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...और लालू प्रसाद को मिल गई मुंहमांगी मुराद!
अमर उजाला, नई दिल्ली, संजय मिश्र
Updated Sat, 07 Sep 2013 12:31 AM IST
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राज्यसभा के बाद लोकसभा ने भी संसद निरर्हता निवारण बिल पर मुहर लगा दी है। अब निचली अदालत से भी दो साल की सजा मिलने के बाद भी सांसदों-विधायकों की सदस्यता बनी रहेगी।
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बिल पारित होने से चारा घोटाले में घिरे राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद को मुंहमांगी मुराद मिल गई है। साथ ही कांग्रेस की उत्तर प्रदेश की तरह ही बिहार में दो-दो दलों को साधने की रणनीति सफल होती दिख रही है।
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हालांकि अंतिम समय में भाजपा की नानुकुर से एकबारगी कांग्रेस की रणनीति धराशाई होती दिख रही थी, लेकिन कांग्रेस और अन्य दलों के दबाव ने भाजपा को हामी भरने पर मजबूर कर दिया।
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उल्लेखनीय है कि बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट के निचली अदालत से भी दो साल या उससे अधिक सजा पर संसद और विधानसभा की सदस्यता रद्द होने के फैसले के खिलाफ सभी दल एकजुट हो गए थे।
सर्वदलीय बैठक में इस फैसले के खिलाफ संशोधन विधेयक लाने पर सहमति बन गई थी। मगर विधेयक पारित कराने संबंधी बेचैनी कांग्रेस में ज्यादा थी। दरअसल, 2014 के लिए कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा की तरह ही बिहार में राजद और जदयू को एक साथ साधने की रणनीति पर काम कर रही है।
चारा घोटाला मामले में लालू प्रसाद के खिलाफ चल रहे मुकदमे में इसी महीने फैसला आने वाला है। आशंका है कि इस फैसले के पहले शिकार लालू प्रसाद हो सकत हैं।
इसलिए दोनों पार्टियां अपनी-अपनी रणनीति को सफल बनाने के लिए किसी भी कीमत पर इसी सत्र में इस विधेयक को पारित कराना चाहती थी। दरअसल, कांग्रेस के रणनीतिकार मानते हैं कि साल 2014 के चुनाव में पार्टी की सीटों की संख्या घटनी तय है।
ऐसे में उत्तर प्रदेश की तरह बिहार में भी दो दलों का साथ सरकार बनाने की राह आसान करेगी। पार्टी मान कर चल रही है कि अगर चुनाव के बाद कांग्रेस को दोनों दलों की सहायता की जरूरत पड़ी तो सपा और बसपा की तरह राजद और जदयू को केंद्र में कांग्रेस का समर्थन करने में परेशानी नहीं होगी।
खासतौर पर बिहार में नई राजनीतिक परिस्थितियों में लालू के मजबूत होने से भी कांग्रेस इस विधेयक को पारित कराने को लेकर बेहद सतर्क थी।