{"_id":"cd2831085fd98ff7e7a8259e89c94df5","slug":"live-in-relationship-supreme-court-parliament","type":"story","status":"publish","title_hn":"'शादीशुदा के साथ लिव-इन पर मुआवजे का हक नहीं'","category":{"title":"India News Archives","title_hn":"इंडिया न्यूज़ आर्काइव","slug":"india-news-archives"}}
'शादीशुदा के साथ लिव-इन पर मुआवजे का हक नहीं'
अमर उजाला, दिल्ली
Updated Sat, 30 Nov 2013 01:41 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लिव-इन पार्टनरशिप शुरू करने से पहले पुरुष शादीशुदा है या नहीं, यह जिम्मा महिला का है।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर कोई महिला किसी शादीशुदा पुरुष के साथ लिव-इन में रहती है, तो घरेलू हिंसा अधिनियम लागू नहीं होता।
खास तौर से तब, जब महिला को उस पुरुष के वैवाहिक स्टेटस के बारे में जानकारी हो। किसी महिला और शादीशुदा पुरुष के बीच रिश्ते को 'शादी का रिश्ता' नहीं माना जा सकता।
घरेलू हिंसा एक्ट के तहत मैंटेनेंस नहीं मांग सकती
शादीशुदा पुरुष और अविवाहित महिला के बीच लिव-इन रिलेशनशिप की परिभाषा देने के बाद न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष की पीठ ने कहा कि अगर कोई विवाहित पुरुष ऐसे रिश्ते से बाहर निकलता है, तो महिला घरेलू हिंसा एक्ट के तहत मैंटेनेंस नहीं मांग सकती।
विज्ञापन
इसके उलट अदालत ने चेताया कि ऐसी महिला को हर्जाना मांगने वाला ऐसा मुकदमे का सामना कर पड़ सकता है कि उसने पुरुष की पत्नी और बच्चों को पति और बाप से प्यार से दूर कर दिया।
विज्ञापन
हालांकि, पीठ को इस बात की जानकारी भी है कि वैवाहिक पुरुष जब लिव-इन रिलेशनशिप से बाहर निकलता है, तो इसकी सामाजिक हकीकत क्या होती है।
'उपाय करे संसद'
ऐसी स्थिति में गरीब और अशिक्षित महिला को सबसे ज्यादा नुकसान होता है, इसलिए शीर्ष अदालत ने संसद से समुचित कानून के जरिए इस सिलसिले में कोई उपाय करने का आग्रह किया।
पीठ ने कहा है कि पुरुष के विवाहित होने की पक्की जानकारी के बावजूद उससे लिव-इन रिलेशन बनाने वाली महिला को घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत गुजारा-भत्ता नहीं दिया जा सकता।
अदालत ने यह आदेश एक महिला की ओर से दायर अपील पर जारी किया है जो लिव-इन-रिलेशनशिप में एक शादीशुदा व्यक्ति के साथ बंगलूरू में रह रही थी।
निचली अदालत और हाईकोर्ट ने उसे कोई भी राहत देने से इंकार कर दिया था और कहा था कि उसके संबंध की प्रकृति वैवाहिक नहीं है। जबकि महिला जानती थी कि वह ऐसे व्यक्ति के साथ रह रही है जो शादीशुदा है।
पीठ ने निचली अदालत के आदेश को जारी रखा है। लेकिन दूसरी ओर कहा है कि संसद ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए एक नया कानून लाने पर विचार करे।
इस आधार पर मानें लिव इन रिलेशन
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक किसी महिला और पुरुष के बीच संबंध की अवधि, घर और घरेलू जिम्मेदारियों के साझा करना, संसाधनों का मिलकर जुटाना, शारीरिक संबंध और बच्चे होना, समाज में आचरण को उनके लिव इन रिलेशन में होने या नहीं होने का आधार माना जा सकता है।