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महातूफान गुजर गया, डटे रहे ये 3 महानायक...
अमर उजाला, दिल्ली
Updated Tue, 15 Oct 2013 01:39 PM IST
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फैलिन तूफान के गुजर जाने के बाद अब उड़ीसा और आंध्र प्रदेश बिखरी जिंदगियां समेटने की कोशिश में हैं।
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तूफान आने से पहले हुई सटीक भविष्यवाणी और आपातकालीन उपायों की वजह से इस बार 1999 की तुलना में जान का भले कम नुकसान हुआ हो, लेकिन आम जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुका है। बावजूद इसके इस बार इंतजामात वाकई तारीफ के काबिल रहे।
इस बीच कुछ लोग ऐसे हैं, जो संकट की इस घड़ी में नायक नहीं, बल्कि महानायक बनकर उभरे। इनमें से एक सूबे के मुख्यमंत्री हैं, तो दूजे आंध्र के एक जिला कलेक्टर। और तीसरा है एक आम बुजुर्ग, जिसने अपने हौसले से तूफान को बौना साबित कर दिया।
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नवीन पटनायकः तारीफ तो बनती है
उड़ीसा 14 साल पहले भी इसी तरह के तूफान का काल बन चुका है, लेकिन इस बार कहानी जुदा थी। तब दस हजार लोग मारे गए थे, इस बार 36 घंटे में नौ लाख लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया।
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मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की अगुवाई वाली उड़ीसा सरकार ने इस बार केंद्र से मदद लेकर बड़े पैमाने पर लोगों को निकालने के लिए केंद्र से मदद मांगने में जरा हिचकिचाहट नहीं दिखाई।
पटनायक ने खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और रक्षा मंत्रालय से बात कर इस मामले की अहमियत उन्हें समझाई। तूफान के तट पर पहुंचने से 72 घंटे पहले राज्य ने उसके आने की तैयारियां कर ली थीं।
तटीय इलाकों से लोगों को निकाला गया, अधिकारियों को मुस्तैद किया गया और अस्थायी राहत केंद्र बनाए गए। राज्य सरकार ने सभी विधायकों और अधिकारियों को अपने-अपने इलाके की जिम्मेदारी दी गई।
कामकाज में तालमेल ऐसा गजब था कि राज्य को 24 घंटे में बिजली बहाल करने और 48 घंटे में सभी सड़कें साफ करने का भरोसा था।
सौरभ गौड़ः कलेक्टर साहब का कमाल
फैलिन के हाथों खूब मार खाने वाला आंध्र प्रदेश का श्रीकाकुलम जिला राहत और बचाव कार्यों में दिलोजान से जुटा है। जिला कलेक्टर सौरभ गौड़ का कहना है कि भगवान का शुक्र है कि तूफान में ज्यादा नुकसान नहीं हुआ।
दरअसल, वह बड़प्पन दिखा रहे हैं, क्योंकि इस बार उनकी अगुवाई में जिले ने जो तैयारियां दिखाईं, वे अभूतपूर्व थीं। इस पूरे जिले में तूफान की वजह से सिर्फ एक जिंदगी गई। दीवान गिरने से एक महिला मारी गई।
गौड़ ने कहा, "ज्यादातर लोग राहत कैंप से जा चुके हैं। फिलहाल राहत केंद्रों में पांच हजार से कम लोग हैं।"
चंद्रगिरि तारिनीः क्या जीवट है बाबा?
जब गांव का हर आदमी भाग खड़ा हुआ, 60 वर्षीय चंद्रगिरि तारिनी और उनकी पत्नी अपनी झोपड़ी में डटकर रात भर तूफान का सामना करते रहे। किस्मत अच्छी थी, सो उन्हें कुछ नहीं हुआ, लेकिन झोपड़ी का भाग्य इतना अच्छा नहीं था।
तारिनी ने कहा, "मैंने सोचा मरना तो है ही, तो घर में क्यों न मरूं?" फैलिन तूफान का केंद्र रहा गंजम जिले के न्यू पोदमपेटा गांव, जहां के सभी लोगों को तुरंत वहां से सुरक्षित स्थानों पर चले जाने के लिए कहा गया, लेकिन तारिनी नहीं माने।
गांव में अच्छी सड़कें नहीं हैं, इसलिए राहत दल उन्हें शेल्टर होम ले जाने के लिए नहीं आए। गांववालों ने पहाड़ के दूसरी तरफ आसरा लेने का फैसला किया, लेकिन तारिनी ने कहा कि वह चढ़ नहीं पाएंगे, इसलिए अपनी झोपड़ी में ही रहेंगे।
उन्होंने कहा, "आंधियां खौफनाक थी। सबसे पहले छत उड़ी। जब हवा की रफ्तार और बढ़ी, तो मेरी झोपड़ी की दीवारें हिलने लगीं। इसके कुछ देर बाद यह हम पर गिर पड़ी।"