फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   kisan swabhiman rally in meerut.

'हम खंड-खंड हो गए, दिल्ली में पाखंड जा बैठा'

Mon, 13 Oct 2014 09:17 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, मेरठ
ब्यूरो/अमर उजाला, मेरठ Updated Mon, 13 Oct 2014 09:17 AM IST
विज्ञापन
kisan swabhiman rally in meerut.

मेरठ में किसान स्वाभिमान रैली में जदयू अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद यादव ने भाजपा ही नहीं, बल्कि अपने साथ बैठे दलों के नेताओं की भी जमकर क्लास लगाई। उन्होंने लोकसभा चुनाव में हुई रालोद की हार के लिए जनता को ही जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि अगर उस समय सोच लेते तो आज यह नौबत न आती।

विज्ञापन


शरद यादव ने कहा कि चौधरी चरण सिंह एक विचार है और विचार कभी मर नहीं सकता, न ही उसकी आवाज को कोई दबा सकता है। बड़े चौधरी देश के मजदूर, किसान, कामगार और दस्तकारों के मसीहा थे। इस दोआब में उनकी जड़ें हैं, किसान और मुसलमान उनकी दो भुजाएं थीं। लेकिन मुजफ्फरनगर में आप लोगों ने खुद इन भुजाओं को अलग कर दिया और कमजोर हो गए। आज जिस हालत में हम हैं, इसके लिए मैं और अजीत सिंह दोनों ही जिम्मेदार हैं। हम अलग हुए तो दूसरों को मजबूती मिली।
विज्ञापन


शरद यादव ने सीधे जनता से सवाल किया कि आप लोगों ने ऐसा कैसे होने दिया। मुजफ्फरनगर में जो कुछ हुआ, उसने गांधी और चरण सिंह के विचारों की मैयत निकाली है। हम खंड खंड होते गए और दिल्ली में पाखंड जा बैठा। चौधरी साहब की विरासत को मजबूत करना है तो उनके खंड खंड कुनबे को एक करना होगा। यदि धर्म के नाम पर कोई हाथ उठेगा तो उसे रोकेंगे, इंसानियत को मरने नहीं देंगे।
विज्ञापन
विज्ञापन


शरद यादव ने नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि चुनाव में जनता को बड़े-बड़े सपने दिखाये गये। युवाओं को रोजगार देने की बात कही गयी। इस देश का 80 प्रतिशत युवा किसान, दलित और आदिवासी है, कहां है इनके लिए नौकरी? पहला प्रधानमंत्री बोलता नहीं था और यह तो लगता है सोता भी नहीं है, बस बोलता ही रहता है। उन्होंने कहा कि 12 तुगलक रोड पूरे देश का है। 80 प्रतिशत लोग लुटियन जोन में किसान स्मारक चाहते हैं। चौधरी साहब की स्मृति में स्मारक निर्माण के लिए आरपार का संघर्ष होगा।

चौधरी परिवार के आगे कुछ नहीं संघ परिवार : केसी त्यागी

kisan swabhiman rally in meerut.

स्वाभिमान रैली में जदयू के महासचिव और राज्यसभा सदस्य केसी त्यागी ने कहा कि यदि चौधरी परिवार एक हुआ तो उसके आगे संघ परिवार की भी कोई बिसात नहीं होगी। आज हम इस जगह पर इसीलिए हैं, क्योंकि हम बिखर गए और दूसरे लोग इसका फायदा उठा ले गए।

केसी त्यागी ने चौधरी चरण सिंह की स्मृति में किसान स्मारक की मांग करते हुए सपा नेता और उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव से कहा कि मुरादनगर में पुलिस और किसानों के बीच संघर्ष में किसानों पर जो मुकदमे दर्ज हुए हैं, वे वापस लिए जाएं। इसके लिए उत्तर प्रदेश सरकार आदेश कर अपनी आहुति इस आंदोलन में दे सकती है। उन्होंने संघर्ष समिति से भी आह्वान किया कि इस आंदोलन को और ज्यादा बड़ा और प्रभावी बनाने के लिए साझा आंदोलन चलाया जाए, जिसकी कमान जदयू अध्यक्ष शरद यादव को सौंपी जाए।

अंग्रेजों के मुखबिर आज सरकार में हैं : नसीब पठान
कांग्रेस नेता और उत्तर प्रदेश विधानमंडल दल के नेता नसीब पठान ने कहा कि जिन लोगों ने देश की आजादी में अंग्रेजों के लिए मुखबिरी की, वही आज देश की सत्ता पर काबिज हैं। चौधरी चरण सिंह किसान और मजदूरों के मसीहा थे। उनकी स्मृति में बनने वाले स्मारक की लड़ाई में कांग्रेस पूरी तरह साथ है।

केंद्र को नहीं दिख रहा किसानों का दर्द : जयंत

kisan swabhiman rally in meerut.

