थाई समिति की तत्कालीन अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, भाजपा किसान मोर्चे के तत्कालीन अध्यक्ष ओम प्रकाश धनकड़, भारतीय कृषक समाज के अध्यक्ष डा. कृष्णवीर चौधरी की बैठक अपने निवास पर बुलाई।

चौधरी ने सरकारी विधेयक की खामियां गिनाते हुए किसानों के हितों की सुरक्षा का एक नया प्रारूप दिया। इस प्रारूप में भूमि अधिग्रहण विधेयक के प्रावधानों पर चर्चा हुई।

जिसमें निजी क्षेत्र की परियोजनाओं को जनहित की परिभाषा से बाहर करने, अधिग्रहण की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने और भूस्वामियों (किसानो) से सलाह (कंसलटेशन) की जगह सहमति (कन्सेंट) का प्रावधान करने के सुझाव शामिल थे।

इस बैठक के बाद भाजपा ने विधेयक में संशोधनों का नया प्रारूप तैयार किया। जिसमें जनहित की मौजूदा परिभाषा, कंसलटेशन की जगह कन्सेंट को अनिवार्य बनाने और उसकी न्यूनतम सीमा 70 फीसदी करने, अधिग्रहण की प्रक्रिया बदलने के वो कड़े प्रावधान विधेयक में जोड़े गए जिन्हें अब भाजपा सरकार ही अध्यादेश के जरिए बदलने जा रही है।

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