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नई पीढ़ी में दिखती है बेताबी

Sun, 30 Nov 2014 01:07 AM IST
मनोज बाजपेयी/राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त विख्यात अभिनेता
मनोज बाजपेयी/राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त विख्यात अभिनेता Updated Sun, 30 Nov 2014 01:07 AM IST
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manoj bajpayee.

करीब 21 साल पहले मैंने पहली बार कैमरा फेस किया था। 1993 में ‘बैंडिट क्वीन’ की शूटिंग की थी और इसे लंबा वक्त गुजर चुका है। बीते दो दशक हमारे सिनेमा के लिए बहुत खास रहे। इसकी दुनिया में कई घटनाएं एक साथ हुईं। जिनमें मल्टीप्लेक्सों का आना शामिल है। लेकिन मल्टीप्लेक्सों के आने से पहले ही इस बात के बीज बो दिए गए थे कि सिनेमा को ‘स्विट्जरलैंड’ से बाहर निकालना होगा। आप देखें तो मल्टीप्लेक्स के आते-आते विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप, राकेश मेहरा, दिबाकर बनर्जी जैसे निर्देशक अपनी पहली-पहली फिल्में बनाने को तैयार थे। ये सब उस वक्त के मुख्यधारा के सिनेमा से अलग सोचते थे। नए निर्देशकों की ये पौध अपनी और अपने समय की कहानी कहना चाहती थी। जिन छोटी-छोटी जगहों से यह आती थी, वहां की कहानी कहना चाहती थी। यह निर्देशक फार्मूला फिल्मों से इत्तेफाक नहीं रखते थे। उन्होंने पुरानी पीढ़ी के मुकाबले एक अलग दुनिया को देखा और महसूस किया था। मल्टीप्लेक्स नहीं आते तो इस पीढ़ी को शायद ही मौका मिलता और हम आज भी वैसी फार्मूला फिल्में देखते रहते। मल्टीप्लेक्स के आने से फिल्मों की मांग बढ़ गई। इस पीढ़ी ने फिल्में बनाना शुरू किया और उस दौर के ऐक्टरों में मैं भी था। इस तरह से हमारे सिनेमा ने एक नई करवट ली।

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‘बैंडिट क्वीन’ का हमारे सिनेमा को बदलने में बहुत बड़ा योगदान रहा है। मगर इस फिल्म के बाद ‘सत्या’ के आने तक पांच साल गुजर गए। तब लगा था कि पुरानी चीजें ही बनी हुई हैं और सिंगल स्क्रीन को वैसा ही सिनेमा चाहिए, जैसा चल रहा था। ‘सत्या’ आई तो दो हफ्तों के लिए उसे फ्लॉप मान लिया गया। लेकिन दर्शक धीरे-धीरे उसे देखने पहुंचते रहे और मालूम हुआ कि नीचे-नीचे बदलाव की आग दहक रही है।यह साफ संकेत था कि अगर दर्शकों को आप कुछ और अच्छा देखने को देंगे तो वह तैयार हैं। इसके बाद ‘शूल’ आई, जो कई जगहों पर सफल रही। फिर ‘जुबैदा’ कामयाब हुई। मल्टीप्लेक्सों के साथ हमारे सिनेमा का चेहरा बदला।
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‘सत्या’ के बाद मेरे पास उसके जैसे बहुत सारे ऑफर आने लगे और मेरे सामने रास्ता खुला कि फिल्मों में खलनायक बन जाऊं। यह सच्चाई है कि लोग मेरे पास गठरी में पैसे लेकर आते थे। कैश। कहते कि ये तो आप रख लो, फिल्म बाद में देखेंगे। उन दिनों फिल्मों में काम कुछ इसी तरह से होता था। यह सब ठुकराते हुए मैं अपनी तरह से काम करता रहा। ‘शूल’ के बाद ‘कौन’ आई। तब मैं राम गोपाल वर्मा के लिए काम कर रहा था। उस काम से ही मैं संतुष्ट था और पैसा न मिलने पर भी खुश था।
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तब एक और खास बात हुई। कमर्शियल फिल्मों की स्थापित हीरोइनें रवीना टंडन, करिश्मा कपूर, महिमा चौधरी, उर्मिला मातोंडकर और तब्बू अपने आपको ‘री-इनवेंट’ करना चाह रही थीं, क्योंकि कमर्शियल फिल्मों में नई हीरोइनें आ रही थीं। ऐसे में ये सभी उन फिल्मों को तवज्जो देने लगीं जिनमें मैं था। ऐसे में मैं दोनों ही तरह के सिनेमा में हो गया। मुख्यधारा के सिनेमा में मुझे बना कर रखने में इन नायिकाओं का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इन हीरोइनों के कारण मुझे एक अलग किस्म के हीरो की पहचान मिली, जो कमर्शियल फिल्में भी कर रहा था और बदलते हुए सिनेमा में भी मौजूद था।

