फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   mangalsutra and nirmala

जानिए निर्मला ने क्यों छोड़ दिया मंगलसूत्र पहनना?

Sat, 18 Apr 2015 03:47 PM IST
Updated Sat, 18 Apr 2015 03:47 PM IST
विज्ञापन
mangalsutra and nirmala

चेन्नई में द्रविदार कड़गम संगठन के एक कार्यक्रम में 20 महिलाओं ने अपना मंगलसूत्र हमेशा के लिए उतार देने का कदम उठाया। संगठन के इस कदम का ऐलान होने के बाद विरोध भी हुआ था। बी.एच. निर्मला उन 20 महिलाओं में शामिल थीं जिन्होंने मंगलसूत्र उतारने का फ़ैसला किया था। उन्हीं के शब्दों में पढ़िए कि उन्होंने ऐसा क्यों किया।

विज्ञापन


दासता का प्रतीक
मेरी शादी 10 साल पहले हुई थी। मेरे पति ने तो तभी कहा था कि ताली (यानि मंगलसूत्र) पहनने की कोई ज़रूरत नहीं है। पर परिवार का दबाव था और मुझे इतनी समझ नहीं थी। तभी से मंगलसूत्र पहन रही हूं। पर समय के साथ मेरी सोच बदली। मेरे मन में ये सवाल उठा कि जब आदमी शादीशुदा होकर कोई ऐसा आभूषण नहीं पहनते तो औरतें क्यों पहनें?
विज्ञापन


फिर मंगलसूत्र मुझे औरतों को दबाने का प्रतीक लगने लगा। आप कहेंगे की ये सिर्फ़ एक धागा है, पर ये बहाना है औरतों पर तरह-तरह के दबाव बनाने का, उन्हें दास जैसा महसूस कराने का। आदमी से कम होने के एहसास की शुरुआत मंगसूत्र और मेट्टी (यानि बिछिया) से ही शुरू होती है। वर्ना आदमी भी ऐसी चीज़ें पहनने को मजबूर किए जाते।
विज्ञापन
विज्ञापन

'विरोध तो होता ही है'

mangalsutra and nirmala

शादी ऐसे दिखावे से नहीं चलती। प्यार के बल पर ही दो लोगों का लंबा साथ खुशी से पूरा होता है। हो सके तो पति और पत्नी को एक दूसरे को ईमानदारी का तोहफ़ा देना चाहिए, वही सबसे सुंदर तोहफ़ा है।

मैं एक निजी कंपनी में सुपरवाइज़र का काम करती हूं। मंगलसूत्र उतारने का फ़ैसला मैंने बहुत सोच-समझ कर लिया। अब मैं उसे दोबारा नहीं पहनूंगी। आदमी और औरत के संबंधों के बारे में मेरी यह समझ हमारे विचारक और समाजसेवी पेरियार के लेख पढ़ने से विकसित हुई।

मेरा सात साल का बेटा और आठ साल की बेटी है। मैं उन्हें अभी से इन विचारों की समझ दे रही हूं, ताकि बड़े होकर वे भी पुरानी मान्यताएं छोड़ दें। समाज शुरुआत में ऐसी सोच का विरोध ही करता है। पर समाज में बदलाव लाना कब आसान रहा है, समय के साथ वह इसे स्वीकार कर लेगा।
(बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य से बातचीत पर आधारित)

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed