जवाबदेही संस्थाओं की कमर तोड़ रही मोदी सरकार?
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सरकार के कामकाज की निगरानी करने वाली संस्थाओं की उपेक्षा के आरोपों के समर्थन में तथ्य और आंकड़े सामने आने लगे हैं। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद सूचना के अधिकार के तहत लंबित आवेदनों की संख्या बढ़ रही है।
लंबित आवेदनों की संख्या 10 जनवरी तक 36,615 थी। आवेदनों की संख्या बढ़ने की सबसे बड़ी वजह केंद्रीय सूचना आयोग के मुख्य आयुक्त का पद चार महीने से खाली होना माना जा रहा है।
केंद्रीय सूचना आयोग ही नहीं बल्कि केंद्रीय सतर्कता आयुक्त और लोकपाल की नियुक्ति भी मोदी सरकार अभी तक नहीं कर पाई है। कांग्रेस ने इन तथ्यों को लेकर सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया में अभियान छेड़ दिया है।
सीवीसी, सीईसी और लोकपाल की नहीं की नियुक्ति
जवाबदेही तय करने वाली संस्थाओं को कमजोर करने के आरोप पर सरकार सफाई दे रही है कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष नहीं होने के चलते ऐसा हो रहा है। अभी मौजूदा कानून के मुताबिक इन नियुक्तियों की प्रक्रिया में नेता प्रतिपक्ष की भी भूमिका होती है।
सरकार का कहना है कि इसके लिए कानून में जरूरी संशोधन किया जाना है। इसलिए इसमें देरी हो रही है। मगर दूसरी तरफ कांग्रेस आरोप लगा रही है कि सरकार इन संस्थाओं को कमजोर कर अपनी जवाबदेही से बच रही है।
पार्टी की ओर से सोशल मीडिया में टिप्पणी की गई है ‘38 हजार से ज्यादा लंबित आवेदन, आ गए पारदर्शिता के अच्छे दिन’। केंद्रीय सूचना आयोग की वेबसाइट के मुताबिक सभी सूचना आयुक्तों के पास लंबित आवेदनों की भरमार है। सात सूचना आयुक्त में विजय शर्मा के पास सबसे ज्यादा 6007 आवेदन लंबित पड़े हैं। उसके बाद यशोवर्धन के पास 4935 आवेदन हैं।