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क्या क्या हो सकता था मंगलयान के खर्चे पर?
Updated Wed, 06 Nov 2013 12:33 PM IST
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भारत ने आखिरकार मंगल ग्रह पर जाने के अपने महत्वाकांक्षी सपने को पूरे करने की दिशा में बड़ी शुरुआत कर ली है। 450 करोड़ रुपए की लागत से बने मंगलयान को सफलतापूर्वक आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित कर दिया गया।
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मंगल ग्रह पर जाने के भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को बड़ी और महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इस अभियान पर खर्च हुई अच्छी-खासी रकम पर सवाल भी उठाये जा सकते हैं।
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देश की वित्तीय हालत अगर ठीक होती तो भी भारत में 450 करोड़ रुपए की उपयोगिता खासी महत्वपूर्ण है।
ग़ौर कीजिए कि भारत जैसे विकासशील और बड़ी आबादी वाले देश में आम जनता के लिए पानी, सेहत और शिक्षा जैसी सामान्य किंतु आवश्यक सुविधाएं विकसित करने की चुनौती बनी हुई है।
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भारत सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं पर अपने वार्षिक व्यय का सिर्फ 8.1% खर्च करती है। चीन में यह आंकड़ा 12.5% है और ऑस्ट्रेलिया में लगभग 17%।
हर वर्ष भारत में मलेरिया और काला अज़ार जैसे जानलेवा रोगों से सैकड़ों लोगों की मृत्यु हो जाती है। इसका एक बड़ा कारण दवाएं खरीदने के पर्याप्त धन न होना और अस्पतालों और डॉक्टरों की कमी होना है।
काला अज़ार
सिर्फ बिहार में भारत सरकार द्वारा प्रति वर्ष लगभग 25 करोड़ रुपए खर्च करने के बावजूद काला अज़ार से मृतकों की संख्या 100 के करीब होती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह सरकारी आंकड़ा भी वास्तविक मृत्यु दर से बहुत कम है और कई हज़ार लोग गम्भीर रूप से बीमार होते हैं।
गरीबी
अगर 450 करोड़ रुपए सिर्फ इस रोग के बचाव और उपचार में खर्च किये जाएं तो गरीब और पिछडे वर्ग के कितने ही लोगों की जान बचाई जा सकती है।
अगर हम शिक्षा की बात करें तो भारत कई एशियाई देशों से पीछे है। यूनेस्को के अनुसार विश्व के 36% अशिक्षित लोग भारत में रहते हैं और सरकारी प्राइमरी स्कूलों की दयनीय हालत किसी से छिपी नहीं है।
भारत सरकार द्वारा इस साल माध्यमिक शिक्षा पर खर्च किये जाने वाले 3,983 करोड़ रुपयों के सामने 450 करोड़ रुपए भले ही छोटी रकम लगती है, लेकिन इतनी ही राशि से ग्रामीण इलाकों में लगभग 250 नये छोटे स्कूलों का निर्माण हो जाएगा।
प्राइमरी शिक्षा
यानी औसतन 25,000 बच्चों को प्राइमरी शिक्षा उपलब्ध हो सकती है। यही नहीं, अगर मौजूदा स्कूलों में पाठ्य सामग्री की कमी को पूरा करने की कोशिश हो तो 450 करोड़ रुपए में सरकार करीब नौ करोड़ बेसिक पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध करा सकती है।
एक स्वस्थ और शिक्षित देश की भावी पीढ़ी विज्ञान में और कितनी तरक्की करेगी, इस जैसे कितने और मंगलयानों का निर्माण और प्रक्षेपण करेगी, इसकी कल्पना क्या प्रासंगिक नहीं है?
मंगल ग्रह पर पहुंचने वाला पहला सफल एशियाई देश बनने की होड़ में भारत को विकास के मूल मापदण्डों को नहीं भूलना चाहिए।
पटेल की मूर्ति
क्या यह कहना प्रासंगिक नहीं होगा कि अंतरिक्ष विज्ञान में बड़ी-बड़ी छलांग लगाने में करोड़ों-अरबों रुपए खर्च करने की बजाए हर भारतीय को स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं सुलभ कराने से देश कहीं ज़्यादा मज़बूत आधार पर खड़ा होगा और विज्ञान ही नहीं अन्य विविध क्षेत्रों में भी अग्रणी स्थान हासिल करने की क्षमता अर्जित कर सकेगा।
दिक्कत
भारतीय समाज की एक दिक्कत कहिए या विशेषता, यह भी है कि यहां सीमा पर होने वाली हिंसक झड़पें और युद्ध से लेकर महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धियां भी अक्सर राजनीतिक लाभ-हानि का हिस्सा बना दी जाती हैं।
याद कीजिये, क्या पूर्व में दो-दो बार के सफल परमाणु परीक्षणों से उपजा देशभक्ति का ज्वार राजनीतिक दलों के राजनैतिक लक्ष-संधान का बहाना नहीं बना था?
मंगल ग्रह अभियान की ताज़ा सफलता ने भी भारतीय जनमानस में गौरव बोध और देश प्रेम जगाया है।
ऐसे में यहां उठाए गए जनता की मूल ज़रूरतों के सवाल अटपटे और विघ्न संतोषी दिमाग की उपज ठहरा दिए जा सकते हैं।
और इस समय जब 450 करोड़ रुपयों की भी पांच गुना लागत से सरदार वल्लभभाई पटेल की विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा बनाने की चर्चाएं देश भर में गर्मजोशी से चल रही हों, तो एक वैज्ञानिक पहल पर ये सवाल उठाना ख़तरे से खाली नहीं। लेकिन क्या इनसे आंखें चुराई जा सकती हैं?