चुनावों से पहले मोदी को मिलीं तीन बड़ी खुशखबरी!
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भाजपा के पीएम पद के दावेदार नरेंद्र मोदी इन दिनों सभी राजनीतिक दलों के निशाने पर हैं। सत्ता-विरोधी लहर का सामना कर रही कांग्रेस मोदी को पटखनी देने के लिए 2002 के गुजरात दंगो की याद दिला रही है।
दंगों के दाग के अलावा इन दिनों नरेंद्र मोदी को भाजपा के भीतर से उठ रहे विरोध की आवाज से भी निपटना पड़ रहा है। टिकट बंटवारे और दूसरे दलों से भाजपा में शामिल होने वाले नेता भी सिरदर्द बनते रहे हैं। कुछ महीने पहले गुजरात का स्नूपगेट कांड भी गले की हड्डी बन चुका है।
लेकिन इन तमाम दिक्कतों और मुश्किलों के बीच गुरुवार को नरेंद्र मोदी को तीन बड़ी खुशखबरी मिलीं। इनमें से दो अदालतों के दरवाजे से आईं और तीसरी चुनाव आयोग की तरफ से।
पहली राहत स्नूपगेट कांड में
पहली खुशखबरी उन्हें गुजरात उच्च न्यायालय से मिली। हाई कोर्ट ने गुजरात के निलंबित आईएएस अधिकारी प्रदीप शर्मा की वो याचिका खारिज कर दी थी, जिसमें स्नूपगेट कांड में एफआईआर दर्ज करने की अपील की गई थी।
यह मामला पूर्व मंत्री अमित शाह के इशारे पर प्रदीप शर्मा और एक महिला आर्किटेक्ट की सर्विलांस कराने से जुड़ा है। प्रदीप का कहना है कि अमित शाह ने ये सब 'साहेब' के इशारे पर किया, जो कोई और नहीं बल्कि मोदी थे।
न्यायमूर्ति जी आर उधवनी ने शर्मा की याचिका खारिज करते हुए कहा कि उनके पास इस मुद्दे का समाधान निकालने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था है। कोर्ट ने कहा कि अगर पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया था, तो उन्हें मजिस्ट्रेट कोर्ट जाना चाहिए था।
एफआईआर दर्ज करने से इनकार
पिछले साल दो न्यूज पोर्टल ने खुलासा किया था कि इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ मामले की जांच कर रहे सीबीआई के अधिकारियों को आरोपी पुलिसकर्मी जी एल सिंघल से कुछ ऑडियो क्लिप मिले थे।
इस बातचीत से खुलासा हुआ कि सिंघल को अमित शाह ने 'साहेब' के इशारे पर एक महिला आर्किटेक्ट और प्रदीप शर्मा का सर्विलांस करने को कहा। स्नूपगेट पर बवाल मचने के बाद गुजरात सरकार ने रिटायर जज की अगुवाई में एक जांच कमिशन बैठाया
हालांकि, इस न्यायिक जांच की वैधानिकता पर सवाल उठाते हुए एक जनहित याचिका दाखिल की गई और यह मामला फिलहाल उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं।
दूसरी राहत बाबूभाई पर मिली
नरेंद्र मोदी को गुरुवार को दूसरी बड़ी राहत मिली। गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार में जल संसाधन मंत्री बाबूभाई बोखारिया को नौ साल पहले कांग्रेसी नेता की हत्या से जुड़े मामले में क्लीन चिट मिल गई।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि गुजरात के मंत्री इस मामले में हत्या के आरोपों का सामना नहीं करेंगे। साल 2008 में एक निचली अदालत ने बाबूभाई को सह-आरोपी बनाया था, लेकिन शीर्ष अदालत ने फैसला उलट दिया।
यह मामला कांग्रेसी नेता मूलू मोधवाडिया की हत्या से जुड़ा है, जिन्हें 16 नवंबर, 2005 को पोरबंदर में उनके घर के बाहर बेहद करीब से गोली मार दी गई थी। 2006 में पुलिस ने गैंगस्टर भीमा दुला को गिरफ्तार कर इस मामले में चार्जशीट दायर की थी।
हत्या के आरोप से मिली क्लीन चिट
साल 2008 में निचली अदालत ने बोखरिया के खिलाफ हत्या और साजिश रचने का आरोप लगाया, क्योंकि कांग्रेसी नेता के बेटे ने कहा था कि मंत्री से उनके पिता को खतरा था।
बाबू ने गुजरात उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, लेकिन जब अदालत से राहत नहीं मिली, तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई। ऐसा माना जाता है कि इस हत्या के पीछे का कारण सियासी और कारोबारी प्रतिस्पर्धा था।
यह मामला इसलिए काफी महत्वपूर्ण है कि बाबूभाई के नाम पर विरोधी दल मोदी पर निशाना साधते रहे हैं। हाल में गुजरात दौरा करने वाले आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने यह मामला खूब उठाया था। ऐसे में अब भाजपा को पलटवार का हथियार मिल गया है।
तीसरी राहत चुनाव आयोग से मिली
सोनिया गांधी ने हाल में शाही इमाम से मुलाकात कर तथाकथित सेकुलर वोट न बंटने देने की अपील की। भाजपा ने मामला लपका और आरोप लगाया कि कांग्रेस अध्यक्ष मजहब के नाम पर वोट मांग रही हैं।
इस बारे में चुनाव आयोग में शिकायत कराने की बात भी कही गई। और गुरुवार को चुनाव आयोग ने मोदी को तीसरी खुशखबरी दी। भारतीय निर्वाचन आयोग के प्रमुख वी एस संपत ने कहा कि अगर सोनिया गांधी-इमाम बुखारी की मंगलवार शाम को हुई मीटिंग लेकर अगर हमारे पास शिकायत आती है, तो इस पर कार्रवाई की जाएगी।
नरेंद्र मोदी अपनी रैलियों में बार-बार कांग्रेस पर वार कर रहे हैं कि वो वोटों की खातिर सेकुलरवाद की माला जप रही है। ऐसे में चुनाव आयोग की ओर से यह आश्वासन कांग्रेस को घेरने का नया मौका दे सकता है।