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बेआबरू होकर भी कूचे से नहीं निकले...
विनोद वर्मा
Updated Wed, 12 Jun 2013 08:12 AM IST
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हर बारात में एक ऐसा व्यक्ति होता ही है, जो ऐन वक्त पर रूठ जाता है। फिर पूरा परिवार उसे मनाता रहता है। वो अक्सर आख़िर में मान जाता है।
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नरेंद्र मोदी की प्रतीकात्मक ताजपोशी में लालकृष्ण आडवाणी कुछ यूं ही रूठे। फिर मान भी गए। मानो वे मानने के लिए ही रूठे थे।
पार्टी ने गोवा के अपने सम्मेलन के पोस्टर में आडवाणी जी को जगह नहीं दी थी। फैसलों में उनकी इच्छाओं को भी जगह नहीं दी। आडवाणी को इसकी आशंका थी, इसलिए वे पहले ही बीमारी का बहाना बना चुके थे।
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गोवा का सम्मेलन ख़त्म होते-होते लालकृष्ण आडवाणी ठीक हो गए। उन्होंने पहले ब्लॉग लिखा, फिर इस्तीफ़ा।
इस्तीफ़ा भी रणनीति के तहत। वैराग्य जागा, लेकिन श्मशान वैराग्य की तरह आधा-अधूरा। उन पदों से इस्तीफ़ा दिया, जिनसे नरेंद्र मोदी और पार्टी का खेल बिगड़े। उन पदों से नहीं, जिनसे प्रधानमंत्री बनने का समीकरण बिगड़ जाए।
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पार्टी की सदस्यता, एनडीए की चेयरमैनी बचाए रखी। इतने बेआबरू होने के बाद कोई भी कूचे से निकल जाता। वो भी निकले, लेकिन फिर वापस भी आ गए।
आडवाणी जी इतिहास को बहुत याद करते हैं। उन्हें याद होगा कि पार्टी उनको दो बार और इसी तरह बेआबरू कर चुकी है। एक बार पाकिस्तान जाकर जिन्ना को 'सेक्यूलर' होने का ख़िताब देने पर। धर्मनिरपेक्ष नहीं, आडवाणी जी के शब्दों में कहें तो पंथ निरपेक्ष।
वर्ष 2005 में भी उन्होंने संघ की निंदा से नाराज़ होकर इस्तीफ़ा दे दिया था। चार दिनों तक इसी तरह मान मनौव्वल का खेल चला और उसके बाद उन्हें पद संभाले रखने के लिए मना लिया गया। बाद में पता चला कि वो अस्थाई था।
छह महीने बाद मुंबई में भाजपा के रजत जयंती समारोह के अंत में लालकृष्ण आडवाणी ने इस्तीफ़ा देकर पार्टी की कमान राजनाथ सिंह को सौंपी थी।
लोगों को याद होगा कि दिसंबर में किस तरह विशालकाय मंच पर रजत जयंती समारोह के बीच ये घोषणा करने के बजाय कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद नीचे दो कुर्सियां रखकर ये घोषणा की गई थी। जब सारे कार्यकर्ता जा चुके थे।
उसी शाम अटल बिहारी वाजपेयी ने मुंबई की रैली में प्रमोद महाजन को अपना लक्ष्मण घोषित किया था। आडवाणी जी उसी मंच पर बैठे थे। निर्विकार भाव से।
लेकिन वे फिर कूचे में लौटे। वर्ष 2009 में प्रधानमंत्री पद के लिए एनडीए के साझा उम्मीदवार बनकर। चुनाव हार गए ये और बात है, लेकिन आस तो ख़त्म होती नहीं।
मोदी को चुनाव प्रभारी बनाना भले ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार चुनने से कम हो, लेकिन आडवाणी जानते हैं कि ये कमान में तीर चढ़ाने जैसा है। इसलिए वे नाराज़ हो गए, इस्तीफ़ा दे दिया, मान मनौव्वल से मान भी गए।
इतने बेआबरू होने के बाद भी कूचे से नहीं निकले।
गर्भ में संभावना पल रही है, हो सकता है कि 2014 में प्रधानमंत्री का पद पैदा हो। तब चिंता कर लेंगे आबरू की।