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मोदी-आडवाणी में क्यों हुआ तीसरा युद्ध?

Fri, 21 Mar 2014 05:38 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली Updated Fri, 21 Mar 2014 05:38 PM IST
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modi again defeated advani and his clout over bjp

दो दिन भाजपा के नींद-चैन चुराने वाले लालकृष्ण आडवाणी क्या चाहते हैं, यह सिर्फ वहीं बता सकते हैं। लेकिन एक बात तय है कि नाजुक वक्त पर अपनी पार्टी में खलबली मचाने का गुर उन्हें खूब आता है।

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बुधवार से शुरू हुआ एक राजनीतिक ड्रामा गुरुवार शाम तक चला। यह जंग मोदी बनाम आडवाणी है और इस बार वयोवृद्ध नेता ने हमला बोलने के लिए लोकसभा सीट का हथियार चुना। कुछ दिन पहले उन्होंने कहा था कि वह अहमदाबाद से ही चुनाव लड़ना चाहते हैं, जहां से वो फिलहाल सांसद हैं। लेकिन जब गुजरात की सीटों पर उम्मीदवारों के ऐलान की बात आई, तो आडवाणी एक बार फिर रूठे।
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उनके रूठने से जो सिलसिला शुरू हुआ, वो आरएसएस की डांट के बाद थमा। लेकिन तमाम नाज-नखरे दिखाने के बावजूद यह साफ हो गया कि इस वक्त भाजपा में मोदी-राजनाथ की इतनी चल रही है कि आडवाणी की जरा भी नहीं चल सकती। यह मोदी की उन पर तीसरी जीत है।
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जब गोवा में माहौल हुआ गर्म

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यह इस‌ राजनीतिक फिल्म की शुरुआत 1975 में हुई और 2014 आते-आते गुरु-चेला का किरदार उलट गया। अब मोदी गुरु दिख रहे हैं और किसी वक्‍त उन्हें राजनीतिक पाठ पढ़ाने वाले आडवाणी शिकस्त खाने वाले चेले की तरह दिख रहे हैं।

पिछले साल गोवा में हुई वो बैठक सभी को याद है, जब गुजरात में लगातार तीसरी बार जीत दर्ज करने के बाद मोदी को चुनाव प्रचार समिति की कमान सौंपने की बात चली। आडवाणी रूठ गए। भाजपा नेता उन्हें मनाने पहुंचे। उनकी करीबी सुषमा स्वराज पहले बैठक में नहीं पहुंची थीं, लेकिन आला कमान के आदेशानुसार उन्हें वहां पहुंचना पड़ा।

लेकिन बहुत जल्द यह साफ हो गया कि आरएसएस के समर्थन के साथ आगे बढ़ रहे राजनाथ सिंह इस कदम से पीछे नहीं हटेंगे। प्रचार समिति की कमान मोदी के हाथ में रही और पहले राउंड में रूठने के बावजूद आडवाणी को हार मिली।

दिल्ली में खेला गया मैच का दूसरा राउंड

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भाजपा की इस सियासी बॉक्सिंग का दूसरा राउंड गोवा से कोसों दूर दिल्ली में खेला गया। मौका था नरेंद्र मोदी को लोकसभा चुनावों में भाजपा का पीएम पद का दावेदार बनाना।

इसकी सुगबुगाहट शुरू हुई, आडवाणी खेमा सक्रिय हो गया और उसने कहा कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से पहले मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाया जाना गलत होगा। इस बार भी आडवाणी बैठक में नहीं पहुंचे। थोड़े मान-मनोव्वल के बाद भाजपा ने आडवाणी को बाईपास करते हुए मोदी के सिर पर पीएम पद के दावेदार का ताज रख दिया।

दलील दी जा रही थी कि मोदी को अगर दावेदार बनाया गया, तो विधानसभा चुनावों में पार्टी को नुकसान हो सकता है और साथ ही एनडीए के सहयोगी दल भी उससे छिटक सकते हैं। लेकिन मोदी की रणनीति ने दोनों आशंकाओं को ढेर कर दिया।

