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नियामगिरी: अस्तित्व की लड़ाई लड़ते आदिवासी

Sat, 19 Apr 2014 12:21 PM IST
फ़ैसल मोहम्मद अली/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
फ़ैसल मोहम्मद अली/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली Updated Sat, 19 Apr 2014 12:21 PM IST
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नियामगिरी का ग़ुस्सा गया नहीं हैं। न ही डर। पिछले बरस ब्रितानी बहुराष्ट्रीय कंपनी वेदांता को ओडिशा की इन पहाड़ियों से बाहर तो वहां के डोंगरिया आदिवासियों ने कर दिया है, पर उनकी लड़ाई ख़त्म नहीं हुई है।

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दुनिया के सबसे क़ीमती बॉक्साइट भंडारों में से एक इन पहाड़ियों के नीचे दबा है और यहां के आदिवासी ज़िंदगी की बुनियादी चुनौतियों से लड़ने में ही लगे हैं। उनकी स्थानीय बोली को समझना उड़िया जानने वाले दुभाषियों के लिए भी आसान नहीं है। लेकिन उनके ख़ूबसूरत चेहरों पर आक्रोश, ग़ुस्सा और डर पढ़ने के लिए भाषा की ज़रूरत नहीं है।
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मैं गोर्था गांव की उस खंडहर होती इमारत के सामने खड़ा हूं, जहां स्कूल होना था, पर जहां ‘कोई मास्टर नहीं आया’ और जिसका इस्तेमाल इमली सुखाने के लिए होता है। जंगल है, हरा भरा है, पुराने पेड़ हैं, परिंदे हैं, जानवर हैं। पीने के पानी का पक्का इंतज़ाम नहीं है। बिजली के खंभे भी नहीं हैं।
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आजाद भारत का एक सच ये भी

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ये भारत जो 66 सालों से आज़ाद है, नियामगिरी के आदिवासी उस देश के नागरिक हैं। उनमें से एक बाडी पिड़िकाका कहते हैं, “हमें धमकी मिली है, हम छिप-छिपाकर रह रहे हैं। अगर पुलिस देख लेगी, तो पकड़कर जेल में बंद कर देगी।”

पर बाडी पिड़िकाका ने ऐसा क्या गुनाह किया है कि लंबे घुंघराले बालों वाले इस प्रौढ़ को प्रशासन ने निशाने पर लिया हुआ है? प्रशासन को आठ घरों वाले ट्राली गांव के मुखिया से आख़िर किस तरह का ख़तरा है?

जवाब भी वही देते हैं। दुभाषिया उनकी टूटी-फूटी उड़िया जितनी समझ पाता है, उसके मुताबिक़, “हम नियामगिरी सुरक्षा समिति में है। उनको लगता है कि हमको टारगेट करने से संघर्ष कमज़ोर पड़ेगा।”

डोंगरिया कोंध आदिवासियों की ज़ुबान कुई है। प्रदेश की राजभाषा उड़िया है जो इलाक़े के इक्का-दुक्का लोग ही समझ पाते हैं। अगर उस स्कूल में मास्टर आता, तो शायद हालात बेहतर होते।

‘सरकार आई तो टांग काट देंगे’

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मेरी नज़र गांव के ठीक पीछे मौजूद हरे, घने, लंबे और पुराने पेड़ों से पटी पहाड़ी पर जाती है, जिसके पीछे से नारंगी सूरज गर्दन उठा रहा है। डुंगर यानी पहाड़ों में रहने वाले आदिवासियों का कहना है कि वे जीने के लिए इन पर्वतों पर न सिर्फ़ आश्रित हैं बल्कि इन्हें वो अपना देव और पूर्वज मानते हैं इसलिए इसे खोदे जाने को किसी भी क़ीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे।

चाहे कंधे पर तेज़ धार की कुल्हाड़ी रखे 30-35 साल के कडकारा मांझी हों या मुश्किल से चल पा रहे बेहद कमज़ोर दिखने वाले तक़रीबन 70 के जोकेसेका कोलू, नियामगिरी को लेकर उनकी भावना में कोई अंतर नहीं दिखता। कडकारा मांझी कुल्हाड़ी दिखाते हुए ग़ुस्से में कहते हैं, “सरकार गांव में आएगी तो उसकी टांग काट देंगे।”

जोकेसेका कोलू को शायद टूटी-फूटी उड़िया बोलने में भी निहायत दिक्क़तों का सामना करना पड़ता है लेकिन वो इतना कहने से नहीं चूकते कि वो ‘पहाड़ नहीं देंगे।’

किसका नियामगिरी?

