क्या चुनाव जीतने की गारंटी है शादीशुदा न होना?
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क्या भारत में शादीशुदा न होने से चुनावों में फायदा मिलता है? ये सवाल पूछा है सिंगापुर के अखबार स्ट्रेट टाइम्स ने।
स्ट्रेट टाइम्स ने लिखा है, 'भारतीय चुनावों में प्रधानमंत्री पद के दो बड़े दावेदारों भाजपा के नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के राहुल गांधी शादीशुदा नहीं हैं। कोई और देश होता तो यह बात अजीब लगती लेकिन भारत में ऐसा नहीं है।'
हालांकि मोदी ने इन चुनावों मे अपने शादीशुदा होने की की बात स्वीकार ली। चुनावी हलफनामें में उन्होंने जसोदाबेन को अपनी पत्नी बताया। फिर भी विदेशी मीडिया में उनका कुंवरापन ही छाया है।
कई कुंवारे नेता चुनाव में दिखा रहे हैं दमखम
अखबार ने लिखा है कि 63 वर्षीय मोदी की शादी परिजनों ने किशोरावस्था में कर दी थी लेकिन वे जल्द ही इस संबंध को छोड़कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सक्रिय हो गए।
जहां तक कांग्रेस नेता राहुल गांधी की बात है तो 43 वर्षीय इस नेता को बरसों पहले लातिन अमेरिकी गर्लफ्रेंड के साथ देखा गया था पर इसके बाद उनका किसी से रिश्ता चर्चा में नहीं आया है। अखबार लिखता है कि भारत के कई शीर्ष राजनीतिज्ञ कुंवारे हैं और चुनाव में काफी दमखम दिखा रहे हैं।
बीजू जनता दल के अध्यक्ष और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भी शादी नहीं की है। जनता के बीच नवीन बेहद लोकप्रिय हैं।
विदेशों में विवाहित नेताओं को मानते हैं जिम्मेदार
इसी तरह तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी, अन्ना द्रमुक की सुप्रीमो जयललिता और बसपा नेता मायावती भी विवाहित नहीं हैं। लेकिन भारतीय राजनीति में इन तीनों महिलाओं का नाम सम्मान से लिया जाता है।
भारत में किसी राजनीतिक का विवाहित न होना यह संदेश भी देता है कि वह देशसेवा के लिए प्रतिबद्ध है। भारत में मीडिया सार्वजनिक जीवन जीने वाले लोगों के जीवन में ताकझांक करता रहता है, ऐसे में किसी का शादीशुदा नहीं होना बेहतर रहता है।
अन्य देशों में विवाहित नेताओं को ज्यादा जिम्मेदार और बेहतर माना जाता है कि जैसे वे अपने परिवार की देखरेख करते हैं वैसे ही देश की करेंगे। वहां अकेला होना एक तरह से संन्यास का पर्याय होता है।
क्या इस बार देश को नहीं मिलेगी फर्स्ट लेडी?
भारत में इसका उलटा है। माना जाता है कि शादीशुदा नेता भाई-भतीजावाद करेंगे और भ्रष्ट होंगे। वहीं कुंवारे राजनेताओं द्वारा यह संदेश दिया जाता है कि हमारा तो परिवार नहीं है इसलिए हम भला भ्रष्टाचार या पक्षपात किसके लिए करेंगे।
यही बात मोदी और कुछ हद तक फिलहाल राहुल गांधी पर लागू होती है। भारतीय परंपरा में ब्रह्मचर्य को त्याग का प्रतीक माना जाता है। देश या समाज के लिए ऐसा कदम उठाने वालों को आमतौर पर सम्मान की नजर से देखा जाता है।
भारतीय राजनीति में अकेला रहना कई तरह की मुसीबतों से बचाए रखता है। ऐसे कई मामले हैं जब किसी नेता को अपने नजदीकी की हरकत की वजह से शर्मसार होना पड़ा है। अखबार का कहना है कि चाहे मोदी पीएम बनें या राहुल भारत में फर्स्ट लेडी की संभावना नहीं है।