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बना इतिहास, पहली बार रात को हुई सुप्रीम कोर्ट में कार्यवाही

Thu, 30 Jul 2015 11:49 PM IST
राजीव सिन्हा/अमर उजाला, नई दिल्ली
राजीव सिन्हा/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 30 Jul 2015 11:49 PM IST
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Making history , first time  Supreme Court proceedings occurred in night

जो आज तक शायद ही दुनिया के किसी देश में हुआ हो, वह गुरुवार को भारत में हुआ। मुंबई सीरियल बम ब्लास्ट के गुनहगार याकूब मेमन की अंतिम याचिका पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार तड़के तीन बजे तीन सदस्यीय पीठ बैठी।

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इस असाधारण सुनवाई में यह अलग बात है कि याकूब की आखिरी कोशिश भी धाराशाही हो गई, पर रात को ही यह अदालती कार्यवाही इतिहास के पन्नों में जरूर दर्ज हो गई। फांसी के निर्धारित वक्त से करीब दो घंटे पहले तक यह सब कुछ चला।
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सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट नंबर-चार में करीब 90 मिनट चली बहस केबाद न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति पीसी पंत और न्यायमूर्ति अमिताभ रॉय की पीठ ने याकूब की फांसी के लिए निर्धारित वक्त को टालने से इनकार कर दिया।

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दिए गए कई तर्क

Making history , first time  Supreme Court proceedings occurred in night

तीन सदस्यीय पीठ ने अपने फैसले में कहा कि अब फांसी को टालना कानून केसाथ मजाक करना होगा क्योंकि याकूब को अपने मामले पर बहस करने के लिए न्यायपालिका और सरकार के समक्ष पर्याप्त मौका मिला।

पीठ ने कहा कि याचिका में कोई ऐसा सवाल नहीं उठाया गया है जो पहले नहीं उठाया गया था। पीठ ने कहा कि इस याचिका में भी वहीं सवाल उठाए गए थे, जिस पर बुधवार को फैसला दिया जा चुका है।

न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि अभी हमारे कलम की स्याही भी नहीं सूखी है कि वहीं मामला दोबारा हमारे पास आ गया। इससे पहले सुनवाई के दौरान याकूब की ओर से पेश वरिष्ठ वकील आनंद ग्रोवर ने कहा कि राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका खारिज को चुनौती देने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला।

परीक्षण ठुकराने का अधिकार

Making history , first time  Supreme Court proceedings occurred in night

याकूब को इसे चुनौती देने के लिए समय दिया जाना चाहिए। ग्रोवर ने कहा कि अप्रैल 2014 में दया याचिका याकूब के भाई की ओर दायर की गई थी। ऐसे में याकूब को खुद भी दया याचिका दायर करने का अधिकार है।

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ही यह स्वीकार किया था कि उसे दया याचिका को ठुकराने पर परीक्षण का अधिकार है। साथ ही उन्होंने कहा कि दया याचिका खारिज होने की तारीख और फांसी देने की तारीख में कम से 14 दिनों का अंतर होना चाहिए।

यह दोषी का अधिकार है जो सुप्रीम कोर्ट ने शत्रुघ्न चौहान मामले में व्यवस्था दी थी। उसे परिवारवालों से मिलने का मौका नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि याकूब को वसीहत तैयार करने तक का मौका भी नहीं दिया गया।

ये थे अटार्नी जर्नल के तर्क

Making history , first time  Supreme Court proceedings occurred in night

वहीं सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल ने पीठ से कहा कि यह कानूनी प्रक्रिया का दुरूपयोग करना है। एक केबाद एक दया याचिका दाखिल करने की इजाजत नहीं दी जा सकती और हर दया याचिका खारिज होने केबाद 14 दिनों की मोहल्लत नहीं दी जा सकती।

अटॉर्नी जनरल ने कहा कि इस तरह तो डेथ वारंट तो कभी भी तामील नहीं किया जा सकता है। बुधवार को दोपहर दो बजे याकूब की दया याचिका राष्ट्रपति सचिवालय को मिली थी, उस वक्त यह अदालत याकूब की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

आपको अदालत से राहत नहीं मिली तो राष्ट्रपति केपास गए और वहां से राहत नहीं मिली तो फिर अदालत आ गए। रोहतगी ने कहा कि वास्तव में याकूब का इरादा है कि चार-पांच सालों तक उसे फांसी न हो और फिर फांसी में देरी के आधार पर सजा को उम्रकैद में बदलने की गुहार की जाएगी।

इसलिए नहीं लगी रोक

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पीठ ने अटॉर्नी जनरल से पूछा कि क्या मेमन केपरिवारवालों को उससे मिलने की इजाजत दी गई है। जवाब में अटॉर्नी जनरल ने कहा कि वे मिल चुके हैं।

साथ ही घरवालों को राष्ट्रपति और राज्यपाल द्वारा दया याचिकाएं ठुकराए जाने की बात भी उन तक पहुंचा दी गई है। तीन सदस्यीय पीठ ने अपने फैसले में कहा कि मुंबई सीरियल ब्लास्ट को 22 वर्ष हो चुके हैं।

हमें नहीं लगता कि डेथ वारंट जारी करने में कोई गलती हुई है। लिहाजा इस पर रोक लगाने का कोई कारण नहीं बनता। मालूम हो कि निठारी कांड केदोषी सुरेंद्र कोली सहित कुछ अन्य मामलों में भी सुनवाई रात को हुई है लेकिन सुनवाई जज के आवास पर हुई थी न कि सुप्रीम कोर्ट में।

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