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इस ज़िद की क़ीमत डोंगरिया कोंध के ‘मंडोल जानी’ यानी सबसे बड़े सरदार लद्दो सिकोका और नियामगिरी सुरक्षा समिति के आदिवासी नेता लिंगराज आज़ाद को पुलिस प्रताड़ना और हवालात के रूप में चुकानी पड़ी है।

ओडिशा के दक्षिण पश्चिम ज़िलों कालाहांडी और रायगढ़ा में 250 किलोमीटर तक नियामगिरी पर्वतश्रृंखला फैली है। इसकी चोटी क़रीब 1500 मीटर की ऊंचाई पर है। यह इलाक़ा सैकड़ों झरनों और नालों से पटा है। दो बड़ी नदियां वंसधारा और नागावली का स्रोत भी यही पर्वत है। पर्वत पर 50 से ज़्यादा किस्म की जड़ी बूटियां, क़रीब 20 जंगली फूल और 10 जंगली अनाज उगते हैं।

डोंगरिया कोंध आदिवासियों की तीन जातियां यहां रहती हैं। इनकी ज़रूरतें जंगल से पूरी हो जाती हैं। खनन कंपनी वेदांता ने नियामगिरी पर्वत पर बॉक्साइट खनन के लिए सरकार से क़रार किया है, जिसका आदिवासी विरोध कर रहे हैं। बाडी पिड़िकाका का दावा है कि अभी भी पांच से आठ लोग पुलिस और प्रशासन के निशाने पर हैं।

भाषा की दूरी

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जंगली पेड़ की छाल से मूंजी रस्सी की चारपाइयों पर हम आमने-सामने बैठे हैं, लेकिन बाडी पिड़िकाका का रुख़ बात करते-करते धीरे-धीरे दुभाषिये की तरफ़ हो गया है। अपनी बात समझा पाने का और क्या तरीक़ा हो सकता है।

क्या सरकार और पुलिस नियामगिरी के आदिवासियों के साथ बात करने के लिए दुभाषिया ढूंढ पाई, जिसकी तरफ मुंह कर वे अपनी बात कहते और वह बात समझ ली जाती।

बाड़ी पिड़िकाका कहते हैं कि पिछले 60 सालों में जब उनके दादा और पिता जीवित थे तो इंदिरा गांधी से लेकर भारतीय जनता पार्टी और 'नोबीन' (नवीन पटनायक) सरकार आई, लेकिन किसी ने उनका ध्यान नहीं रखा है। गांव में बनी झोपड़ियों की तरफ़ इशारा करते हुए वो कहते हैं, “देखिए यह हमारा घर है, घास से बना हुआ। हम पूर्वजों के समय से ऐसे ही रहते आए हैं।”

दस मर्दों और 15 औरतों वाला गांव ट्राली या दूसरे डोंगरिया गांवों में भी फूस की दीवारों और टीन की छत वाली झोपड़ियां होती हैं। बिना खिड़कियों वाली। दरवाज़े इतने नीचे और छोटे कि घरों में तक़रीबन बैठकर जाना होता है। गांवों में बिजली के नाम पर कभी-कभी सौर ऊर्जा से चलते बल्ब दिख जाते हैं। ज़ाहिर है दूरसंचार दूर की बात है।

फल-फूलों की बहुतायत

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गांव में किसी नौजवान के पास जो मोबाइल सेट दिखते हैं उनका इस्तेमाल गाने सुनने के लिए किया जाता है। हैंडपंप मुश्किल से ही दिखता है। वरना पीने, खाना पकाने और नहाने के लिए पहाड़ों में बहते नालों और झरनों का सहारा होता है।

‘स्कूल नहीं होने की वजह से हम पढ़ नहीं पाए,’ आदिवासी नेता पास बैठी झाड़ू तैयार कर रही लड़की को देखकर कहते हैं। “अब कुछ-कुछ गांवों में स्कूल तो है, लेकिन मास्टर नहीं आता।” जंगली घास से तैयार होने वाली झाड़ू, टोकरियां, जंगल के फल और साग-सब्ज़ी आमदनी के छोटे-मोटे ज़रिये हैं।