रैली को संबोधित करते हुए जयंत चौधरी ने कहा कि देश के करोड़ों किसान चौधरी साहब से प्यार करते हैं। उनकी याद में स्मारक बनवाने यहां आए हैं। किसानों का वजूद बचाने के लिए ही उनके अनुयायी एक मंच पर बैठे हैं। केंद्र सरकार द्वारा चुनाव से पहले दिखाए गए सब्जबाग से आज किसान छला हुआ और अपमानित महसूस कर रहा है। घमंड और अहंकार में चूर केंद्र सरकार को किसानों का दर्द दिखाई नहीं दे रहा है।

जयंत ने किसानों से सीधा संवाद करते हुए पूछा कि मैं ठीक बोल रहा हूं? किसानों के हां कहने पर जयंत ने कहा कि ये वही सरकार है जिसके प्रधानमंत्री ने चुनाव से पूर्व फसल लागत पर 50 फीसदी मुनाफा देने की बात कही थी। कहा था कि स्वामीनाथन की रिपोर्ट लागू करेंगे। लेकिन क्या ये सब हो पाया है। सरकार डीजल पर भी डेढ़ रुपया प्रति लीटर कमा रही है। 108 दवाईयों को महंगा कर दिया गया है। कोठी से किसानों का सम्मान और स्वाभिमान जुड़ा हुआ था।

उन्होंने कहा कि जब वे छोटे थे तो देखते थे कि चौधरी साहब किसानों को डांट देते थे तो वे उनकी दादी के पास जाकर बैठ जाते थे। दादी सब ठीक करा देती थीं। जयंत ने कहा कि सरकार स्वच्छता अभियान चला रही है, यह अच्छा है लेकिन राजनीति भी तो स्वच्छ होनी चाहिए। आपकी ताकत के सामने सरकार की कोई ताकत नहीं, जो स्मारक बनने से रोक सके।

मेरठ रैली में उमड़ी भीड़

kisan swabhiman rally in meerut.

चुनाव में करारी शिकस्त के बावजूद मेरठ रैली में भारी भीड़ उमड़े तो किससे शिकायत की जाए। परिस्थिति से या फिर चुनाव पहले बनाई गई कमजोर रणनीतियों से। कुछ ऐसा ही नजारा रविवार को किसान स्वाभिमान रैली में दिखा। टीस सभी के मन में थी, जो शब्दों के जरिए निकलती रही।

नेताओं के जेहन में भी यह बात कौंधी कि जनाधार कम नहीं तो फिर कमी कहां रही? नतीजतन, मंच से आह्वान हुआ, संभलने का। पश्चाताप है तो प्रायश्चित करने का। बिखराव को जुड़ाव में तब्दील करने का। 23 दिसंबर को इसी मैदान में रालोद ने संकल्प रैली भी की थी। यही मंच था और भीड़ भी कम नहीं थी। अवसर था चौधरी चरण सिंह की जयंती का। इसके बहाने साधना था चुनावी समीकरण।

उस मंच पर भी शरद यादव जैसे बड़े चौधरी के अनुयायी मौजूद थे। खूब मशक्कत हुई, लेकिन वह भीड़ वोट बैंक में तब्दील नहीं हुई। ऐसे में सियासी सूरमाओं को कहना ही पड़ा कि इस दुर्गति के पीछे के कारण बड़े गहरे हैं। शरद यादव ने दो टूक शब्दों में छोटे चौधरी को आईना दिखाया। कहा कि आपने मुजफ्फनगर में मुसलमानों के साथ यह कैसे होने दिया? कहा कि वे चौधरी चरण सिंह के साथ मेरठ के माया त्यागी जैसे आंदोलनों में इस क्षेत्र से जुड़े रहे और यहां हिंदू-मुस्लिम सभी का प्यार मिला। उस प्यार को खो दिया। मुजफ्फरनगर दंगे ने सब खत्म कर दिया। हश्र यह हुआ कि सत्ता हाथ से चली गई।

'मोदी सरकार से अपमानित भीड़ यहां इकट्ठा हुई'

kisan swabhiman rally in meerut.

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी यही नसीहत दी। कहा कि वेस्ट यूपी में न जाने क्या-क्या हुआ। हम वहां बैठे बस यह देखते रहे कि चौधरी के गढ़ में ये क्या हो रहा है? सभी का इशारा सीधे तौर पर इस तरफ था कि बड़े चौधरी के नाम पर ही फिर से पूरा क्षेत्र एक जुट हो रहा है तो इसे सहेज कर रखना होगा। पहले भी उन्हीं का सहारा था और अब फिर से उन्हीं के सहारे नए राजनीतिक समीकरणों को जन्म दिया जा सकता है।

सांसद केसी त्यागी ने तो साफ साफ कह दिया कि जो गलतियां की हैं, उसका पश्चाताप सभी के दिलों में है। इसका प्रायश्चित तो करना ही होगा। रैली भले ही कोठी को स्मारक बनाने की मांग से जुड़ी हो, पर अप्रत्यक्ष तौर पर यह स्वीकार किया गया कि सियासी चूकों ने ही वेस्ट में भाजपा के सभी विरोधी दलों को रसातल में पहुंचा दिया। यहां तक कि अजित सिंह भी अपने छोटे से भाषण में यह कह गए कि यह मोदी सरकार से अपमानित भीड़ यहां इकट्ठा हुई है।

चर्चा रही कि अजित सिंह को वह नजारा भी शायद याद हो गया होगा, जब वे अपने चुनावी कॅरियर में पहली बार वर्ष-1998 में सोमपाल शास्त्री के हाथों पराजित हुए थे। उनकी हार के बाद बड़ौत में हुई रैली में भी सैलाब उमड़ा था। हालांकि, उस समय 13 माह बाद ही हुए चुनाव में फिर से अजित जीत गए थे, लेकिन इस बार सामने पूर्ण बहुमत की सरकार है। ऐसे में भविष्य का ताना-बाना राजनीतिक चातुर्य और समझदारी से बुनना होगा।

बाहरी नेताओं के सहारे चुनावी निशाना

kisan swabhiman rally in meerut.

विपक्ष के पांच धड़ों ने एक मंच पर साथ आकर केंद्र सरकार पर हमला बोला। इस अप्रत्यक्ष सियासी मंच से रालोद ने पश्चिम में अपनी ताकत दिखा दी। महत्वपूर्ण यह है कि जिन दूसरे राज्यों के नेताओं के सहारे यह लड़ाई छेड़ी गई है, वे पश्चिम में कितने प्रभावी होंगे। मंच के दोनों तरफ रालोद, कांग्रेस, जनता दल यूनाइटेड (जदयू), जनता दल सेक्युलर (जद-एस) और सपा के झंडे लगे थे। मतलब साफ कि पांच दलों की साझा रैली हो रही थी। रैली में जो लोग आए थे, वे बेलाग रूप से कहीं न कहीं रालोद से ही जुडे़ थे। इस दौरान स्मारक के साथ भाजपा ही सबके निशाने पर रही। हर किसी को कहीं न कहीं लोकसभा चुनाव में मिली हार चुभती नजर आ रही थी। वे जनता को उसकी उलाहना भी देते नजर आए।

बात अगर छिपे एजेंडे की करें तो वह है 2017 का विधानसभा चुनाव, जिसके लिए रालोद ने यह मंच सजाया था। ऐसे बाहरी नेताओं के सहारे जिनका पश्चिम तो दूर पूरे उत्तर प्रदेश में कोई जनाधार दूर-दूर तक नजर नहीं आता है। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा जद-एस के नेता हैं तो शरद यादव और नीतीश कुमार जद-यू के। इनके आने का ही प्रचार जमकर किया गया था। शरद यादव तो पिछले वर्ष 23 दिसंबर को हुई रालोद की रैली में भी आए थे। इनकी बात करें तो शरद और नीतीश का जादू सिर्फ बिहार तक सिमटा है और एचडी देवगौड़ा का प्रभाव दक्षिण में ही है।

दूसरी तरफ, इस रैली में कांग्रेस और सपा का भी प्रतिनिधित्व रहा। कांग्रेस की तरफ से कोई बड़ा नाम रैली में न आना खुद में चर्चा रहा। वजह यह कि चौधरी अजित सिंह कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में मंत्री रहे तो लोकसभा चुनाव भी साथ लड़ा। इस रैली में कांग्रेस का कोई राष्ट्रीय स्तर का नेता शामिल नहीं हुआ। सपा की तरफ से कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव जरूर आए। बेहतर होता कि खुद मुलायम सिंह मौजूद होते। हालांकि, नीतीश और शरद यादव ने जरूर शिवपाल यादव से अजित सिंह से हाथ मिलाने की बात कही।

ऐसे में कई राज्यों से आए नेताओं के साथ रालोद ने इस रैली में अपना प्रभाव दूसरे दलों पर तो छोड़ा, लेकिन वह अपने लिए इनसे कितना लाभ ले पाएगा यह देखना बाकी है। वजह यह कि आने वाले चुनाव में रालोद को भाजपा के खिलाफ कांग्रेस नहीं, बल्कि सपा या बसपा में से किसी एक से हाथ मिलाना होगा। बसपा की दूरी जहां इस मिलन को मुश्किल बना रही है तो सपा की चुप्पी अभी पूरी तरह से टूट नहीं रही है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed