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मनमोहन को मुश्किलों ने मजबूत बनाया
डरबन से लौटकर उदय कुमार
Updated Fri, 29 Mar 2013 11:31 PM IST
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करीब एक दशक के झंझावातों ने मनमोहन सिंह को अंदर से काफी मजबूत बना दिया है।
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अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भारतीय हितों का मुद्दा हो या घरेलू मामलों में सरकार चलाने की जद्दोजहद, यहां तक कि अपनी अगली भूमिका को लेकर उठे सवालों पर भी उनके चेहरे का आश्वस्त भाव इसी ओर इशारा करता है।
डरबन के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से लौटते हुए बृहस्पतिवार को अपने विशेष विमान में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह साथ चल रहे पत्रकारों के बीच आए तो उनके चेहरे पर कहीं अस्सी साल के उम्र की थकान नहीं थी।
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एक दिन पहले लगातार देर रात तक मुलाकातों का दौर चलता रहा। इसके बावजूद सुबह बिल्कुल तरोताजा। सवालों की बौछार से बचाव के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन भी साथ पहुंचे, लेकिन मनमोहन ने खुद ही संभाल लिया।
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पिछली बार आसियान शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए कंबोडिया जाते समय एफडीआई का मुद्दा इतना गर्म था कि मनमोहन पत्रकारों से बचते नजर आये थे, लेकिन इस बार डीएमके के साथ छोड़ने और मुलायम-मायावती की ‘समर्थन राजनीति’ पर सवाल उठने पर प्रधानमंत्री बेफिक्र नजर आए।
उन्होंने साफ कहा कि कोई साथ छोड़ जाएगा इससे मैं इंकार नहीं करता, लेकिन मैं आश्वस्त हूं कि हमारी सरकार पांच साल का कार्यकाल पूरा करेगी। इसके पीछे का गणित उनके पास जरूर होगा, लेकिन इशारा भी साफ था कि ये पार्टियां यूं ही धमकियां देती रहती हैं।
एक सवाल पर तो उन्होंने साफ कहा कि गठबंधन की पार्टियों की अपनी मजबूरियां हैं, लेकिन उन मजबूरियों को हम अपनी सुधार प्रक्रिया को पटरी से उतारने की इजाजत नहीं देंगे।
चुनावी साल में प्रवेश करती सरकार के मुखिया का यह खुला ऐलान साझेदारों के लिए भी इशारा है कि चुनाव मैदान में उतरना है तो जनता के हितों को गठबंधन धर्म के कारण दरकिनार नहीं किया जाएगा। सबसे अहम मनमोहन का खुद पर जताया विश्वास भी है।
जब उनसे पूछा गया कि प्रधानमंत्री के तौर पर एक दशक पूरा करने जा रहे हैं और विश्व के कई नेताओं ने 80 की उम्र के बाद भी काफी कुछ किया है तो आप आगे खुद की भूमिका के बारे में क्या सोचते हैं, इस पर मनमोहन ने बड़ी फुर्ती से गेंद जनता के पाले में डाल दी कि मैंने तो पूरी निष्ठा से देश की सेवा की है।
मैं सफल हुआ या नहीं इसका मूल्यांकन देश की जनता ही करे। साफ है कि वे अपनी लंबी पारी देख रहे हैं। इसी संदर्भ में जब पूछा गया कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अगर उनसे तीसरी बार प्रधानमंत्री पद संभालने का अनुरोध करें तो क्या आप स्वीकार करेंगे, इस पर मनमोहन ने राजनीतिक जवाब नहीं दिया।
ऐसे सवालों पर आम तौर पर उम्मीद की जाती है कि लोग ‘आलाकमान की जैसी इच्छा’ पर छोड़ देते हैं, लेकिन मनमोहन सिंह ने इसे काल्पनिक सवाल बताते हुए सधा हुआ जवाब दिया कि जब पुल पर पहुंचेंगे तो उसे पार भी कर लेंगे। यह स्पष्टत: उस राजनीतिक परिपक्वता की ओर इशारा करती है जो मनमोहन ने 9 साल में सरकार चलाने के अर्थशास्त्र से सीखा है।
ब्रिक्स की उपलब्धियों से उत्साहित मनमोहन
ब्रिक्स सम्मेलन की उपलब्धियों से मनमोहन खासे उत्साहित नजर आए, क्योंकि उनके हिसाब से इस बार ब्रिक्स के कई सकारात्मक कदम पिछली बार दिल्ली में हुए सम्मेलन के बाद के प्रयासों से संभव हुए हैं, लेकिन यह यात्रा मुख्य रूप से चीन के नए राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात के इर्द गिर्द ही घूमती रही।
मनमोहन ने भी इस मौके को खाली जाने नहीं दिया। ऐसा कम ही होता है कि इस तरह की पहली मुलाकात में सीमा विवाद जैसी किसी उलझी हुई समस्या पर कोई बात करे, लेकिन यह मनमोहन सिंह की कूटनीतिक परिपक्वता का नतीजा है कि इस दोस्ती की शुरुआत में ही उन्होंने ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन की गतिविधियों पर सवाल उठा दिए।
इसी के साथ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बहाने मनमोहन ने विश्व पटल पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। तीन महीने के अंदर दूसरी बार रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन से यहां हुई बातचीत भी इशारा करती है कि ये महाशक्तियां मनमोहन को डमी प्रधानमंत्री के तौर पर नहीं, बल्कि सुलझे हुए अर्थशास्त्री और विद्वान राजनेता के रूप में आंकती हैं। फिर भी, इसके फलाफल क्या निकलेंगे यह समय ही बताएगा।