आईआईटी और आईआईएम से आंखें मूंदे बैठी मोदी सरकार
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देश में केंद्र सरकार के कई बड़े केंद्रीय शिक्षण संस्थानों आईआईटी, आईआईएम और केंद्रीय विश्वविद्यालय बिना मुखिया के ही चल रहे हैं। इन संस्थानों में महीनों से प्रमुखों के पद खाली पड़े हैं लेकिन केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय कोई फैसला नहीं ले पा रहा है।
आलम यह है कि मुखिया नहीं होने के चलते इन संस्थानों के शैक्षिक और ढांचागत विकास के मुद्दे लंबित पड़े हैं जिसका सीधा खामियाजा छात्रों को उठाना पड़ा है। शिक्षाविद इसे सरकार की अक्षमता करार दे रहे हैं।
उनका कहना है कि मौजूदा सरकार अपने विचारधारा के लोगों को इन पदों पर चाहती है। लेकिन ऐसे लोग उन्हें नहीं मिल पा रहे हैं तो वह इन्हें खाली ही रखना ठीक समझ रही है।
मोदी सरकार पर लग रहे पक्षपात के आरोप
देश के तीन भारतीय तकनीकी संस्थान बिना निदेशक के ही चल रहे हैं। पटना, रोपड़ और भुवनेश्वर की आईआईटी संस्थान में पिछले कई महीने से कोई निदेशक नहीं हैं। आईआईएम लखनऊ, आईआईएम कोझिकोड और आईआईएम रांची बिना निदेशक के ही चल रहे हैं।
जबकि देश के लगभग दस केंद्रीय विश्वविद्यालय बिना कुलपति के चल रहे हैं। इनमें जम्मू-कश्मीर, बिहार, झारखंड, उड़ीसा और तमिलनाडु के केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रमुख हैं।
यूपीए सरकार के दौरान पटना, रोपड़ और भुवनेश्वर की तीनों आईआईटी के लिए निदेशक की तलाश शुरू हो गई थी। लेकिन मोदी सरकार के नौ महीने के कार्यकाल में नए निर्देशकों की खोज पूरी नहीं हो पाई है।
नियुक्ति न होने से अटका पड़ा विकास का काम
सरकार की ओर से नियुक्त सर्च पैनल की ओर से कई नामों की भी सिफारिश मंत्रालय को की गई थी। लेकिन इसे मंजूरी नहीं मिली है। ये तीनों आईआईटी अस्थायी परिसर से चल रहे हैं।
सूत्रों का कहना है कि निदेशक नहीं होने की वजह से स्थाई परिसर के निर्माण का काम में देरी हो रही है। कार्यकारी निदेशक शक्तियों के अभाव में फैसले लेने में सक्षम नहीं हैं। छात्र अस्थाई परिसर से ही पढ़ाई करने के लिए मजबूर हैं।
शिक्षाविद् इम्तियाज अहमद कहते हैं कि इन बड़े पदों पर तुरंत नियुक्ति होनी चाहिए। नियुक्ति नहीं होने से अनिश्चितता रहती है। दुर्भाग्य है कि मौजूदा सरकार अपने विचारधारों लोगों को ही नियुक्त करना चाहती है। मगर उनके पास इतने लोग नहीं हैं जो शिक्षा क्षेत्र में मशहूर हों। दूसरों को वे नहीं चाहते। इसलिए ये पद खाली पड़े हैं। ये सरकार की अक्षमता है।