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मलाला युसूफजई, इससे आगे भी जहान है...

Sat, 11 Oct 2014 10:20 AM IST
Updated Sat, 11 Oct 2014 10:20 AM IST
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सत्रह साल की एक लड़की अगर नोबल प्राइज ले रही है तो इंसानियत के लिए उसकी लड़ाई, उसकी जिद्द और हौसले को महसूस किया जा सकता है।

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मलाला अब एक लड़की का नाम भर नहीं, वह एक प्रतीक बन गई है। उसने दुनिया को संदेश दिया है कि यह दुनिया अंधेरा फैलाने वालों के हवाले नहीं होगी। मशाल हमेशा जलती रहेगी।

कोई मलाला आकर रोशनी फैलाएगी। मलाला का संघर्ष केवल अपने लिए, केवल अपनी पढ़ाई के लिए नहीं था, बल्कि वह उस दुनिया को बदलने के लिए था, जिसमें आज भी महिलाओं को खुली हवा में आने नहीं दिया जाता है।
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जहां बच्चों को तरक्की के लिए पढ़ने नहीं दिया जाता है। बेशक मलाला को नोबल प्राइज मिलने पर पाकिस्तान में खुशी है, मगर यह केवल इस मुल्क की खुशी नहीं है, मलाला की लड़ाई में जिस तरह दुनिया भर के लोग उसके साथ खड़े हुए, यह उनकी भी फतह है।
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12 साल की लड़की ने दुनिया को झकझोर दिया था

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नोबल प्राइज किसी देश या गुट की तरफ से नहीं दिया जाता है। मलाला जिस तरह बारह साल की उम्र से बच्चों की शिक्षा के लिए लड़ी और जिंदगी की परवाह भी नहीं की उस हौसले ने उन्हें यह गौरव दिलाया है।

मलाला को आज नोबल प्राइज मिला है, पर वह दुनिया की नजरों में बहुत पहले ही इज्जत पा गई हैं। उसने बताया है कि दुनिया की कूरितियों से लड़ने की कोई उम्र नहीं होती। एक बारह साल की लड़की भी दुनिया को झकझोर सकती है।

मलाला ने जो सम्मान पाया है उससे पाकिस्तान में जो तरक्की पसंद लोग हैं उन्हें ताकत मिलेगी। ऐसा नहीं कि पाकिस्तान में तरक्कीपसंद, आधुनिक सोच वाले लोग नहीं है। लेकिन वो बहुत कमजोर रहे हैं। हर बार लड़ाई में उन्हें ही मार पड़ती रही है।

मलाला किस मिट्टी की बनी है

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मलाला के साथ भी कट्टरपंथियों ने यही सुलूक करना चाहा था। लेकिन वह किसी और मिट्टी की बनी है। उसने बेखौफ होकर कहा कि वह बच्चों की पढ़ाई के लिए उसकी लड़ाई रोकी नहीं जा सकेगी। बंदूक या तलवार उसके हौसले को पस्त नहीं कर सकते।

आज मलाला उन लोगों के लिए ताकत बन गई है जो डबडबाई आंखों से मुल्क की सूरत बदलना चाहते थे। जिनके मंसूबे रहे हैं कि इस मुल्क की लड़कियां पढ़े।

लोग रोशन ख्याल के हों। इसलिए खबर आते ही ट्यूटर में या सोशल मीडिया में मलाला के उपलब्धि पर अच्छे-अच्छे पैगाम लिखे जा रहे हैं। उसे न्यू फेस आफ पाकिस्तान कहा जा रहा है। कहीं लिखा जा रहा है सेकंड नेम आफ पीस एंड एज्यूकेशन। यही नहीं इमरान खान ने भी मलाला को नोबल प्राइज मिलने पर अपनी खुशी जताई है।

पाकिस्तान को मिला दूसरा नोबेल

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पाकिस्तान के लिए मलाला ऐसे समय में खुशी लाई है, जब कहीं से सुकून नहीं मिल रहा था। जब लग रहा था कि इस मुल्क के नसीब में क्या दिल दुखाने वाली खबरे हैं, तब मलाला का सम्मान फिर से लोग में जोश भर रहा है।

