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पढ़िए, सबसे खतरनाक गुरिल्ला नेता की दास्तान

Sat, 29 Nov 2014 01:08 PM IST
रेहान फजल/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
रेहान फजल/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली Updated Sat, 29 Nov 2014 01:08 PM IST
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ltte leader prabhakaran and his career, analysis of litte.

लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम या लिट्टे के संस्थापक वेलापुल्लई प्रभाकरन की इस हफ्ते 60वीं वर्षगांठ थी। तमिल राष्ट्र के लिए श्रीलंका को गृहयुद्ध में धकेलने वाले प्रभाकरन को कुछ लोग, खासकर तमिल राष्ट्रवादी, अब भी महान योद्धा, स्वतंत्रता सेनानी और जननायक मानते हैं।

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लेकिन कुछ मानते हैं कि वह एक चरमपंथी थे, जिनकी नजर में इंसानी जान की कोई कीमत नहीं थी। एक गोली उनके माथे को चीरती चली गई थी, जिसने उनके कपाल को क्षतविक्षत कर दिया था। इसके अलावा उनके शरीर पर चोट का एक भी निशान नहीं था।
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तमिल टाइगर्स के नेता और संस्थापक वेलापुल्लई प्रभाकरन का शरीर उसी स्थान पर पड़ा था, जहां कुछ घंटे पहले उनकी मौत हुई थी। इलाके में फैली गंदगी के बावजूद उनकी वर्दी बिल्कुल साफ और बेदाग थी।
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उनकी कमर पर एक बेल्ट लगी थी जिससे एक होलस्टर्ड पिस्तौल लटकी थी।। साथ में थे छह इस्तेमाल न हुए कारतूस। उनके सीने पर धातु का एक कार्ड लगा था, जिस पर नंबर लिखा था 001। उनके पास मिले छोटे बैग में अंगूर की महक वाला हैंड लोशन भी मिला था, जिसे सिंगापुर से खरीदा गया था।

प्रभाकरन पर किताब लिखने वाले मेजर जनरल राज मेहता कहते हैं, "अपनी अंतिम लड़ाई में प्रभाकरन मोलाएतुवू क्षेत्र में तीन तरफ़ से घिर गए। चौथी तरफ़ समुद्र था जहां श्रीलंका की सेना ने अपना जाल बिछा रखा था। कहने का मतलब यह कि बचने की गुंजाइश थी ही नहीं। श्रीलंकाई सेना रेडियो पर उनकी बातचीत सुन रही थी, इसलिए उन्हें प्रभाकरन की लोकेशन का अंदाजा था। उन्होंने उन्हें बिल्कुल बैक टू द वॉल कर दिया और उनके लिए कोई जगह छोड़ी ही नहीं।"

ओसामा बिन लादेन जैसा प्रभाकरन का काम

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प्रभाकरन की मौत के बाद श्रीलंका के राष्ट्रपति राजपक्षे ने संसद में ऐलान किया था, "आज से श्रीलंका में कोई अल्पसंख्यक नहीं होगा। अब से यहां सिर्फ दो किस्म के लोग होंगे, एक जो अपने देश को प्यार करते है और दूसरे वो जिन्हें उस धरती से कोई प्यार नहीं है, जहां उनका जन्म हुआ है।"

ओसामा बिन लादेन के आदेश पर न्यूयॉर्क का वर्ल्ड ट्रेड सेंटर गिराए जाने से पहले प्रभाकरन के लोगों ने कोलंबो के भीड़ भरे इलाके में इसी नाम की उतनी ही प्रतीकात्मक इमारत नेस्तानुबूद की थी।

लेकिन ओसामा की तरह प्रभाकरन अमीर मां-बाप की संतान नहीं थे और न उन्होंने दुस्साहसी कामों के लिए किसी और देश में शरण ली थी। न ऐसे काम करने के लिए उन्हें धर्म से प्रेरणा मिली थी। उनका एकमात्र धर्म था तमिल राष्ट्रवाद।