इन पहाड़ियों में फलों-फूलों और साग-सब्ज़ियों की बहुत उम्दा क़िस्म पैदा होती हैं, लेकिन कोई सही बाज़ार न होने की वजह से आदिवासी इन्हें औने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर होते हैं। हालांकि बाद में यही चीज़ें शहरों में काफ़ी ऊंचे दामों पर बिकती हैं।

वेदांता से नाराजगी की वजह

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डोंगरिया आदिवासियों की मांग एकदम सही है। वेदांता को नियामगिरी पर खनन का काम नहीं करना चाहिए था। ना ही उन्हें वहां कारखाना लगाने की इज़ाजत मिलनी चाहिए थी।

सुप्रीम कोर्ट की एक समिति ने भी उनके कारखाने बनाने पर सवाल उठाए थे और ऐसा नहीं करने की अनुशंसा की थी। लेकिन सरकार ने कंपनी के पक्ष में फ़ैसला लिया था। जो उचित नहीं था।

ऐसी कंपनियां विकास के नाम पर इलाक़े के लोगों को नौकरियां देने का वादा करती हैं लेकिन वो आधी हक़ीक़त होते हैं। विकास के नाम पर आप स्थानीय लोगों के हक़ को नहीं छीन सकते। स्थानीय लोगों की पारंपरिक आजीविका की राह में किसी विकास को रोड़ा नहीं बनना चाहिए।

मुणिगुड़ा क़स्बे से पर्वतों की तरफ़ जा रही कच्ची सड़क पर हमसे मिले बुधगा सिकोका, जो लकड़ी बेचकर वापस जा रहे थे जिसके लिए उन्हें 50 रुपए मिले थे।

नक्सली मौजूदगी का असर

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कहा जाता है कि डोंगरिया कोंध हॉर्टिकल्चर यानी बागवानी विज्ञान के क्षेत्र में बहुत उन्नत हैं और इसे दूसरे इलाक़ों में भी अपनाया जाना चाहिए लेकिन बॉक्साइट खनन की योजना को लेकर अब पहाड़ियों पर ही ख़तरा मंडरा रहा है।

हालांकि खनन के काम पर सुप्रीम कोर्ट के हुक्म से रोक लगी हुई है लेकिन बाडी पिड़िकाका जैसे नेताओं का कहना है कि ‘जब तक वेदांता का कारख़ाना बंद करके यहां से हटाया नहीं जाता, नियामगिरी पहाड़ियों और उससे जुड़े डोंगरिया कोंध आदिवासियों पर ख़तरा बना रहेगा।’

आदिवासियों ने मार्च के आख़िरी सप्ताह में बैठक करके मांग की थी कि लांजीगढ़ में मौजूद वेदांता की फैक्ट्री को पूरी तरह से वहां से हटाया जाए।

एक मांग क्षेत्र में सुरक्षाबलों की गश्ती को बंद करने की भी है, जिसे लेकर आदिवासी नेताओं का आरोप है कि सुरक्षा बल नक्सलियों की तलाशी के नाम पर लोगों को परेशान करते हैं और हवालात में बंद कर देते हैं।

'क्यों दें वोट?'

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वो महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और उनकी फ़सलें तबाह करने का इल्ज़ाम भी सुरक्षाबलों पर लगाते हैं। जंगली क्षेत्र होने की वजह से माओवादी इलाक़े में मौजूद हैं और इसी कारण से सुरक्षाबलों की मौजूदगी और गश्त इलाक़े में बनी रहती है।

लद्दो सिकोका ने इसी बैठक में आरोप लगाया था कि सुरक्षाबलों ने आदिवासियों के बीच रहकर काम कर रहे तीन स्वंयसेवी कार्यकर्ताओं को बिना किसी आरोप के पकड़ लिया है।

बाडी पिड़िकाका का कहना है कि चुनाव की वजह से उन लोगों की ज़मानत तक होनी मुश्किल हो रही है। थोड़े झुंझलाए हुए स्वर में वो सवाल के अंदाज़ में हमसे कहते हैं, “सालों से वोट देने और सरकार बनाने से क्या मिला है हमको, फिर हम इस बात पर विचार करने लगे हैं कि क्यों दें हम वोट?"

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