आडवाणी नाराज रहे, मोदी पीएम दावेदार बने

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भाजपा विधानसभा चुनावों तीन राज्यों में धमाकेदार जीत के साथ सामने आई और दिल्ली में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इसके अलावा जैसे-जैसे चुनाव करीब आते गए, दूसरे नेताओं और दलों की भाजपा से करीबी भी बढ़ने लगी। रामविलास पासवान, मोदी के लिए बड़ी कामयाबी लेकर आए।

इसके अलावा जैसा कि दिख रहा है कि भाजपा अब पूरा चुनाव मोदी के नाम पर लड़ रही है और चुनावी सर्वे बता रहे हैं कि वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर सकती है। मोदी की फायरब्रांड छवि से नुकसान की आशंका भले हो, लेकिन अब तक दिख रहा है कि उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं में नई जान फूंकी है।

आडवाणी के मन में कहीं न कहीं पीएम बनने की इच्छा अब भी पल रही है और मोदी का विरोध इसलिए किया गया, लेकिन इस राउंड में भी मोदी की आक्रामक बॉक्सिंग और रेफरी के रूप में राजनाथ-आरएसएस का उनकी तरफ झुकना, आडवाणी पर भारी पड़ा।

भोपाल की चाहत, मिला गांधीनगर

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इस दिलचस्प मैच का तीसरा राउंड दो दिन पहले सामने आया, हालांकि उसकी पटकथा पहले से लिखी जा रही थी। भाजपा चाहती थी कि आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं को अब राज्यसभा का रास्ता पकड़ाया जाए।

लेकिन आडवाणी इतनी जल्दी हार मानने के मूड में नहीं हैं। एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने अहमदाबाद पहुंचे आडवाणी ने साफ कर दिया कि वह लोकसभा चुनाव लड़ेंगे और इसी सीट से लड़ना चाहते हैं। यह मामला तब दब गया। लेकिन जब भाजपा मध्य प्रदेश के अपने उम्मीदवारों पर चर्चा कर रही थी, तो इस मुद्दे ने एक बार फिर सिर उठाया।

इस बार खबर आई कि आडवाणी अहमदाबाद छोड़कर भोपाल जाना चाहते हैं। इसकी कई वजह थीं। गुजरात में अपने करीबी हिरेन पाठक को टिकट दिलाना, मोदी समर्थकों की तरफ से आडवाणी का खेल बिगाड़ने की कोशिश और भोपाल से प्रभावी जीत की उम्मीदें। दो दिन कशमकश चली, लेकिन आडवाणी को अहमदाबाद से ही रजामंदी देनी पड़ी। तीसरा राउंड भी मोदी के नाम।

दोनों खिलाड़ियों को क्या सबक मिला?

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साल 2009 में पीएम इन वेटिंग का दर्जा हासिल करने वाले आडवाणी को उम्मीद थी कि पार्टी उन्हें पर्याप्त तरजीह देगी, लेकिन मोदी का कद जितनी तेजी से पार्टी में बढ़ा, उसने आडवाणी के रौब में सेंध लगा दी है। यही वजह है‌ कि वह नतीजे जानने के बावजूद कुछ न कुछ ऐसा कर बैठते हैं।

जाहिर है, भाजपा का यह ड्रामा बाहर आने से मोदी को कुछ नुकसान हुआ है। आडवाणी को यह जताने का मौका मिल गया कि अपनी नाराजगी के बूते वह अब भी पार्टी के नेताओं को नचा सकते हैं। मोदी नहीं चाहते कि इस वक्‍त ऐसी कोई गड़बड़ हो, इसलिए वह बार-बार आडवाणी को मनाने पहुंच जाते हैं।

लेकिन आडवाणी को तीन राउंड से यह सबक जरूर मिलना चाहिए कि अब भाजपा में उनकी वो बात नहीं रही, जो हुआ करती थी। जन संघ में उनका कद क्या हुआ करता था, लेकिन अब पार्टी की सत्ता दूसरी कतार के नेताओं के पास आ पहुंची है। ऐसे में आडवाणी को सोचना होगा कि मोदी से भिड़कर उन्हें कोई खास फायदा नहीं हो रहा। हां, मोदी का नुकसान जरूर हो सकता है।

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