फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   manmohan singh is not work as a prime minister

क्यों हुए मनमोहन मजबूर और खामोश?

Mon, 14 Apr 2014 03:47 PM IST
Updated Mon, 14 Apr 2014 03:47 PM IST
विज्ञापन
manmohan singh is not work as a prime minister

प्रधानमंत्री पद संभालते ही मनमोहन सिंह के लिए दिक्कतें शुरू हो गई थीं। उनके कार्यालय के वरिष्ठ अफ़सर जैसे इंट्लिजेंस ब्यूरो के पूर्व प्रमुख एमके नारायणन और जूनियर मंत्री पृथ्वीराज चौहान की वफ़ादारी उनसे ज़्यादा सोनिया गांधी के प्रति थी।

विज्ञापन


संजय बारू कहते हैं कि मनमोहन सिंह ने ख़ुद उनसे स्वीकार किया था कि कांग्रेस अध्यक्ष के पास सत्ता का केंद्र है और उनकी सरकार पार्टी के प्रति जवाबदेह है।
विज्ञापन


सरकार चलाने में सोनिया गांधी की दख़लंदाज़ी इस हद तक थी कि 2009 में सत्ता में वापस आने के बाद उन्होंने मनमोहन सिंह से पूछे बिना प्रणव मुखर्जी को वित्त मंत्री का पद ऑफ़र कर दिया था जबकि वो सीवी रंगराजन को वित्त मंत्री बनाना चाहते थे।
विज्ञापन
विज्ञापन


बारू की नज़र में सोनिया का प्रधानमंत्री पद अस्वीकार कर देना एक राजनीतिक रणनीति थी। उन्होंने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री ज़रूर नामांकित किया था लेकिन उन्हें वास्तविक सत्ता नहीं सौंपी थी।

सोनिया गांधी के 'आदमी'

manmohan singh is not work as a prime minister

मनमोहन सिंह एनएन वोहरा को प्रधानमंत्री का प्रधान सचिव बनाना चाहते थे लेकिन सोनिया एक रिटायर्ड तमिल अफ़सर को इस पद पर देखना चाहती थीं।

ये अलग बात थी कि उस अफ़सर ने ही इस पद को लेने से इनकार कर दिया और टीकेए नायर को इस पद पर लाया गया जिनका क़द ब्रजेश मिश्रा की तुलना में कहीं कम था।

संयुक्त सचिव पुलक चटर्जी को भी सोनिया के कहने पर प्रधानमंत्री कार्यालय में नियुक्ति दी गई और वो रोज़ सोनिया गांधी से मुलाकात कर उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय में हो रहे कार्यकलापों के बारे में बताया करते थे और उनसे ज़रूरी फ़ाइलों के बारे में निर्देश लेते थे।

चुपचाप रहते थे मनमोहन

manmohan singh is not work as a prime minister

मनमोहन सिंह को गपशप और स्मॉल टाक का कोई शौक नहीं था। जब कभी भी वो अमृतसर और कोलकाता की अपनी यात्राओं के दौरान अपने रिश्तेदारों या दोस्तों से मिला करते थे, उनकी समझ में ही नहीं आता था कि वो उनसे क्या बात करें और उनकी पत्नी गुरुशरण कौर पर बातचीत जारी रखने की ज़िम्मेदारी आ पड़ी थी।

मज़े की बात ये है कि अपने अर्थशास्त्री दोस्तों जैसे जगदीश भगवती और आईजी पटेल की संगत में भी मनमोहन ज़्यादातर चुप ही रहते थे और उनको ही बात करने दिया करते थे।

दिलचस्प बात ये थी कि मनमोहन सिंह को उन लोगों का साथ अधिक पसंद था जो बातूनी हुआ करते थे। बारू कहते हैं कि परवेज़ मुशर्रफ़, हामिद करज़ई, जॉर्ज बुश और महमूद अहमदीनेजाद बातचीत करने के शौकीन थे, इसलिए मनमोहन सिंह को उनका साथ अच्छा लगता था।

मनमोहन को गॉर्डेन ब्राउन और हू जिन ताओ का साथ उतना पसंद नहीं था क्योंकि वो भी उनकी तरह कम बोला करते थे।

ठंडे पानी से स्नान करते थे मनमोहन

manmohan singh is not work as a prime minister

केंब्रिज विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई के दौरान वो अपने सभी सहपाठियों से पहले उठ कर स्नान कर लिया करते थे, क्योंकि उन्हें इस बात पर शर्म आती थी कि वो कॉमन बाथरूम में बिना पगड़ी और खुले बालों के साथ जाएं।

सुबह तड़के नहाने के समय बाथरूम में गर्म पानी उपलब्ध नहीं होता था, इसलिए मनमोहन सिंह केंब्रिज की कड़कड़ाती ठंड में भी ठंडे पानी से नहाया करते थे।