वैसे जब भी मैंने मुख्यधारा का सिनेमा किया, हमेशा विषय को तवज्जो दी। ‘अक्स’, ‘राजनीति’, ‘आरक्षण’, ‘सत्याग्रह’ या कोई और फिल्म देख लीजिए। फार्मूला फिल्म में आप मुझे कभी नहीं पाएंगे। आने वाली फिल्म ‘तेवर’ में भी मैं इसके विषय के कारण हूं। फिल्म में मथुरा का यह बाहुबली एक लड़की से प्यार करता है और उससे शादी करना चाहता है। उससे बलात्कार करना नहीं चाहता। उसकी अपनी मर्यादाएं-मान्यताएं हैं। हिंदुस्तान सदा पुरुष प्रधान समाज रहा है। चीजें बदली हैं तो केवल बड़े शहरों में। छोटे शहरों में कहां इस तरह का बदलाव आया है? वहां अगर बदलता तो खाप पंचायतें नहीं होतीं। ‘तेवर’ में मैं नई पीढ़ी के ऐक्टरों (अर्जुन कपूर और सोनाक्षी सिन्हा) के साथ काम कर रहा हूं। इस पीढ़ी को लेकर एक बात जो मुझे सबसे खास लगी वो यह कि ये लोग बहुत ‘डेस्परेट’ (दुस्साहसी) हैं। हालांकि कई लोग इसे नकारात्मक अर्थ में देखते हैं। इस शब्द से मैं खुद को बहुत जुड़ा हुआ महसूस करता हूं। मैं बहुत ‘डेस्परेट’ रहा हूं। जब थियेटर करता था तब भी और जब फिल्में करना शुरू की तब भी। मुझे सब कुछ बहुत जल्दी और बहुत अच्छा चाहिए था। मेरे पास इंतजार करने को समय नहीं था। इस कारण कई बार खीझ होती, पीड़ा होती थी। मेरा मानना है कि जो आदमी जल्दी से जल्दी चीजों को करना चाहता है वह मेहनत भी उतनी करना चाहता है। पीड़ा से गुजरने की उसकी क्षमता भी उतनी ही ज्यादा होती है।


अक्सर मुझसे पूछा जाता है कि मैंने ब्लॉग लिखना क्यों बंद कर दिया। असल में मुझे अचानक बहुत सारे राजनीतिक परिवर्तन होते दिखाई दिए, जिस कारण मैंने यह फैसला लिया। उस माहौल में मुझे बदले की राजनीति होती दिखाई दी। मुझे लगा कि कई लोगों को मेरी बातों का बुरा लग रहा है। जबकि मैं सिर्फ एक अभिनेता के तौर पर समाज में रहता हूं। मैंने विचार किया कि जब मैं व्यक्ति की तरह सोचना बंद करके सिर्फ अभिनेता के तौर पर सोचूंगा तो फिर से ब्लॉग लिखना शुरू करूंगा।

(रवि बुले से बातचीत के आधार पर)

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