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अंतिम संस्कार से 10 मिनट पहले जी उठा

Sun, 20 Jul 2014 09:17 PM IST
संदीप साहू/बीबीसी, भुवनेश्वर
संदीप साहू/बीबीसी, भुवनेश्वर Updated Sun, 20 Jul 2014 09:17 PM IST
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man get alive before his funral

ओडिशा के एक आदमी को मरा हुआ जानकर उनका अंतिम संस्कार किया जा रहा था। लेकिन ठीक 10 मिनट पहले उनके घर वालों को पता चला कि वह जिंदा हैं।

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केन्द्रापड़ा ज़िले के राजपुर गावं के 25 वर्षीय प्रकाश राउत के घर वालों को सूचना मिली थी कि हाल ही में चेन्नई में एक 12 मंज़िला इमारत के ढह जाने से वहां काम कर रहे प्रकाश की मौत हो गई थी।
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यही नहीं, प्रकाश के 'शव' की शिनाख्त के बाद हादसे में मारे गए ओडिशा के तीन अन्य लोगों के शव के साथ उसके 'शव' को भी अंतिम संस्कार के लिए पुरी भेज दिया गया था और उनके घर वालों को इस बारे में सूचना दे दी गई थी।
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उधर चेन्नई में इस घटनाक्रम के बारे में पूरी तरह अनजान प्रकाश 70 घंटे तक मलबे के नीचे दबे रहे।

तो लाश किसकी थी?

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अपनी 'मृत्यु' के बारे में उन्हें तब पता चला जब अस्पताल में उन्होंने अपना परिचय दिया और फिर उन्हें उनके 'शव' का फोटो दिखाया गया।

प्रकाश को जब उनके गांव के अन्य साथियों के फोटो दिखाए गए तो वह समझ गए कि किसी दूसरे आदमी के शव को उनका शव मान लिया गया था। उन्होंने तत्काल अपने घर वालों को फ़ोन किया और उन्हें बताया कि वह ज़िंदा है।

इस बारे में पूछे जाने पर प्रकाश ने बीबीसी को बताया कि ऐन वक्त पर उनके स्थान पर एक अन्य आदमी की ड्यूटी लग जाने का कारण यह गलती हुई।

"उस आदमी की कद-काठी मेरे जैसी ही थी। कपडे भी उसने मेरे जैसे ही पहन रखे थे। ऊपर से पत्थर गिरने से उसका चेहरा बुरी तरह से बिगड़ गया था।"

उधर प्रकाश की मां भावुक स्वर में कहती हैं, "जब प्रकाश ने मुझे फ़ोन पर बताया कि वह ज़िंदा है, तो मैं ख़ुशी से फूली नहीं समाई। आखिर मेरा बेटा यमराज के घर से वापस आया था। अगर उसका फ़ोन 10 मिनट बाद आता तो शायद मैं उसका अंतिम संस्कार कर ही डालती।"

आंध्र प्रदेश की थी वह लाश

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इस खुलासे के बाद छानबीन में पता चला कि जिसे प्रकाश मान लिया गया था, वह दरअसल आंध्र प्रदेश का रहने वाला कोई अन्य व्यक्ति था। इसकी पुष्टि होने के बाद शव को आंध्र प्रदेश भेज दिया गया।

ज़िन्दगी और मौत के बीच गुजरे उन 70 घंटों को याद करते हुए हादसे के 15 दिन बाद भी प्रकाश कांप उठते हैं।

ऐसे हादसे से गुजरने के बाद शायद ही कोई दोबारा बाहर जाकर काम करने की हिम्मत करेगा। लेकिन गरीबी ने प्रकाश के पास इसके अलावा कोई चारा नहीं छोड़ा है।

वह कहते हैं, "हमारे पास न कोई ज़मीन है और न ही रोजी-रोटी का कोई दूसरा साधन। काम नहीं करेंगे तो खाएंगे क्या? आज नहीं तो कल जाना तो पड़ेगा ही।"

इस हादसे के बाद प्रकाश की मां भी अपने बेटे को बाहर नहीं भेजना चाहतीं। लेकिन वह भी जानती हैं कि यह संभव नहीं है।

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