एक दशक के भीतर उन्होंने एलटीटीई को मामूली हथियारों के 50 से कम लोगों के समूह से 10 हज़ार लोगों के प्रशिक्षित संगठन में तब्दील कर दिया था जो एक देश की सेना से टक्कर ले सकता था।

सेक्स की सजा मौत

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उनके निजाम में एलटीटीई सैनिकों को प्रेम संबंध बनाने की मनाही थी। गद्दारी की सिर्फ एक ही सजा थी...मौत।

उन्होंने अपने दो पुरुष और महिला अंगरक्षकों को सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतारने का आदेश दिया था क्योंकि उन्होंने अपने काम के समय में यौन संबंध बनाने की जुर्रत की थी। प्रभाकरन को शराब, सिगरेट और ताश खेलने से भी नफरत थी।

अप्रैल 2002 में उन्होंने 12 साल बाद पहला संवाददाता सम्मेलन किया था जिसमें इनसाइड एन एल्यूसिव माइंड प्रभाकरन के लेखक एम आर नारायणस्वामी भी थे।

नारायणस्वामी कहते हैं, "हमने लिट्टे के कैंप में रात बिताई। सुबह उठकर कुएं के पानी से नहाए। मैंने 32 साल के अपने पत्रकार जीवन में इतनी सिक्योरिटी इससे पहले कभी नहीं देखी। उन्होंने हम सब पत्रकारों को एक-एक करके कमरे में बुलाया। हमारे पेन, कागज, पेंसिल और नोटबुक को उन्होंने बहुत बारीकी से देखा। बल्कि नोटबुक और पेन तो उन्होंने ले ही लिए।"

"हम सबकी उन्होंने अलग-अलग तस्वीर खींची और कैमरामैन से कहा कि वह अपने कैमरों को वहां रखे एक तराजू पर रखें ताकि उनका वजन ले सकें। बाद में हमें पता चला कि उन्हें हर कैमरे का ओरिजनल वजन पता था। वो ये देखना चाह रहे थे कि किसी कैमरे में कोई ऐसी चीज तो नहीं लगी है, जिसकी वजह से उसका वजन बढ़ा हुआ है। उन्होंने बाकायदा हमारे हाथों को दबा-दबाकर देखा कि कहीं इनके मसल्स तो नहीं हैं। कहीं ये प्रशिक्षित लोग तो नहीं हैं, जो पत्रकारों के रूप में वहां आए हैं।"

गले पर टांगता था साइनाइड कैप्सूल

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प्रभाकरन का पहला हथियार था गुलेल जिससे वह चिड़ियों, गिरगिटों और गिलहरियों को मारा करते थे। उसके बाद उनके पास एक एयरगन आ गई थी जिस पर अभ्यास करते-करते उन्होंने अपना निशाना ग़ज़ब का बना लिया था।

प्रभाकरन के जीवनी लेखक नारायणस्वामी कहते हैं, "कभी-कभी प्रभाकरन अपनी कमीज़ के भीतर रिवॉल्वर रखकर धीरे-धीरे चला करते थे और अचानक तेज़ी से मुड़कर एक काल्पनिक दुश्मन पर निशाना लगाया करते थे। बाद में एलटीटीई ने आदेश दिया था कि उसके सभी सैनिकों के पास चमड़े का होल्सटर होना चाहिए। इसका आइडिया प्रभाकरन को हॉलीवुड फ़िल्मों से मिला था।"

उनका हुक्म था कि एलटीटीई का हर लड़ाका अपने गले में साइनाइड कैप्सूल पहनकर चले और पकड़े जाने की स्थिति में उसे खाकर अपनी जान दे दे। उनकी गर्दन में भी काले धागे से एक साइनाइड कैप्सूल टंगा रहता था जिसे वह अक्सर अपनी कमीज की जेब में एक आईडेंटिटी कार्ड की तरह डाल लेते थे।

प्रभाकरन को खाना बनाने का शौक था। अपने चेन्नई प्रवास के दौरान शाम को प्रभाकरन अपने साथियों के साथ सब्ज़ियां काटते थे। उनका प्रिय भोजन था चिकन करी।

लेकिन मुश्किल के दिनों में वह ब्रेड और जैम से भी काम चला सकते थे। वह साफ पानी के बारे में हमेशा सतर्क रहते थे और कभी भी बिना उबाले पानी नहीं पीते थे।

जब बोतल उनके सामने खोली जाए..

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बैठकों के दौरान वह सिर्फ सोडा पिया करते थे और वह भी तब जब बोतल उनके सामने खोली जाए। 1987 में जब प्रभाकरन जाफना में इरोस के दफ्तर गए तो उसके प्रमुख बालाकुमार ने उन्हें पीने के लिए कोक ऑफर की। उनका साथी एक ट्रे में कोक की तीन बोतलें और बॉटल ओपनर लेकर आया।

प्रभाकरन ने एक बोतल खोली और बालाकुमार की तरफ बढ़ाई। बालाकुमार ने जब तक कोक का एक घूंट नहीं ले लिया तब तक प्रभाकरन ने अपने लिए बोतल नहीं खोली।

नारायणस्वामी कहते हैं एक बार उन्होंने अपने एक दोस्त से कहा था, "मैं चाय तभी पीता हूं अगर उसे मैंने स्वयं या फिर मेरी पत्नी ने बनाया हो।"
सफाई का जुनून

वह रोज अपनी दाढी बनाते थे। जैसे-जैसे एलटीटीई का सितारा परवान चढ़ा, प्रभाकरन का सफाई के प्रति जुनून भी बढ़ता गया।

वह जब भी किसी सोफे पर बैठते, तो सबसे पहले उसके हत्थे पर लगी गर्द साफ करते थे। उनको मकड़ी के जालों से नफरत थी। देखते ही वह उन्हें साफ करने के आदेश देते थे।

सुव्यवस्था को वह इतनी गंभीरता से लेते थे कि एलटीटीई के चेन्नई दफ्तर में सभी कमरों और आधा दर्जन मोटर साइकिलों की चाबियां एक निश्चित स्थान पर टंगी रहती थीं। उनके साथियों को निर्देश थे कि टॉयलेट्स हर हालत में साफ-सुथरे रहने चाहिए।

प्रभाकरन को खाली बैठना पसंद नहीं था

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प्रभाकरन एक बार चेन्नई में तमिल नेता नेदूमरण के घर ठहरे थे। एक दिन नेदूमरण ने देखा कि वह कुछ कपड़े धो रहे हैं, जो उनके अपने नहीं हैं। उन्होंने पूछा कि यह आप क्या कर रहे हैं? प्रभाकरन का जवाब था, "मैं आज खाली हूं। इसलिए सोचा कि अपने साथियों के कपड़े धो दिए जाएं।"

चेन्नई के एक मशहूर पत्रकार सदानंद मेनन का कहना है कि उन्होंने प्रभाकरन से ज्यादा शांत इंसान नहीं देखा। भारत में सीएनएन की पूर्व ब्यूरो प्रमुख अनीता प्रताप का भी यही मानना है।

एक बार प्रभाकरन का इंटरव्यू लेने के बाद उन्होंने लिखा था, "मुझे तो वह बेइंतहा साधारण इंसान लगे। हल्के नीले रंग की कमीज़ और सिलेटी पैंट पहने प्रभाकरन को बहुत आसानी से एक तमिल व्यापारी समझने की ग़लती की जा सकती थी।"

जब भी वह पत्रकारों को इंटरव्यू देते, तो अपने सामने एक कलाई घड़ी रखते थे और जैसे ही तय किया गया समय समाप्त होता, वह इशारा करते थे कि बातचीत बंद कर दी जाए। उनकी याद्दाश्त फोटोग्राफ‌िक थी। जिससे वह एक बार मिल लेते थे, उसे कभी नहीं भूलते थे।

1986 में जब भारत श्रीलंका समझौते पर मंत्रणा हो रही थी तो प्रभाकरन को भारत लाने के लिए भारत ने श्रीलंका की अनुमति से भारतीय वायुसेना के दो हेलिकॉप्टर जाफना भेजे थे। उसमें भारतीय विदेश सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हरदीप पुरी भी गए थे।

एक एलटीटीई सदस्य ने हरदीप पुरी के कान में फुसफुसाया, "आप हमारे राष्ट्रीय खजाने को साथ ले जा रहे हैं।" पुरी ने तुरंत जवाब दिया, "मैं आपको वचन देता हूं कि हम जिस जगह से प्रभाकरन को ले जा रहे हैं, उसी जगह उन्हें छोड़कर जाएंगे, चाहे बातचीत का परिणाम कुछ भी हो।"

चपाती और पिस्तौल

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चेन्नई हवाई अड्डे के वीआईपी लाउंज में हरदीप पुरी ने यह सोचकर चिकन करी और चावल का ऑर्डर किया कि ये चीजें प्रभाकरन को पसंद आएंगी। लेकिन प्रभाकरन ने कहा कि वह चपाती खाएंगे, चावल नहीं क्योंकि इसको खाने से पिस्तौल का ट्रिगर दबाने वाली उंगली पर असर पड़ता है।

दिल्ली पहुंचने पर उन्हें अशोक होटल में ठहराया गया। 25 जुलाई को हरदीप पुरी ने उन्हें समझौते की शर्तें पढ़कर सुनाईं, जिसका प्रभाकरन के साथी बालासिंघम ने उनके लिए तमिल में अनुवाद किया।

इसे सुनते ही प्रभाकरन ने ऐलान किया कि ये शर्तें उन्हें मान्य नहीं हैं और वह तमिल ईलम की मांग नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने मांग की कि बातचीत में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमजीआर को भी शामिल किया जाए।

राजीव गांधी ने उनकी मांग मान ली। एमजीआर तुरंत दिल्ली पहुंचे। राजीव गांधी ने अपने अफसरों पर दबाव बनाया कि प्रभाकरन को समझौते के लिए किसी भी तरह से मनाया जाए।

उनका कहना था, "वह ‌जिद्दी जरूर हैं, लेकिन इस समझौते में उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।"

और फिर राजीव गांधी की हत्या...

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प्रभाकरन और उनके प्रतिनिधिमंडल को किसी पत्रकार से नहीं मिलने दिया गया। उनको यह आभास हुआ कि उनसे जबरदस्ती समझौते पर दस्तखत कराए जा रहे हैं।

बहुत मुश्किल से उन्हें राजीव गांधी से मिलने के लिए तैयार करवाया गया। तमिलनाडु के एक मंत्री और उनके साथी बालासिंघम उनके साथ गए। प्रभाकरन ने कहा श्रीलंका सरकार पर विश्वास नहीं किया जा सकता।

राजीव गांधी ने कहा कि वह तमिलों के हित के लिए काम कर रहे हैं। अतत : प्रभाकरन भारत श्रीलंका समझौते को एक मौका देने के लिए तैयार हो गए। नारायणस्वामी बताते हैं कि राजीव गांधी इससे बहुत खुश हुए। उन्होंने तुरंत प्रभाकरन के लिए खाना मंगवाया।

जब वह उनके घर से निकलने लगे तो राजीव ने राहुल गांधी को बुलाया और उनसे अपनी बुलेटप्रूफ जैकेट लाने के लिए कहा। उन्होंने वह जैकेट प्रभाकरन को देते हुए मुस्कराते हुए कहा, "आप अपना ख्याल रखिएगा।"

राजीव गांधी के मंत्रिमंडल के एक सदस्य ने उनसे कहा कि प्रभाकरन को तब तक भारत में रखा जाए, जब तक एलटीटीई के लोग हथियार नहीं डाल देते।

राजीव गांधी ने इसे अस्वीकार कर दिया और कहा, "प्रभाकरन ने मुझे अपनी जुबान दी है। मैं उन पर विश्वास करता हूं।" प्रभाकरन ने वह वचन कभी पूरा नहीं किया और अंतत: राजीव गांधी की हत्या करने का आदेश दे दिया।

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