डोभाल की क्षमता पर उठे सवाल, कहां हुई चूक?
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बात 1988 की है। स्वर्ण मंदिर के पास जहाँ एक जमाने में जरनैल सिंह भिंडरावाले की तूती बोलती थी, वहाँ अमृतसर के लोगों और खालिस्तानी अलगाववादियों ने एक रिक्शावाले को बहुत तन्मयता से रिक्शा चलाते देखा। वो इस इलाके में नया था। वैसा ही लग रहा था जैसे आम तौर से रिक्शावाले लगते हैं। लेकिन फिर भी खालिस्तानियों को उस पर कुछ-कुछ शक हो चला था।
स्वर्ण मंदिर की पवित्र दीवारों के आसपास खुफियातंत्र के पैतरों और जवाबी पैतरों के बीच उस रिक्शा वाले को खालिस्तानियों को ये विश्वास दिलाने में दस दिन लग गए कि उसे आईएसआई ने उनकी मदद के लिए भेजा है। ऑपरेशन ब्लैक थंडर से दो दिन पहले वो रिक्शावाला स्वर्ण मंदिर के अहाते में घुसा और पृथकतावादियों की असली पोजीशन और संख्या के बारे में महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी लेकर बाहर आया। वो रिक्शावाला और कोई नहीं भारत सरकार के वर्तमान सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल थे।
खुफिया तंत्र के अलिखित कानून का पालन करते हुए डोवाल को नजदीक से जानने वाले लोग इस कहानी को सुनकर तुरंत कहते हैं कि इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है, लेकिन ये साफ पढ़ा जा सकता है कि इसे सुन कर उनके चेहरे पर एक खास किस्म की मुस्कान आ जाती है। बहुत इसरार करने और नाम न बताने की शर्त पर इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के एक पूर्व अधिकारी बताते हैं, ''इस ऑपरेशन में बहुत बड़ा जोखिम था लेकिन हमारे सुरक्षा बलों को खालिस्तानियों की योजना का पूरा खाका अजीत डोवाल ने ही उपलब्ध कराया था। नक्शे, हथियारों और लड़ाकों की छिपे होने की सटीक जानकारी डोवाल ही बाहर निकाल कर लाए थे।''
जासूसी के लिए बनते थे मोची
इसी तरह अस्सी के दशक में डोवाल की वजह से ही भारतीय खुफिया एजेंसी मिजोरम में पृथकतावादियों के शीर्ष नेतृत्व को भेदने में सफल रही थी और चोटी के चार बागी नेताओं ने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के सामने हथियार डाले थे। डोवाल के मातहत काम कर चुके एक अधिकारी बताते हैं, 'हम लोगों पर कोई ड्रेस कोड लागू नहीं था। हम लोग कुर्ता पायजामा, लुंगी और साधारण चप्पल पहन कर घूमा करते थे। सीमा पार जासूसी के लिए जाने से पहले हम लोग दाढ़ी बढ़ाते थे। अंडर कवर रहना सीखने के लिए हम लोग जूते बनाने तक का काम सीखते थे ताकि हम टारगेटेड इलाके में मोची का काम करते हुए खुफिया जानकारी जमा कर सकें।'
अजीत डोवाल ने खुद सात साल पाकिस्तान में बिताए हैं। हाँलाकि एक जमाने में उनके बॉस रहे और आईबी और रॉ के पूर्व प्रमुख एएस दुलत कहते हैं कि डोवाल वहाँ भारतीय उच्चायोग में बाकायदा पोस्टिंग पर थे, अंडर कवर एजेंट के तौर पर नहीं। लेकिन डोवाल ने विदर्भ मैनेजमेंट एसोसिएशन के समारोह में भाषण देते हुए एक कहानी सुनाई थी, 'लाहौर में औलिया की एक मजार है, जहाँ बहुत से लोग आते हैं। मैं एक मुस्लिम शख्स के साथ रहता था। मैं वहाँ से गुजर रहा था तो मैं भी उस मजार में चला गया। वहाँ कोने में एक शख्स बैठा हुआ था जिसकी लंबी सफेद दाढ़ी थी। उसने मुझसे छूटते ही सवाल किया कि क्या तुम हिंदू हो?'
डोवाल ने उन्हें बताया कि नहीं। डोवाल के मुताबिक, 'उसने कहा मेरे साथ आओ और फिर वो मुझे पीछे की तरफ एक छोटे से कमरे में ले गया। उसने दरवाजा बंद कर कहा, देखो तुम हिंदू हो। मैंने कहा आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? तो उसने कहा आपके कान छिदे हुए हैं। मैंने कहाँ, हाँ बचपन में मेरे कान छेदे गए थे लेकिन मैं बाद में कनवर्ट हो गया था। उसने कहा तुम बाद में भी कनवर्ट नहीं हुए थे। खैर तुम इसकी प्लास्टिक सर्जरी करवा लो नहीँ तो यहाँ लोगों को शक हो जाएगा।'
हाइजैकर्स यात्रियों को छोड़ने के लिए हुए राजी
डोवाल आगे बताते हैं, 'उसने मुझसे पूछा कि तुम्हें पता है मैंने तुम्हें कैसे पहचाना। मैंने कहा नहीं तो उसने कहा, क्योंकि मैं भी हिंदू हूँ। फिर उसने एक अल्मारी खोली जिसमें शिव और दुर्गा की एक प्रतिमा रखी थी। उसने कहा देखो मैं इनकी पूजा करता हूँ लेकिन बाहर लोग मुझे एक मुस्लिम धार्मिक शख्स के रूप में जानते हैं।' ये कहानी चूँकि खुद डोवाल के मुँह से आ रही है, इससे ये आभास मिलता है कि वो कुछ समय के लिए ही सही, लेकिन एक अंडर कवर एजेंट के तौर पर काम कर रहे थे।
कंधार हाईजैक मामले में भी अजीत डोवाल ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी। डोवाल के बारे में ये भी कहा जाता है कि 90 के दशक में उन्होंने कश्मीर के खतरनाक अलगाववादी कूका पारे का ब्रेनवाश कर उसे काउंटर इंसर्जेंट बनने के लिए मनाया था। 1999 के कंधार विमान अपहरण को दौरान तालिबान से बातचीत करने वाले भारतीय दल में अजीत डोवाल भी शामिल थे। रॉ के पूर्व चीफ दुलत कहते हैं, 'उस दौरान कंधार से डोवाल मुझसे निरंतर टच में थे। ये उनका ही बूता था कि उन्होंने हाइजैकर्स को यात्रियों को छोड़ने के लिए राजी किया। शुरू में उनकी मांग भारतीय जेलों में बंद 100 चरमपंथियों को छोड़ने की थी लेकिन अंतत: सिर्फ तीन चरमपंथी ही छोड़े गए।'
डोवाल के एक और साथी सीआईएसएफ के पूर्व महानिदेशक केएम सिंह कहते हैं, 'इंटेलिजेंस ब्यूरो में मेरे ख्याल से ऑपरेशन के मामले में अजीत डोवाल से अच्छा अफसर कोई नहीं हुआ है। 1972 में वो आईबी में काम करने दिल्ली आए थे। दो साल बाद ही वो मिजोरम चले गए, जहाँ वो पाँच साल रहे और इन पाँच सालों में मिजोरम में जो भी राजनीतिक परिवर्तन हुए, उसका श्रेय अजीत डोवाल को दिया जा सकता है।' केएम सिंह आगे बताते हैं, 'अस्सी के दशक में पंजाब की हालत बहुत खराब थी। वो पंजाब गए और ब्लैकथंडर ऑपरेशन में उनका जो योगदान रहा उसका वर्णन करना बहुत मुश्किल है।'
मछुआरों को फांसी से पहले दिलवाई मांफी
उन्होंने बताया, 'भारतीय पुलिस में 14-15 साल की नौकरी के बाद ही पुलिस मेडल मिलता है। ये अनूठे अफसर थे जिन्हें मिजोरम में सात साल की नौकरी के बाद ही पुलिस मेडल दे दिया गया। सेना में कीर्ति चक्र बहुत बड़ा पुरस्कार माना जाता है, जो सेना के बाहर के लोगों को नहीं दिया जाता। अजीत डोवाल अकेले पुलिस अफसर हैं जिन्हें कीर्ति चक्र भी मिला।' डोवाल के जानने वालों का मानना है कि 2005 में रिटायर हो जाने के बावजूद भी वो खुफिया हल्कों में काफी सक्रिय थे।
