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जिंदगी बार डांसर कीः 'खत्म हुआ आठ साल का अंधेरा'
रवि बुले/मुंबई
Updated Thu, 18 Jul 2013 05:27 PM IST
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कोई बार डांसर अपना नाम सही नहीं बताना चाहती। पूछने वाला चाहे बार में आया ग्राहक हो या फिर मीडिया। पूजा (बदला हुआ नाम) भी ऐसा ही करती है।
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बात शुरू करते हुए वह भले ही कहती है कि बिंदास पूछो मैं बिंदास जवाब दूंगी। लेकिन बातों का सिलसिला शुरू होते ही उसकी आंखें नम हो जाती हैं। कहती है, 'ऐसा लग रहा है जैसे आठ साल का अंधेरा अब खत्म हुआ है।
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उम्र की ढलान की ओर बढ़ चुकी पूजा 1986-87 में नागपुर से मुंबई आई थी। उसके दादा और पिता यहां कपड़ा मिलों में काम करते थे। घर में गरीबी थी। वह भी मिल में लग गई। लेकिन जल्दी ही मिलों पर ताला लग गया और पूजा की जिंदगी ने कांटों भरा मोड़ ले लिया।
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'मकान और गहने तक बेचने पड़े'
वह कहती है, 'बाद में जहां-जहां काम मिला, वहां-वहां सेठ की नजरों से मैं समझ गई कि वह क्या चाहता है। तब मैंने खुद बार में काम करने का फैसला किया। उन दिनों बार उन लड़कियों की कमाई का ठीकठाक जरिया थे, जो छोटी-मोटी नौकरियां नहीं करना चाहती थीं।'
पूजा ने कहा, 'तब बार में लड़की के लिए ग्राहक से संबंध बनाना जरूरी नहीं था। अपना काम करो, पैसे लो और घर चलो। 'उसने कई बारों में काम किया। वर्षों तक ऐसा चला। उसकी शादी भी हुई। दो बच्चे भी। लेकिन बार डांस बंद होने के बाद पूजा के पति ने उसे छोड़ दिया।'
वह बताती है, 'मुझे लड़की का नाम स्कूल से कटा लेना पड़ा। मेरा लड़का सातवीं में पढ़ता है। पहले वह इंग्लिश मीडियम में जाता था, लेकिन बार में डांस बंद होने के बाद उसे मराठी स्कूल में भेजना पड़ा।'
डांस बार बंद होने के बाद पूजा को अपना मकान और गहने तक बेचने पड़े। वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद खुश है और इंतजार कर रही है कि राज्य सरकार फिर कब रेगुलेशन लाती है। डांस बारों के लाइसेंसों को नवीनीकरण करती है।
डांस बारों द्वारा अश्लीलता फैलाने के सवाल पर पूजा का तर्क है कि हम तो वही डांस करते हैं जो पर्दे पर हीरोइनें करती हैं। जब उनका डांस अश्लील नहीं होता तो हम पर पाबंदी क्यों? बार बंद करने वाले आरआर पाटिल के बारे में वह कहती है, 'रात को अब उन्हें नींद नहीं आने वाली।'
ऐसे शुरू हुए डांस बार
मुंबई अपनी आजाद ख्याल जिंदगी के लिए यूं तो शुरू से जाना जाता रहा है, लेकिन यहां डांस बारों की नींव 1970 की शुरुआत में पडऩे लगी थी। महाराष्ट्र के गरीब खेतीहर इलाकों से आने वाली युवतियों पर बार के कर्णधारों की नजर पड़ी और उन्होंने अपना व्यवसाय बढ़ाने के लिए इन युवा लड़कियों को अपने यहां शराब परोसने के लिए रखना शुरू किया। इसे 'वेटर सर्विस' नाम दिया गया।
तब ये युवतियां बार में साड़ी पहनकर काम करती थीं और इन्हें महीने बंधा हुआ वेतन दिया जाता था। ग्राहकों से मिलने वाली टिप्स तब इतनी नहीं होती थीं कि बार के मालिक उस पर नजर गड़ाएं या अपनी वेटरों को उसी भरोसे छोड़ दें।
धीरे-धीरे बदला बार का रंग
ये 'साइलेंट बार' थे। इस दशक बीच में धीरे-धीरे बार का रंग बदला और कुछ ने अपने यहां ऑर्केस्ट्रा सर्विस शुरू कर दी। जिसमें उन दिनों के हिट गीत कोई गायिका गाती थी। लेकिन जब फिल्मों में आइटम नंबर जैसे गाने आने लगे तो बारों ने अपने यहां गायिकाओं के साथ ऐसी लड़कियां भी रख लीं जो उत्तेजक कपड़े पहन कर नाच सकें।
बारों ने इन लड़कियों को भी वेतन पर रखा। गरीब, कम पढ़ी-लिखी लड़कियां इस तरफ तेजी से आकर्षित हुईं। बार मालिकों के इस फैसले ने मुंबई के बारों का रूप बदल दिया और वे धीरे-धीरे अपने नाच के लिए ही मशहूर होने लगे। अंतत: इन्हें 'डांस बार' के रूप में पहचान मिली और इनकी लोकप्रियता बढ़ती चली गई।
मुंबई के बाहर भी महाराष्ट्र में ऐसे बार खुलने लगे। 1984 में महाराष्ट्र में ऐसे पंजीकृत बारों की संख्या मात्र 24 थी, लेकिन एक दशक में इनकी संख्या 200 के ऊपर पहुंच गई। 2005 में इनकी संख्या 1500 के करीब पहुंच गई, इनमें से अकेले मुंबई में 700 बार थे।
बार सिंगर से बॉलीवुड तक
शगुफ्ता रफीक बॉलीवुड में ऐसा नाम है, जिसने मुंबई और दुबई के बारों से लेकर फिल्में लिखने तक का सफर तय किया है। एक समय उन्हें पारिवारिक स्थितियों की वजह से बार में गीत गाने पड़ते थे। लेकिन आज वह कामयाब शख्सयित हैं।
शगुफ्ता महेश भट्ट की खास फिल्मों की सबसे प्रमुख स्क्रिप्ट राइटर हैं। वो लम्हे (2006) से लेकर पिछले दिनों आई आशिकी-2 तक करीब एक दर्जन फिल्में लिख चुकी हैं। इन दिनों वह एक एक्शन थ्रिलर पर काम कर रही हैं, जिसका निर्देशन वह खुद करेंगी।