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एक लाख नए नागा संन्यासी बनाएंगे अखाड़े

Tue, 04 Dec 2012 12:33 AM IST
इलाहाबाद/अनिल सिद्धार्थ
इलाहाबाद/अनिल सिद्धार्थ Updated Tue, 04 Dec 2012 12:33 AM IST
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million naga saints will build a new ring
संगम की रेती पर लगने जा रहा महाकुंभ अबकी कई बड़े बदलाव ला रहा है। महाकुंभ के दौरान जूना समेत विभिन्न अखाड़े मिलकर एक लाख नागा संन्यासी बनाएंगे। शायद यह पहली बार होगा जब एक ही मेला अवधि में एक साथ एक लाख नागा संन्यासी तैयार हों। कभी सनातन धर्म की रक्षा के लिए आदि शंकराचार्य की ओर से जिन नागा संन्यासियों का गठन किया था, उनकी संख्या में कमी देख अखाड़ों ने यह फैसला किया है।
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देश भर में फैले अखाड़ों के विभिन्न आश्रमों, मठों और महामंडलेश्वरों के पास इसके लिए बड़ी संख्या में अर्जियां दी गई हैं। पंचदशनाम जूना अखाड़े के सचिव श्रीमहंत हरिगिरि के मुताबिक पहले शाही स्नानपर्व के बाद तकरीबन पांच हजार जबकि दूसरे शाही स्नानपर्व केबाद पंद्रह हजार ब्रह्मचारियों को नागा के रूप में दीक्षित किया जाएगा। जूना की तरह ही महानिर्वाणी, निरंजनी, अटल, आवाहन, अग्नि, आनंद सहित वैष्णव अखाड़ों की ओर से भी नागा संन्यासियों के लिए कार्ययोजनाएं तैयार की गई हैं। पंचायती अखाड़ा के सचिव महंत नरेंद्र गिरि के मुताबिक  इसकी प्रक्रिया काफी मुश्किल और बाधाओं से भरी है लेकिन यह कठिन अभ्यास इसलिए कराया जाता है ताकि नागा की दीक्षा लेने के बाद वह व्यक्ति पूरी तरह से उसकी मर्यादा का पालन कर सके। निरंजनी के सचिव महंत रामानंद पुरी, आनंद अखाड़े के महंत राजेश्वरानंद, महानिर्वाणी अखाड़े के महंत जगदीश पुरी ने भी स्वीकार किया कि महाकुंभ के दौरान बड़े पैमाने पर नागा संन्यासी तैयार किए जाएंगे।

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दीक्षा से पहले करेंगे खुद का पिंडदान

आमतौर पर किसी गृहस्थ की मृत्यु के बाद उसके परिजनों की ओर से उसकी आत्मा की शांति के लिए पिंडदान कराया जाता है। लेकिन नागा संन्यासियों की शैली एकदम उलट है। वह खुद का पिंडदान करने केबाद ही पद की दीक्षा लेंगे। जूना के सचिव और श्रीमहंत हरिगिरि ने बताया कि अखाड़ों में नागा दीक्षा से ही प्रवेेश होता है। नागा बनने के लिए उनकी जीवनचर्या, स्वभाव, आचरण, पृष्ठभूमि आदि की कड़ी परख की जाती है। नागा बनने वाले ब्रह्मचारी का पंचगुरु शुद्धिकरण करते हैं। इसकेतहत उन्हें चोटी कटाने के बाद उन्हें जनेऊ, कंठी लंगोटी पहनाई जाती है और शरीर पर शिव की खाक, भभूति मली जाती है। इसके बाद उसे भगवा धोती पहनाकर ‘महापुरुष’ बनाया जाता है। इसके बाद भी संकल्प बना रहा तो स्नानपर्वों पर शुभ मुहूर्त में 108 दफे गंगा स्नान के बाद पंचकेश संस्कार कराके उसे पलाश का दंड धारण कराया जाता है। पिंडदान, विजया हवन के बाद आचार्य महामंडलेश्वर दीक्षा देकर नागा बनाते हैं।
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इंद्रियों को जीतने वाला ही नागा
कहते हैं, ‘शरीर खाक हुआ दिल पाक, न कोई माई, न कोई बाप’ यानी नागा बनने का अर्थ जीते जी अपना पिंडदान और शरीर से वस्त्र तक का त्याग करके सभी प्रकार के मोहमाया से मुक्त होकर धर्मरक्षा का संकल्प लेना है। वैसे दार्शनिक अर्थ में नागा उसे कहते हैं, जो सभी प्रकार की मोहमाया से दूर होकर अपने इंद्रियों पर नियंत्रण रखता हो।



पहले शाही स्नानपर्व के बाद तकरीबन पांच हजार ब्रह्मचारियों को नागा के रूप में दीक्षित किया जाएगा। दूसरे शाही स्नानपर्व के बाद पंद्रह हजार को दीक्षित किया जाएगा।
श्रीमहंत हरिगिरि, सचिव, पंचदशनाम जूना अखाड़ा

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