अगस्त 2005 के विकीलीक्स केबल में जिक्र है कि डोवाल ने दाऊद इब्राहिम पर हमला करवाने की योजना बनाई थी लेकिन मुंबई पुलिस के कुछ अधिकारियों की वजह से इसे अंतिम समय पर अंजाम नहीं दिया जा सका। हुसैन जैदी ने अपनी किताब 'डोंगरी टू दुबई' में इस घटना का विस्तार से जिक्र किया है। अगले दिन टाइम्स ऑफ इंडिया के मुंबई संस्करण में इस बारे में एक खबर भी छपी लेकिन डोवाल ने इसका खंडन किया। उन्होंने मुंबई मिरर को दिए इंटरव्यू में बताया कि उस समय वो अपने घर में बैठकर फुटबाल मैच देख रहे थे।
जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और अजीत डोवाल को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया तो लोगों को आश्चर्य नहीं हुआ। उसके बाद से मोदी सरकार में उनकी पैठ इस हद तक बढ़ गई कि कहा जाने लगा कि उन्होंने गृहमंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के असर को कम कर दिया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि उनकी निगरानी में भारत को कुछ बड़ी सफलताएं मिलीं हैं, चाहे वो फादर प्रेम कुमार को आईएस के चंगुल से छुड़वाना हो या श्रीलंका में छह भारतीय मछुआरों को फाँसी दिए जाने से एक दिन पहले माफी दिलवाना हो या देपसाँग और देमचोक इलाके में स्थायी चीनी सैन्य कैपों को हटाना हो डोवाल को वाहवाही मिली है लेकिन कई मामलों में उन्हें नाकामयाबी का मुंह भी देखना पड़ा है।
नेपाल गतिरोध रोकने में नाकमयाब
नेपाल के साथ जारी गतिरोध, नगालैंड के अलगाववादियों से बातचीत पर उठे सवाल, पाकिस्तान के साथ असफल बातचीत और पठानकोट हमलों ने अजीत डोवाल को सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया है। अंग्रेजी के अखबार 'इंडियन एक्सप्रेस' के सह संपादक सुशांत सिंह कहते हैं, ''आप मानेंगे कि जहाँ तक पड़ोसी देशों का संबंध है, भारत की स्थिति पिछले 18 महीनों में अच्छी नहीं रही है। चाहे मालदीव हो, चाहे नेपाल हो या पाकिस्तान के साथ कभी हाँ कभी ना का माहौल है। जहाँ तक आतंक और आंतरिक सुरक्षा का सवाल है, भारत पर दो-तीन आतंकवादी हमले हुए हैं, चाहे वो पठानकोट का हमला हो या गुरदासपुर का। कश्मीर में आतंकवाद बढ़ा है। इस क्षेत्र में अजीत डोवाल से ज्यादा उम्मीदें थीं क्योंकि ये उनका फील्ड था। लेकिन यहाँ भी वो बेहतर काम नहीं कर पाए हैं।'
वहीं जानेमाने सामरिक विश्लेषक अजय शुक्ल कहते हैं, ''अजीत डोवाल अपने समय के एक बहुत ही काबिल और सफल इंटेलिजेंस अफसर रहे हैं। लेकिन ये कोई जरूरी नहीं कि अगर कोई शख्स अपने फील्ड का विशेषज्ञ हो तो दूसरे फील्ड में भी उसको उतनी ही महारत हासिल होगी।'' शुक्ल कहते हैं, ''उनकी जानकारी विदेशी संबंधों, कूटनीति और सैनिक ऑपरेशनों के बारे में उतनी नहीं है जितनी इंटेलिजेंस के क्षेत्र में। जब ऐसा ऑपरेशन आता है जिसमें ये तीनों पहलू मौजूद होते हैं तो एक इंसान के लिए अपने स्तर पर सारे फैसले लेना शायद उचित नहीं है। ऐसे जटिल ऑपरेशन के समय उन्हें सारे फैसले खुद लेने की बजाए क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप की बैठक बुलानी चाहिए थी। अकेले ऐसे फैसले लेने से बचना चाहिए था, जो कि बाद में इतने अच्छे साबित न हों।''
