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तिलक और सुभाष को भूली कांग्रेस सरकार

Sat, 02 Aug 2014 09:03 PM IST
Updated Sat, 02 Aug 2014 09:03 PM IST
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maharashtra govt has no respect for tilak and subhash

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात में यूनिटी ऑफ स्टैच्यू के माध्यम से सरदार बल्लभ भाई पटेल को फिर से जीवंत कर दिया है।

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साथ ही भाजपा के सत्ता में आते ही वीर सावरकर की प्रतिमा के भी अच्छे दिन आ गए, लेकिन महाराष्ट्र के सपूत लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक अपने ही राज्य में उपेक्षित हैं।

महाराष्ट्र सरकार ने सरकारी कार्यालयों में महापुरुषों की तस्वीर लगाए जाने के लिए 28 महान लोगों की जो सूची बनाई है, उसमें तिलक का भी नाम है, लेकिन इन 28 में से जिन महापुरुषों की तस्वीर लगाना अति आवश्यक है, उस सूची से लोकमान्य तिलक का नाम अलग कर दिया गया है।

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सुभाष और सावित्री बाई फूले का भी नाम नहीं

maharashtra govt has no respect for tilak and subhash

महाराष्ट्र भाजपा प्रवक्ता माधव भंडारी ने बताया कि सिर्फ लोकमान्य तिलक ही नहीं, बल्कि नेताजी सुभाष चंद बोस और ज्ञान ज्योति सावित्री बाई फूले का भी नाम सूची में नहीं है। यही वजह है कि नई दिल्ली स्थित महाराष्ट्र सदन में भी तिलक की मूर्ति नहीं लगाई गई है। इससे महाराष्ट्र सरकार की महापुरुषों के प्रति मानसिकता का पता चलता है।

उन्होंने कहा कि दक्षिण मुंबई के गिरगांव चौपाटी पर जिस जगह पर 1 अगस्त 1920 में लोकमान्य तिलक का अंतिम संस्कार किया गया था, वहां स्वराज्य भूमि स्मारक बनाने की मांग हो रही है। इससे नई पीढ़ी को उनके कार्यों और विचारों से प्रेरणा मिल सकेगी।

उन्होंने कहा कि स्वराज्य भूमि स्मारक समिति के प्रमुख प्रकाश सिलम समाधि स्थल के साथ ही यहां ध्वजस्तंभ बनाना चाहते हैं। समिति स्मारक का खर्च भी वहन करने के लिए तैयार है लेकिन सरकार इसकी इजाजत नहीं दे रही है।

तिलक की अंतिम यात्रा में चढ़े थे सोने के फूल

maharashtra govt has no respect for tilak and subhash

‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे मैं लेकर ही रहूंगा’ के उद्घोषक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का भारत के राष्ट्र निर्माताओं में एक विशिष्ट स्थान है।

उनका जन्म 23 जुलाई सन 1956 में हुआ था और एक अगस्त 1920 में तिलक की मृत्यु हो गई थी। बताते हैं कि तिलक की लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि उनके अंतिम संस्कार में जन सागर उमड़ पड़ा था।

अंतिम यात्रा के दौरान मुंबई के झावेरी बाजार में व्यापारियों ने तिलक पर सोने के फूल चढ़ाए थे और इस यात्रा में शामिल लोगों ने चंदन की लकड़ी से उनका अंतिम संस्कार किया था।

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