मलाला का विरोध करने वाले अभी शांत है। शायद अभी कुछ कहेंगे भी नहीं, उनका सोशल मीडिया में मजाक भी उड़ रहा है। वे पस्त हुए हैं। कल फिर उठने की कोशिश करेंगे, लेकिन मलाला उनसे बहुत ताकतवर हो गई है। वह लोहे की बन गई है।

पाकिस्तान के लिए यह दूसरा नोबल प्राइज है। लेकिन इस बार नोबल प्राइज अपने साथ बहुत से पैगाम लेकर आया है। दुनिया के जर्रे जर्रे पर जो आतंक और खौफ पसरा है, मलाला की आवाज हर जगह पहुंच रही है।

मलाला को अवार्ड मिलने से पाकिस्तान के उन इलाकों की सूरत बदलेगी जहां मलाला ने अपना संघर्ष शुरू किया है। दुनिया के बेहद खुबसूरत इन इलाकों में लड़कियां किताबों के पन्ने नहीं खोल पाती।

केवल आतंक और कट्टरपंथियों के कारण ही नहीं, बल्कि कबिलाई परंपरा में भी इस बात को महत्व नहीं दिया जाता रहा है कि बच्चे खासकर लड़कियां स्कूल जाएं। पख्तून रीतिरिवाज में अभी भी कई तरह की पाबंदियां हैं। वे अपने आप में कठोर हैं।

मलाला ने जब आवाज उठाई तब सांगला मेंगोप, मोबेन, स्वात घाटी के ये तमाम इलाके दुनिया के नक्शे में आए। हालांकि शुरू में कबिलाई इलाकों में मलाला को इस तौर पर देखा गया कि वह मजहब के खिलाफ जा रही है।

लेकिन अब वक्त बदला है। धीरे-धीरे मलाला के संघष लोगों की समझ में आया। ऐसे में नोबल प्राइज मिलने के बाद यह कोहरा और तेजी से छंटेगा। इसका यकीन किया जा सकता है। लोग अपने रास्ते को पहचानेंगे।

मलाला अपने मन की बात लिखती थी

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मलाला अपने मन की बात लिखती थी। बीबीसी में वह अपनी बातों को बेखौफ भेजती थी। संयोग से उस समय हमें ही उसके वो पत्र पढ़ने को मिलते थे। मलाला पढ़ना चाहती थी। वह उन लोगों का विरोध कर रही थी जो नहीं चाहते थे कि वो स्कूल जाए। पढाई लिखाई करे।

मलाला ने इसके लिए अपनी आवाज को दुनिया तक पहुंचाने का रास्ता चुना। मलाला उस समय केवल बारह वर्ष की थी। लेकिन वह जिस तरह से लिखती थी , उसे देखकर लगता था कि किसी तीस चालीस साल की परिपक्व महिला ने ये बातें लिखी हैं।

शुरू में डायरी के पन्ने प्रकाशित होने के बाद एक बार लगा था कि कहीं यह मलाला के रूप में कोई छद्म नाम तो नहीं। उस समय उसकी डायरी गुल मकई (एक फूल का नाम) के नाम से आन लाइन प्रकाशित होती थी। लेकिन जल्दी हमें पता लग गया कि इसे लिखने वाला कोई और नहीं मलाला ही है।

इस मुकाम पर पहुंच कर मलाला के सामने अब नई चुनौतियां हैं। अब वह बड़ी भूमिका में है। बच्चों की शिक्षा के लिए उसका  जद्दोजहद  उसका संघर्ष आगे भी जारी रहना है। पर उसकी लड़ाई अब बहुत बड़े फलक पर है। वह उन मंसूबों का प्रतीक बन चुकी है, जहां से दुनिया में अमन शांति और तरक्की का रास्ता देखा जा सकता है।

उसे ध्यान रखना होगा कि वह पश्चिम के हाथों भी न खेली जाए। उसकी सबसे बड़ी कसौटी यही होगी कि जो अभी उसके इरादों को नहीं समझ पा रहे हैं, वे धीरे धीरे उसकी ओर आएं। उसे हर पल सजग रहना होगा। क्योंकि दुनिया मलाला शब्द से ही बदलती है। जिंदगी का पहला पड़ाव में मलाला बहुत कुछ जान समझ गई। अभी तो उसे को बहुत कुछ करना बाकी है।

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