दूसरी ओर दुलत का मानना है कि डोवाल का अब तक का कार्यकाल बहुत अच्छा रहा है, क्योंकि मोदी और उनके के बीच तालमेल बहुत अच्छा है। असल में समय और इंसान के साथ स्टाइल बदलता है। दुलत कहते हैं, ''मैंने ब्रजेश मिश्र के साथ काम किया है। वो भी बहुत बड़ी हस्ती थे। वाजपेयी साहब के समय में तीन-चार बहुत बड़े संकट आए। लेकिन हर बार बहुत सोच-समझ कर रिएक्ट किया गया। आजकल रिएक्शन बहुत जल्दी आता है।'' दुलत इसकी मिसाल भी देते हैं, ''जब संसद पर हमला हुआ। ब्रजेश मिश्र पूरी घटना को टेलीविजन पर देख रहे थे। किसी तरह की कोई एक्साइटमेंट नहीं थी कि वो भागे जाएं प्रधानमंत्री के पास। वो चुपचाप देख रहे थे, सिगरेट पी रहे थे और सोच रहे थे कि इसके परिणाम क्या होंगे। वो लंच के बाद ही प्रधानमंत्री के पास गए। उसके बाद ही उन्होंने भाषण दिया कि ये नहीं चलने वाला। फिर उन्होंने पाकिस्तान को चेतावनी दी।''
100 की बजाय छोड़े गए तीन आतंकी
दुलत के मुताबिक, ''उनके जमाने में हुई हाइजैकिंग के बारे में आलोचना हुई कि आतंकवादी क्यों छोड़े गए। लेकिन इसके सिवा चारा भी क्या था? वहाँ बहुत ही विपरीत वातावरण था क्योंकि तालिबान से हमारा कोई संपर्क नहीं था। शुरू में तो वो लोग करीब सौ लोगों की रिहाई चाहते थे। लेकिन धीरे-धीरे इस माँग को पहले 75 पर लाया गया, फिर 25 पर और अंतत: तीन लोग छोड़े गए।'' डोवाल पर एक आरोप यह भी लगता है कि वो हर जगह खुद उपस्थित होकर हर चीज हैंडिल करना चाहते हैं। इंडियन एक्सप्रेस के सुशांत सिंह कहते हैं, ''असल में डोवाल ने बहुत सारा भार अपने ऊपर ले लिया है। इसी का नतीजा ये रहा कि जब पठानकोट हुआ तो उन्हें चीन से होने वाली सीमा वार्ता स्थगित करनी पड़ी।
130 करोड़ लोगों के देश में ऐसा नहीं होना चाहिए कि आप अपने सबसे बड़े पड़ोसी से बातचीत सिर्फ इसलिए स्थगित कर दें क्योंकि छह आतंकवादी किसी जगह में घुस गए हैं।'' लेकिन डोवाल के समर्थक कहते हैं कि उन्होंने ये जिम्मेदारी इसलिए ली है क्योंकि नरेंद्र मोदी ने खुद ये जिम्मेदारी उन्हें सौंपी है। दुलत कहते हैं, ''बात वहीं आ जाती है कि मोदी चाहते क्या हैं? अगर मोदी डोवाल पर निर्भर रहते हैं और चाहते हैं कि वो ही सारे काम करें तो अजीत डोवाल के सामने कोई दूसरा विकल्प नहीं है।'' डोवाल के आलोचक कहते हैं कि उनकी भाषी परिष्कृत नहीं है। वो मुंहफट हैं और आउट ऑफ टर्न बोलते हैं। इस मामले में दुलत उनका बचाव करते हैं, ''वो जो कुछ भी बोलते हैं सोच-समझ कर बोलते हैं। जहाँ तक उनके खरा खरा बोलने की बात है, हो सकता है वो जानबूझ कर कुछ खास लोगों तक अपनी बात पहुंचाना चाह रहे हों और ऐसा किसी तय नीति के तहत हो रहा हो।''
कई पूर्व जनरलों को ये बात नागवार गुजरी है कि पठानकोट में पूरी तरह से सैनिक ऑपरेशन को संभालने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) को भेजा गया। सुशांत सिंह कहते हैं, 'डोवाल के राज में भारतीय सुरक्षा, व्यक्तिकेंद्रित हो गई है। यहाँ हर स्थिति से निपटने के लिए पहले से तय तरीके हैं जिनकी अवहेलना की जा रही है। डोवाल जिम्मेदारी को बांटने में यकीन नहीं करते और हर चीज को खुद माइक्रो मैनेज करना चाहते हैं।' फिलहाल डोवाल निशाने पर हैं। अगर उनके नेतृत्व में भी भारत में प्रो एक्टिव सामरिक सोच विकसित नहीं होती, तो ये उनके करीने से बनाए जबरदस्त ट्रैक रिकार्ड पर कुछ धब्बे लगा सकता है और ऐसा डोवाल शायद कभी नहीं होने देना चाहेंगे।