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सोनिया के 'घर' में ही फ्लॉप हुई मनरेगा
विजय गुप्ता/दिल्ली
Updated Thu, 17 Oct 2013 01:23 AM IST
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यूपीए को लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी कराने वाली कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की खास योजना मनरेगा उनके ही घर अमेठी में फ्लॉप साबित हो रही है।
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स्थिति यह है कि अमेठी में पिछले छह महीने के दौरान गरीब ग्रामीण परिवारों को मनरेगा के तहत इस वर्ष मिलने वाले कुल रोजगार का अभी तक सिर्फ 28 फीसदी ही लाभ मिला है।
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योजना के लचर कार्यान्वयन को लेकर ना सिर्फ कांग्रेस आलाकमान नाराज है बल्कि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश की भी नींद उड़ी हुई है। रमेश ने अमेठी में लक्ष्य के मुताबिक रोजगार उपलब्ध ना कराने का ठीकरा उत्तर प्रदेश सरकार पर फोड़ते हुए मनरेगा के खराब प्रदर्शन पर नाराजगी व्यक्त की है।
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दरअसल उत्तर प्रदेश की अमेठी और रायबरेली संसदीय सीट वीवीआईपी है। अमेठी से सोनिया गांधी का पुराना नाता रहा है लेकिन वर्तमान में यह सीट कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के खाते में है।
हाल ही में राहुल गांधी ने अमेठी का दौरा किया था, जहां उन्हें मनरेगा के तहत रोजगार न मिलने की शिकायतें मिली थी। यही नहीं क्षेत्र की खस्ताहाल सड़कों ने भी उनकी नाराजगी बढ़ा दी थी।
उन्होंने संबंधित अधिकारियों से मनरेगा की मौजूदा स्थिति की जानकारी भी ली थी। जिससे उन्हें मनरेगा के लचर क्रियान्वयन का पता चला। राहुल के दौरे के बाद जब मंत्रालय ने प्रदेश में मनरेगा के प्रदर्शन की पड़ताल की तब यह जानकारी मिली कि अमेठी में योजना का लाभ गरीबों को नहीं मिल रहा है।
केंद्रीय ग्रामीण विकास सचिव एलसी गोयल ने पिछले सप्ताह उत्तर प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर मनरेगा के खराब प्रदर्शन पर सख्त नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने बताया कि प्रदेश में मनरेगा के तहत रोजगार का औसत राष्ट्रीय औसत से भी नीचे आ गया है।
राष्ट्रीय स्तर पर चालू वित्त वर्ष में प्रति परिवार को मनरेगा के तहत औसतन 29 दिन का रोजगार मिला है जबकि प्रदेश का औसत 24 दिन का ही है। यही नहीं प्रदेश सरकार ने वित्त वर्ष के लिए मनरेगा के तहत रोजगार उपलब्ध कराने के लिए जो लक्ष्य तय किया है, उसके अनुसार भी रोजगार देने की रफ्तार 30 फीसदी तक कम चल रही है।
सर्वाधिक खराब स्थिति अमेठी की है। यहां मनरेगा के तहत 27.20 लाख कार्य दिवसों का रोजगार देने का लक्ष्य निर्धारित है जबकि छह महीने बीत जाने के बाद भी अभी तक तक जिले के गरीब ग्रामीण परिवारों को महज 7.85 लाख कार्य दिवस का ही रोजगार मिला है जो लक्ष्य का सिर्फ 28 फीसदी ही है।