'लोकायुक्त नियुक्ति मामले में हमें गुमराह किया गया'
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सुप्रीम कोर्ट ने यह स्वीकार किया है कि उत्तर प्रदेश लोकायुक्त की नियुक्ति केमामले में उसे गुमराह किया गया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह अपने हिसाब से इसका निपटारा करेगी।
इसकेसाथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया गया है कि सेवानिवृत्त जज विरेन्द्र सिंह को नियुक्त करने के उसके अपने फैसले को वापस किया जाना चाहिए या नहीं? वास्तव में अदालत ने पाया कि लोकायुक्त पद केलिए जस्टिस विरेन्द्र सिंह केनाम पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने एतराज जताया था।
न्यायमूर्ति रंजन गोगई और न्यायमूर्ति प्रफुल्ल सी पंत की पीठ ने यह स्वीकार किया है कि इस पूरे मामले में उसे गुमराह किया गया है। पीठ ने पाया कि हाईकोर्ट केचीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने विरेन्द्र सिंह की सत्यनिष्ठा पर सवाल उठाते हुए उनकेनाम पर एतराज जताया था।
चीफ जस्टिस के मुताबिक, राज्य के मुख्यमंत्री इस बात पर तैयार भी हो गए थे कि जस्टिस विरेन्द्र सिंह का नाम प्रस्तावित नहीं किया जाएगा। पीठ ने कहा कि अगर विरेंद्र सिंह का नाम उपयुक्त नहीं होगा तो हम 16 दिसंबर को दिए अपने फैसले को वापस ले लेंगे और किसी और को लोकायुक्त नियुक्त कर देंगे।
पीठ ने कहा कि यह उन पर छोड़ दिया जाए कि वह इस मसले का निपटारा कैसे करेंगे। हालांकि अदालत ने यह साफ किया कि अगर फैसला वापस भी लिया जाएगा तो इसे वापस मुख्यमंत्री, विपक्ष के नेता और हाईकोर्ट केचीफ जस्टिस वाले कोलेजियम को वापस नहीं भेजा जाएगा।
'यूपी सरकार ने धोखा दिया'
शीर्ष अदालत उस याचिका पर सुनवाई कर रही है जिसमें आरोप लगाया गया था कि लोकायुक्त मामले में यूपी सरकार ने शीर्ष अदालत को गुमराह किया है।
मालूम हो कि अदालती आदेशों के बावजूद लंबे समय (करीब 20 महीने) से यूपी में नए लोकायुक्त की नियुक्ति न होने से नाराज न्यायमूर्ति रंजन गोगई की अध्यक्षता वाली पीठ ने गत 16 दिसंबर को अपने विशेषाधिकार(संविधान केअनुच्छेद-142) का प्रयोग करते हुए लोकायुक्त पद के लिए राज्य सरकार की ओर से शार्टलिस्ट किए गए पांच नामों में से एक जस्टिस विरेन्द्र सिंह को लोकायुक्त नियुक्त कर दिया था।
ये पांचों नाम उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने पीठ को सौंपे थे। इस लिस्ट में जस्टिस विरेन्द्र सिंह का नाम सबसे ऊपर था।
16 दिसंबर के आदेश के चंद घंटों के बाद चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने राज्यपाल को पत्र लिखकर पूरी वस्तुस्थिति की जानकारी दी। उसके दो दिन बाद सचिदानंद गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि इस पूरे मामले में यूपी सरकार ने धोखा दिया है, लिहाजा इस विरेन्द्र सिंह नियुक्ति को खारिज किया जाना चाहिए।
साथ ही याचिका में 20 दिसंबर को होने वाले शपथ ग्रहण समारोह को भी टालने की गुहार लगाई थी। जिस पर अवकाशकालीन पीठ ने शपथ ग्रहण टालने का निर्देश दिया था।
नहीं बनी आम सहमति
बुधवार को सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि हमें लोकायुक्त नियुक्त करने के लिए बाध्य होना पड़ा क्योंकि अदालती आदेशों के बावजूद 20 महीनों तक मुख्यमंत्री, विपक्ष के नेता और हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस में लोकायुक्त के नाम पर आम सहमति नहीं बन सकी थी। पीठ ने कहा कि क्या अदालत के आदेशों का यही सम्मान है।
सुनवाई के दौरान पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से पेश वरिष्ठ वकील टीआर अंध्यार्जुन से पूछा कि चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ को किस बात पर विरेन्द्र सिंह के नाम पर आपत्ति थी।
आखिर उनकी सत्यनिष्ठा पर शक करने के क्या आधार हैं? इस पर वरिष्ठ वकील अंध्यार्जुन ने पीठ से सवाल किया कि अगर चीफ जस्टिस चंद्रचूड के एतराज के बारे में उन्हें जानकारी दी जाती तो वे क्या करते? पीठ का जवाब था कि तब हम उन्हें लोकायुक्त नहीं करते। पीठ ने कहा कि यह दुखद है कि अदालती आदेशों के बावजूद 20 महीने तक राज्य में लोकायुक्त नियुक्त नहीं हो सका।
चूंकि हम आदेश पारित कर चुके हैं लिहाजा इस फैसले को वापस करने का हमारे पास ऐसा कोई बड़ा कारण होना चाहिए जो अदालत की अंतरात्मा को झकझोर देने वाला हूं।
पीठ ने कहा कि लोकायुक्त की नियुक्त हमने की है लिहाजा हमें संतुष्ट करना होगा। मुख्यमंत्री और चीफ जस्टिस की तसल्ली के लिए हमने यह आदेश नहीं पारित किया है बल्कि हमने अपनी तसल्ली के लिए किया है। पीठ ने कहा कि हमें गुमराह किया गया है हम इसका निपटान करेंगे।