मलाला: तालिबान के खिलाफ लड़ने वाली लड़की
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पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई को शांति के लिए नोबेल पुरुस्कार मिला है। 12 जुलाई 1997 को जब मलाला का जन्म हुआ था तो किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि ये लड़की बड़ी होकर महिलाओं और मासूम बच्चों की आवाज बनेगी।
2009 में पहली बार मलाला उस वक्त सुर्खियों में आईं जब उन्होंने बीबीसी के लिए 'गुल मकई' के नाम से लिखना शुरु किया। पाकिस्तान के स्वात की रहने वाली मलाला को चरमपंथी अपने लिए खतरा समझने लगे।
इस वक्त स्वात पर चरमपंथियों का पूरी तरह कब्जा हो गया था और तालिबान ने लड़कियों के स्कूल जाने पर पूरी तरह पाबंदी लगी दी थी।
बकौल बीबीसी तालिबानियों के डर के कारण कोई चरमपंथियों के खिलाफ जुबान नहीं खोलता था। स्वात घाटी के केंद्र मिंगोरा में हालात ऐसे हो गए थे कि लोग जब सुबह उठते तो उन्हें शहर के चौराहों पर लटकी हुई लाशें मिलती थीं। कई लोगों को इस वजह से मार दिया गया क्योंकि उन पर तालिबान का विरोध करने का आरोप भर लगा था।
मलाला ने उठाई आवाज तो मिली गोलियां
ऐसे हालातों में मलाला चरमपंथियों के खिलाफ बीबीसी पर लिखती थीं। 2009 में ही सेना की कार्रवाई के दौरान मलाला को अपना घर छोड़ कर शांगला जाना पड़ा।
2010 में स्वात में सरकार का नियंत्रण हो गया और मीडिया ने वहां जाकर स्टोरी करनी शुरू कीं। मीडिया ने मलाला के बारे में भी स्टोरी कीं। इसके बाद 13 साल की मलाला को पूरे पाकिस्तान भर में जाना पहचाना जाने लगा।
अक्तूबर 2012 में चरमपंथियों ने मलाला पर हमला किया। एकबारगी लगा कि मलाला बच नहीं पाएंगीं लेकिन ब्रिटेन में डॉक्टरों ने बहुत कोशिशें कीं और मलाला को बचा लिया गया।
वह 2013 में भी नोबेल पुरुस्कार के लिए नामांकित हुई थीं लेकिन 2014 में भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी के साथ मलाला को भी नोबेल दिया गया। 2013 में उन्हें वूमन ऑफ द ईयर अवार्ड से भी नवाजा गया था।