शिवसेना स्थापना दिवसः जानें कैसे कांग्रेस ने की शिवसेना की मदद
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शिवसेना स्थापना की स्वर्ण जयंती मना रही है। 19 जून 1966 को मुंबई में संगठन की स्थापना की गई थी। पिछले पचास वर्षों में संगठन की राजनीति बाल ठाकरे ये उनके परिवार के इर्दगिर्द ही सिमटी रही है, इसलिए इसे उस परिवार की ही पार्टी मान लिया जाता है। हालांकि ऐसा नहीं है।
दरअसल शिवसेना की स्थापना में बाल ठाकरे के साथ ही पेशे से आर्किटेक्ट माधव देशपांडे की भी अहम भूमिका थी। एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में शिवसेना के निर्माण का विचार उन्हीं का था।
देशपांडे का मानना था कि उस समय की सत्तासीन पार्टी कांग्रेस मराठियों के हितों की अनेदेखी कर रही है, इसलिए उनका एकजुट होना बहुत जरूरी है। लेकिन
क्या वाकई शिवसेन के निर्माण का यही कारण था? सुजाता आनंदन की किताब 'हिंदू हृदय सम्राट' में इस बात की पड़ताल की गई है कि शिवसेना की स्थापना क्यों हुई। उस किताब के अंश आप भी पढ़िए, इसे स्क्रॉल डॉट इन ने अपनी वेबसाइट ने छापा है।
क्या मराठियों की अनदेखी के कारण बनी शिवसेना?
किताब के मुताबिक, देशपांडे ने कांग्रेस पार्टी द्वारा मराठियों की अनदेखी के विरोध में हिंदुओं को एकजुट करने के उद्देश्य से शिवसेना बनाई थी। बाल ठाकरे को इसे पार्टी का दर्जा दिलाने में दस साल का समय लग गया।
शिवसेना ने आपातकाल के समय में सरकारी कहर से बचने के लिए पार्टी के किसी कार्यकारी के नाम कागजात में दर्ज नहीं किया था। ठाकरे ने गिरफतारी से बचने के लिए बिना किसी पद के पार्टी के संचालन का फैसला लिया।
किताब की लेखिका को देशपांडे ने बताया कि यह वह दौर था जब कांग्रेस के आला नेता जैसे एसके पाटील कांग्रेस में प्रमोशन की आस में दिल्ली की ओर टकटकी लगाए बैठे थे और महाराष्ट्र की जनता को अनदेखा कर दिया था।
पांडे और उनके जैसे कई अन्य नेताओं का मानना था कि कांग्रेसी नेताओं को मराठियों से कुछ लेना देना नहीं है वह तो बंबई की बिजनेस कम्यूनिटी से फंडिंग के लिए रिश्ते बनाए हुए हैं। इसके चलते मराठियों के हितों का नुकसान हो रहा था। महाराष्ट्र की संस्कृति पर राष्ट्र हावी हो रहा था जिससे मराठियों में रोष था।
महाराष्ट्र में कम्यूनिस्ट नेताओं का कब्जा था। कई कांग्रेसी बिना नाम उजागर किए बाल ठाकरे और देशपांडे की तरह मराठियों के लिए कार्य कर रहे थे। इसे महाराष्ट्र के बिजनेसमैन ने ट्रेड यूनियन के कामगारों तक प्रसारित करने में काफी योगदान दिया जो आगे चलकर शिवसेना को मजबूत करने में कारगर साबित हुआ।
मराठियों की अनदेखी को कुछ लोगों ने नजरअंदाज नहीं किया जिनमें देशपांडे, बाल ठाकरे और एक बिजनेसमैन शामिल थे।
एकजुटता की मिसाल शिवसेना
इन तीनों ने तीन अन्य लोगों के साथ जिनमें देशपांडे के पार्टनर पदमाकर अधिकारी, श्याम देशमुख जो एक कारखाने में कार्य करते थे उन्होंने मराठी मजदूरों को शिवसेना से जोड़ने में बड़ा काम किया। साथ ही वसंत प्रधान जो कि रेलवे में काम करते थे, लेकिन बाद में वकालत करके मजदूरों का केस लड़ने लगे। उन्होंने एक संगठन बनाया ऊथ अनी एकजुट हो।
जब बाल ठाकरे ने शिवसेना बनाने का एलान किया तो उन्होंने मार्मिक में एक छोटा सा विज्ञापन जारी किया जो ज्यादा ध्यान अपनी ओर नहीं खींच सका। बाद में सभी दोस्तों की सलाह पर ऊथ अनी एकजुट हो संगठन को शिवसेना में मिला लिया गया।
ठाकरे की किताब मार्मिक का सर्कुलेशन सिर्फ 50000 था, जब देशपांडे ने ठाकरे से पूछा तो वह संतुष्ट नहीं हुए क्यों कि वह चाहते थे कि शिवसेना का एक स्ट्रक्चर हो सिर्फ एक किताब और एक आदमी के बल पर कार्य नहीं किया जा सकता।
इसके बाद शाखा प्रमुख और विभाग प्रमुख पद बनाए गए। इसी स्ट्रक्चर पर शिवसेना अबतक कार्य कर रही है और इसी ने 2012 के नगर पालिका चुनाव में पार्टी को हारने से बचाया था।
कांग्रेस ने भेजे नोटों के बैग
देशपांडे के अनुसार कांग्रेस के नेताओं ने शिवसेना के प्रभाव को कम करने के लिए और पार्टी के भीतर की जानकारी के लिए नोटों से भरा बैग भेजा था। जो कि कामगर साबित नहीं हुआ।
शिवसेना-कांग्रेस में जारी साझेदारी कुल मिलाकर कहा जाए तो कांग्रेस और शिवसेना के बिना महाराष्ट्र की कलपना करना कठिन सा प्रतीत होता है,क्यों कि दोनों ही समय-समय पर एक दूसरे के साथ देते दिखायी दिए हैं।
चाहे राष्ट्रपति चुनाव के दौरान मराठी मानुष के नाम पर प्रतिभा पाटिल का समर्थन हो या कांग्रेस सरकार के दौरान शिवसै निकों से बचना।