'बलात्कारी से समझौता, गरिमा के खिलाफ'
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बलात्कार के मामलों में अदालत से बाहर किसी तरह का सुलह-समझौता महिलाओं की गरिमा के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने बुधवार को मद्रास हाई कोर्ट के सुझाव को 'एक बड़ी भूल' बताया। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को यह टिप्पणी बलात्कार के एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान की।
मद्रास हाई कोर्ट के न्यायाधीश डी देवदास ने कहा था कि इसी तरह के एक मामले में जिसमें उन्होंने हस्तक्षेप किया था, उसका सुखद अंत यह हुआ था कि बलात्कार का अभियुक्त पीड़िता से शादी के लिए 'राजी' हो गया था। उस मामले में, न्यायाधीश ने कहा कि बलात्कार पीड़िता घटना के बाद गर्भवती हो गई और उसने एक बच्ची को जन्म दिया, वह किसी की पत्नी नहीं है। वह बिन ब्याही माँ है।
अदालत ने कहा कि इस मामले में सबसे अच्छा विकल्प यह होगा कि पीड़िता उस व्यक्ति के साथ एक समझौता कर ले जिसने उसके साथ बलात्कार किया। हालांकि बाद में पीड़ित महिला ने संवाददाताओं से कहा था कि वह कोई समझौता नहीं चाहती है।
क्या था मद्रास हाईकोर्ट का फैसला?
अपनी तरह का अनूठा फैसला सुनाते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने एक रेपिस्ट को पीड़िता से सुलह के लिए जमानत दे दी थी। नाबालिग रेप पीड़िता के माता-पिता नही हैं और वह अब एक बच्चे को जन्म दे चुकी है।
दरअसल मामले में आरोपी वी मोहन ने जमानत के लिए याचिका दायर की थी। उसे कुडोलौर की महिला कोर्ट ने सन 2002 में सात साल की कैद और दो लाख का जुर्माना लगाया था, जबकि दो अन्य को रिहा कर दिया था। जज देवदास ने आरोपी को बेल देते हुए कहा कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि आरोपी और पीड़िता के बीच समझौता हो सके।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, ''हिंदू धर्म, इस्लाम और ईसाई धर्म में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जब विवाद को आपसी सहमति से सुलझाने की कोशिशें हुई हैं और इसके रिजल्ट भी अच्छे मिले हैं क्योंकि इसमें किसी की जीत या किसी की हार का सवाल नहीं होता।'' जस्टिस देवदास ने कहा कि यह मामला मध्यस्ता के जरिए ही सुलझाया जाया जा सकता है।