बारू लिखते हैं कि सुबह जल्दी उठने की अपनी आदत के कारण ही प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वो साढ़े आठ बजे नाश्ता कर लेते थे। एक बार जब बारू ने प्रधानमंत्री के साथ नाश्ते पर कुछ प्रकाशकों को आमंत्रित किया तो दो लोग समय पर नहीं पहुंच सके।

हिंदुस्तान टाइम्स की मालकिन शोभना भारतिया ने देर से आने का कारण यह बताया कि उन्हें अपने बाल सुखाने में लंबा समय लगता है। जबकि देरी से आने पर टाइम्स ऑफ़ इंडिया की प्रमुख इंदु जैन का कहना था कि उनकी सुबह की पूजा लंबे समय तक चलती है।

11 घंटे करते थे काम

manmohan singh is not work as a prime minister

बारू पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की कार्यशैली की तुलना करते हुए कहते हैं कि वाजपेयी अपना कार्यकाल समाप्त होते-होते थोड़े धीमे पड़ गए थे। उनका दिन देर से शुरू होकर जल्दी ख़त्म हो जाया करता था।

लेकिन मनमोहन सिंह सुबह नौ बजे से रात नौ बजे तक काम करते थे। हाँ बीच में दिन के खाने के बाद वो एक घंटे की नींद ज़रूर लेते थे।

खाने के मामले में मनमोहन सिंह को कोई आडंबर नहीं पसंद था। वो अक्सर शाकाहारी खाना ही खाते थे। हाँ कभी-कभी मछली भी खा लिया करते थे। वो हमेशा चपाती को पराठे से ज़्यादा तरजीह दिया करते थे।

गुरुशरण कौर ये सुनिश्चित करती थीं कि वो क्या खाते हैं और कब खाते हैं। काम के बीच ऊर्जा लेने के लिए वो मैरी बिस्किट के साथ चाय पिया करते थे।

प्रधानमंत्री बनने के कुछ दिनों बाद ही जब उन्होंने कुछ संपादकों को सुबह के नाश्ते पर बुलाया तो उनके सहयोगी विक्रम दोराईस्वामी ने उनसे पूछा कि नाश्ते का क्या मेन्यू रखा जाए? उनका जवाब था वही जो आप हमेशा रखते हैं।

वाजपेयी से साथ काम कर चुके दोराईस्वामी ने सीरियल, फल और अंडों के साथ न सिर्फ़ पूरे इंग्लिश ब्रेकफॉस्ट की व्यवस्था कराई बल्कि दक्षिण भारतीय नाश्ते इडली, दोसा और उपमा का भी ऑर्डर किया।

संपादक लोग अभी नाश्ते का पहला कोर्स ही खा रहे थे कि मनमोहन सिंह ने फल और टोस्ट खाने के बाद चाय मांग ली और बारू को संपादकों से कहना पड़ा कि आप तकल्लुफ़ मत करिए और खाना जारी रखिए क्योंकि प्रधानमंत्री तो बहुत कम खाते हैं।

मनमोहन हमेशा 'सोनिया' जी कहते थे

manmohan singh is not work as a prime minister

मनमोहन सिंह एक और नियम का बहुत सख़्ती से पालन करते थे और वो ये कि सुबह तड़के उठ कर बीबीसी ट्यून करना।

यही वजह थी कि 2004 में उन्हें सबसे पहले सुनामी का पता चला और बीबीसी सुनने के बाद ही उन्होंने कैबिनेट सचिव को डिज़ास्टर मैनेजमेंट ग्रुप की आपात बैठक बुलाने का आदेश दिया।

यूपीए-एक के शुरुआती दिनों में वो और सोनिया नियमित रूप से 7 आरसीआर (प्रधानमंत्री निवास) में मिला करते थे। जब भी कोर ग्रुप की बैठक होती थी सोनिया दस मिनट पहले आती थीं और मनमोहन सिंह से सबसे पहले अकेले में मिलती थीं।

लेकिन इन दोनों के बीच कोई और दूसरा सामाजिक संपर्क नहीं था। अकेले में सोनिया उन्हें मनमोहन कह कर पुकारती थीं लेकिन मनमोहन उन्हें हमेशा सोनिया जी कह कर ही पुकारा करते थे।

अहमद पटेल अक्सर सोनिया के संदेश वाहक का काम करते थे और जब अहमद पटेल की 7 आरसीआर में आवाजाही बढ़ जाती थी तो अटकलें लगने लगतीं थीं कि मंत्रिमंडल में फेरबदल होने वाला है।

बारू लिखते हैं कि प्रधानमंत्री हमेशा करुणानिधि को सबसे ज़्यादा सम्मान दिया करते थे। जब भी वो उनसे मिलने आते थे वो उन्हें अपने निवास के पोर्टिको में रिसीव करते थे, जबकि दूसरे आगंतुकों के लिए वो अपने कमरे के दरवाज़े तक ही आते थे।

घर पर करते थे भाषण का अभ्यास

manmohan singh is not work as a prime minister

बारू लिखते हैं कि शुरू-शुरू में मनमोहन सिंह टीवी पर दिए जाने वाले भाषणों का घर पर अभ्यास किया करते थे। उनकी आवाज़ बहुत पतली थी और उनको महत्वपूर्ण शब्दों पर ज़ोर देने की आदत नहीं थी। इसलिए वो बिना रुके अगले वाक्य पर पहुंच जाते थे।

उन्हें टीवी कैमरे के सामने मुस्कराना भी नहीं आता था। कई बार बारू को उनके कान में फुसफुसाना पड़ता था, ‘मुस्कराइए’।

मीडिया से मिलने से पहले बारू अक्सर उनसे पूछते थे कि क्या आप फ़्रेश होना चाहेंगे। इस पर मनमोहन सिंह का जवाब होता था, ’क्या शेर कभी अपने दांत साफ़ करता है।’

उनके ज़्यादातर भाषण उर्दू में लिखे होते थे क्योंकि उन्हें हिंदी पढ़नी नहीं आती। वो न सिर्फ़ अच्छी उर्दू जानते हैं, बल्कि उर्दू साहित्य और काव्य पर भी उनकी बहुत अच्छी पकड़ है। मुज़फ़्फ़र राज़मी के एक शेर को वो बहुत पसंद करते हैं,
एक जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने
लमहों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई।

लालू, शरद पवार थे मनमनोहन के ज्यादा करीब

manmohan singh is not work as a prime minister

बारू कहते हैं कि मनमोहन सिंह के अपने मंत्रिमंडल के लोग जैसे एके एंटनी, अर्जुन सिंह और वायलार रवि उनके सबसे बड़े आलोचक थे जबकि सहयोगी दलों के नेता रघुवंश प्रसाद सिंह, लालू प्रसाद यादव और शरद पवार उनके ज़्यादा करीब थे।

अर्जुन सिंह तो मंत्रिमंडल की बैठक या सार्वजनिक समारोहों पर मनमोहन सिंह के आने पर खड़े भी नहीं होते थे। बाद में सोनिया के कहने पर वो ऐसा करने लगे थे लेकिन आधे मन से।

यूपीए-एक के सामाजिक विकास कार्यक्रमों का श्रेय लेने के लिए सोनिया के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद और प्रधानमंत्री कार्यालय में होड़ लगा करती थी।

बहुत कम लोगों को पता है कि भारत निर्माण कार्यक्रम प्रधानमंत्री कार्यालय के सोच की उपज थी और इसका मसौदा संयुक्त सचिव आर गोपालकृष्णन ने तैयार किया था।

बारू मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार थे और उनके काफी करीब भी थे। इस किताब में कई जगह उनकी तारीफ़ हुई है।

सोनिया गांधी और कांग्रेस के हस्तक्षेप से हुई गलतियां

manmohan singh is not work as a prime minister

बारू का मानना है कि मनमोहन सिंह से ग़लतियाँ तभी हुईं जब सोनिया गांधी और कांग्रेस ने उनके फ़ैसलों में हस्तक्षेप करना शुरू किया।

उदाहरण के लिए 2009 के चुनाव के बाद मनमोहन ए राजा और टीआर बालू को अपने मंत्रिमंडल में नहीं लेना चाहते थे लेकिन उन्हें पार्टी के दबाव में राजा को मंत्रिमंडल में शामिल करना पड़ा था।

प्रधानमंत्री कार्यालय ने संजय बारू की किताब को क्लिक करें कोरी कल्पना करार दिया है। उनके वर्तमान मीडिया सलाहकार पंकज पचौरी का कहना है, "उन्होंने (संजय ने) अपने उच्च पद का दुरुपयोग करते हुए विश्वसनीयता पाने की कोशिश की है और व्यावसायिक उपलब्धियाँ हासिल करने के लिए इसका इस्तेमाल किया है।"

ये किताब ऐसे समय पर आई है जब भारत में चुनाव प्रचार अपनी चरम सीमा पर है।

पत्रकार और फ़िल्म निर्माता प्रीतीश नंदी ने इस पर दिलचस्प टिप्पणी की है, "अंतत: मनमोहन सिंह ने अपनी वकालत करने के लिए किसी को ढूंढ ही लिया। संजय बारू ने अब तक के सबसे अप्रभावी प्रधानमंत्री के लिए बेहतरीन लीपापोती का काम किया है।"

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed