जब सोनिया अपने ही सिपहसालार से लड़ीं
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सियासत के मैदान में कैसे-कैसे उलटफेर होते हैं, अमेठी की धरती इसकी गवाह कई बार बन चुकी है। 1977 में यहां से इंदिरा गांधी के सियासी वारिस और छोटे बेटे संजय गांधी एक गुमनाम से स्थानीय नेता रवींद्र प्रताप सिंह के हाथों हारे तो 1980 में संजय जीते लेकिन उनकी अकस्मात मौत के बाद उनकी पत्नी मेनका गांधी और बड़े भाई राजीव गांधी के बीच मुकाबला हुआ।
जबकि 1999 में राजीव गांधी की पत्नी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को अपने पहले लोकसभा चुनाव में अमेठी से उन संजय सिंह से मुकाबला करना पड़ा जो 1977 से नेहरू गांधी परिवार के वारिसों के चुनावों का प्रबंधन संभालते थे। यह चुनाव एक तरह से रानी और उसके सिपहसालार की अनोखी भिड़ंत में बदल गया।
1999 में पहली बार लड़ा लोकसभा चुनाव
1991 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान श्रीपेरूम्बदूर में बम विस्फोट में राजीव गांधी के मारे जाने के बाद कांग्रेस ने सोनिया गांधी को पार्टी और सरकार की कमान सौंपनी चाही लेकिन सोनिया ने विनम्रता से मना कर दिया और नरसिंह राव के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनी।
सोनिया ने अपने परिवार के साथ खुद को राजनीति से दूर कर लिया।
1996 के चुनावों में कांग्रेस की हार और नरसिंह राव के कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे के बाद 1998 में सीताराम केसरी को हटाकर सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली और 1999 में वह पहली बार अपने पति स्वर्गीय राजीव गांधी के चुनाव क्षेत्र रहे अमेठी से लोकसभा के लिए नामांकन भरा।
सीट बचाने के लिए मैदान में थे संजय सिंह
इसके पहले राजीव गांधी 1991 में हालांकि चुनाव जीत गए थे, लेकिन नतीजा आने से पहले ही उनकी मौत हो गई थी। इसके बाद हुए उपचुनाव में राजीव के वफादार और दोस्त सतीश शर्मा को कांग्रेस ने मैदान में उतारा। शर्मा जीतकर आए। 1996 में भी शर्मा अमेठी से चुने गए।
लेकिन 1998 के मध्यावधि चुनावों में सतीश शर्मा के खिलाफ भाजपा ने नेहरू गांधी परिवार के पुराने वफादार रहे अमेठी राजपरिवार के वारिस संजय सिंह को उतारा। संजय सिंह भाजपा में जा चुके थे।
सतीश शर्मा को हरा कर संजय सिंह ने पहली बार अमेठी सीट भाजपा की झोली में डाल दी।
सोनिया को देख लोग को याद आए राजीव
सोनिया गांधी ने जब 1999 के मध्यावधि चुनावों में अमेठी से चुनाव लडऩे का ऐलान किया तो एकबारगी लगा कि संजय सिंह अपनी सीट बदलकर सुल्तानपुर जा सकते हैं। लेकिन संजय सिंह ने सोनिया की चुनौती स्वीकार की और अमेठी से ही चुनाव लडऩे का फैसला किया।
हालांकि इन वर्षों में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस खासी कमजोर हो चुकी थी, लेकिन सोनिया केमैदान में आते ही अमेठी की तस्वीर बदल गई। कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश आ गया। अपने बेटे राहुल और प्रियंका के साथ सोनिया ने अमेठी के दौरे शुरु किए।
सोनिया की जनसभाओं में भीड़ उमडऩे लगी। हर सभा में सोनिया जब यह कहतीं कि अमेठी की इस माटी में मेरे स्वर्गीय पति के सपने और मेरी मांग का सिंदूर बिखरा हुआ है तो महिलाएं सिसकने लगतीं और बुजुर्गों की आंखे नम हो जातीं। युवाओं को राजीव याद आने लगते।
राजीव को नहीं भूली थी अमेठी की जनता
राजीव की खुशमिजाजी और मिलनसारिता लोग भूले नहीं थे। बल्कि राजीव के बाद अमेठी की उपेक्षा भी एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन गई। सोनिया के मैदान में आने से अमेठी वालों को अपना खोया वीआईपी दर्जा मिलने इलाके के रुके विकास रथ के आगे बढऩे की उम्मीद जग गई।
उधर, संजय सिंह के पीछे अमेठी राजपरिवार की ताकत, भाजपा के कार्यकर्ताओं और प्रदेश में भाजपा की सरकार का बल था। वह लोगों के बीच अमेठी की जनता और राजपरिवार के सदियों पुराने रिश्तों की दुहाई देकर वोट मांग रहे थे।
जनता के सामने दुविधा थी कि कल तक जो संजय सिंह नेहरू गांधी परिवार के वारिसों की जीत के लिए रात दिन एक करते थे आज वही इंदिरा गांधी की बहू और राजीव की पत्नी सोनिया को हराने के लिए हर दांव का सहारा ले रहे हैं।
सोनिया ने संजय को भारी अंतर से हराया
लेकिन अमेठी की जनता इस तरह के अनोखे मुकाबले पहले भी देख चुकी थी।
इसलिए लोगों को अपना फैसला लेने में कोई संकोच नहीं हुआ और मतदान के बाद जब नतीजा आया तो सोनिया गांधी संजय सिंह को भारी अंतर से हराकर चुनाव जीत गईं।
बाद में संजय सिंह ने कांग्रेस का दामन थामा और 2009 में वह सुल्तानपुर से सांसद बने। जहां से इस बार उनकी पत्नी मैदान में हैं।