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बंगाल में कायम है ममता का जादू
नई दिल्ली/ब्यूरो
Updated Tue, 30 Jul 2013 10:15 PM IST
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हावड़ा लोकसभा उपचुनाव के बाद पंचायत चुनाव में भी जबरदस्त जीत हासिल कर ममता बनर्जी ने साबित कर दिया है कि पश्चिम बंगाल में उनका जादू फिलहाल कायम है।
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तीन स्तरीय पंचायत चुनाव के नतीजे से वाम दलों के साथ ही कांग्रेस भी सकते में है। इन नतीजों ने निकट भविष्य में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के फिर से एक मंच पर आने की संभावना खत्म कर दी है।
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वहीं वामदलों की बड़ी जीत हासिल कर राज्य में अपना पुराना आधार वापस पाने के मंसूबों पर भी पानी फिर गया है।
उल्लेखनीय है कि तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद तृणमूल कांग्रेस ने राज्य की 17 में से 13 जिला परिषदों में भारी जीत हासिल की है। कांग्रेस केवल मुर्शिदाबाद में ही जीत हासिल कर पाई है।
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खास बात यह है कि तृणमूल को यह जीत शारदा चिट फंड घोटाले के तूल पकड़ लेने और राज्य में हिंसक घटनाओं में तेजी आने के बावजूद हासिल हुई है।
इन चुनावी नतीजों ने वामदलों की ही नहीं बल्कि कांग्रेस के मंसूबों पर भी पानी फेर दिया है। दरअसल कांग्रेस को उम्मीद थी कि गठबंधन तोड़ने के बाद पंचायत चुनाव में ममता को झटका लगेगा।
इसके बाद ममता मजबूरी वश एक बार फिर से यूपीए का दामन थाम लेंगी। कांग्रेस लोकसभा चुनाव से पूर्व यूपीए में घटक दलों की संख्या बढ़ाने की जी-तोड़ कोशिशों में जुटी है। मगर इन नतीजों ने साफ कर दिया है कि दोनों दलों के बीच दूरी फिलहाल बरकरार रहेगी।
वैसे भी इससे पहले गठबंधन टूटने के बाद हावड़ा लोकसभा उपचुनाव जीत कर ममता ने अपनी ताकत कायम रहने का संकेत दे दिया था।
इन नतीजों ने सबसे अधिक वामदलों को सकते में डाला है। दरअसल राज्य में अपना पुराना और पुख्ता आधार वापस लाने में जुटे वामदलों को पंचायत चुनाव में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी।
इनका मानना था कि यूपीए से अलग होने, शारदा चिट फंड घोटाला, राज्य में बढ़ी हिंसा और सरकार विरोधी लहर से वामदलों की चुनावी राह आसान हो जाएगी। मगर अब साबित कर दिया कि राज्य में फिलहाल वामदलों को लंबे समय तक अग्नि परीक्षा देनी होगी।
वामदलों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय अल्पसंख्यक मतदाताओं में तृणमूल कांग्रेस का पुराना आधार कायम रहना है।
उल्लेखनीय है कि राज्य के 28 फीसदी अल्पसंख्यक मतदाताओं की नाराजगी वाम दलों से दूर नहीं हो पाई है। राज्य में वामदलों के तीन दशक से अधिक समय के शासन में इस वर्ग का समर्थन का बड़ा योगदान था।
फिलहाल अब नई परिस्थितियों में इन्हें नए सिरे से रणनीति बनानी होगा। चूंकि लोकसभा चुनाव दरवाजे पर दस्तक दे रहा है, इसलिए जाहिर है कि वामदलों के पास नई रणनीति बनाने और उस पर अमल करने के लिए ज्यादा समय नहीं है।