फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   manmohan singh anxious not being history person

नाकामियों से मुंह मोड़ PM की इतिहास पुरुष बनने की चाह

Sat, 04 Jan 2014 08:16 AM IST
संजय मिश्र/अमर उजाला, नई दिल्ली
संजय मिश्र/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 04 Jan 2014 08:16 AM IST
विज्ञापन
manmohan singh anxious not being history person

देश की सत्ता के सिरमौर से अपनी विदाई का ऐलान कर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बेशक राहुल गांधी के रूप में कांग्रेस-यूपीए के नए चेहरे का रास्ता साफ कर दिया।

विज्ञापन


मगर अपनी सरकार की नाकामियों के बोझ से दबी कांग्रेस की नैया इन मुश्किलों से किन पतवारों से राहुल पार लगाएंगे इसकी चिंता तनिक भी नहीं दिखाई।

दस साल तक पीएम रहने के बाद सरकार की तमाम नाकामियों से मुंह मोड़ते हुए मनमोहन सिंह पूरी तरह ऐतिहासिक विरासत में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो इसकी चिंता में दिखे।
विज्ञापन


पढ़ें, जाते-जाते मोदी पर हमला बोल गए मनमोहन!
विज्ञापन
विज्ञापन


खासतौर से अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान आलोचनाओं की बाढ़ झेलने वाले पीएम ने बार-बार यह संदेश देने की कोशिश की कि इतिहास उन्हें उनके कामों के लिए याद रखेगा।

यह ऐतिहासिक विरासत की ही चिंता थी कि अपने कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार से लेकर आलोचनाओं के चुभते सवालों का जवाब देने की बजाय आकलन की जिम्मेदारी इतिहास पर डाल दी।

साथ ही नाकामियों का ठीकरा परोक्ष रूप से कांग्रेस संगठन पर फोड़ते दिखे। शायद प्रधानमंत्री अपने कार्यकाल के दौरान सरकार की आर्थिक नीतियों में संगठन की ओर से हुए कई बार हस्तक्षेप की ओर इशारा कर रहे थे।

विधानसभा चुनावों में हार के कारण के रूप में महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी को तो स्वीकारा मगर बतौर सरकार के मुखिया इन मोर्चों पर नाकामी की जिम्मेदारी एक बार भी कुबूल नहीं की।

भ्रष्टाचार के मामले में तो यूपीए सरकार को दूसरी बार मिले जनादेश को ढाल बनाने से भी नहीं चूके। उपलब्धियों के खाली पिटारे पर नाकामियों की झोली कितनी भारी है इसका संदेश तो पीएम ने खुद भी दिया।

जब अपनी उपलब्धियों की फेहरिस्त में यूपीए की दूसरी पारी में उन्हें बताने को कुछ बड़ा नजर नहीं आया। अमेरिका के साथ परमाणु करार की जो सबसे बड़ी उपलब्धि गिनाई वह भी यूपीए वन की थी।

ऐतिहासिक विरासत की चिंता में पार्टी और सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती बने भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को अहमदाबाद की गलियों में कत्लेआम मचाने वाला तक करार देने में हिचक नहीं दिखाई।

मगर सन चौरासी के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों को न्याय नहीं दिला पाने के कठिन सवाल से यह कहते हुए मुंह मोड़ लिया कि हमने तो माफी मांग ली और मुआवजा दे दिया।

पाकिस्तान का दौरा न कर पाने के लिए भी टीस जाहिर कर पीएम ने अपनी इसी ऐतिहासिक विरासत की फिक्र की ओर ही इशारा किया।

दरअसल दस साल के कार्यकाल में तीसरी बार प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से मीडिया से मुखातिब होने से पहले ही तय था कि मनमोहन बतौर तीसरी बार पीएम पद के उम्मीदवार नहीं हैं।

यही कारण है कि इस दौरान पीएम की पहली और अंतिम प्राथमिकता अपनी ऐतिहासिक विरासत के प्रति चिंता थी। इसलिए उन्होंने अपने कार्यकाल से जुड़ी नाकामियों से साफ मुंह मोड़ लिया।

इस दौरान यह भी याद दिलाया कि उन्होंने पूरी प्रतिबद्धता और ईमानदारी से देश की सेवा की। कार्यकाल के दौरान अपने मित्रों या रिश्तेदारों को लाभ पहुंचाने की कोशिश तक नहीं की।


ऐसा कह कर प्रधानमंत्री ने न केवल विपक्ष को बल्कि पार्टी में भी अपने आलोचकों को भी करारा जवाब देने की कोशिश की।

मुख्य रूप से भ्रष्टाचार के कारण बुरी तरह धराशायी हुई सरकार के साथ-साथ खुद की छवि को इतिहास में दुरुस्त करने के लिए 2009 के जनादेश को ढाल बनाया।

भ्रष्टाचार से संबंधित चुभते सवालों के जवाब में याद दिलाया वर्तमान में उभरे सभी मामले यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल से जुड़े थे। इसके बावजूद देश ने उनकी सरकार को जनादेश दिया।

ऐसा कह कर प्रधानमंत्री ने जनादेश के माध्यम से अपने कार्यकाल की बुराईयों को ढांपने की कोशिश की।

भ्रष्टाचार के आरोपों को विपक्ष का निजी स्वार्थ बताते हुए मीडिया, कैग सहित अन्य संस्थानों पर इसे बेवजह हवा देने का आरोप लगाने में भी पीएम ने हिचक नहीं दिखाई।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed