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जानिए खुशवंत की जिंदगी की अनजानी बातें

Fri, 21 Mar 2014 09:28 AM IST
Updated Fri, 21 Mar 2014 09:28 AM IST
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khushwant singh close relation with kasauli

वर्ष 1947 में भारत और पाक के विभाजन के समय हिमाचल के कसौली से जुड़ी लेखनी की डोर महान लेखक खुशवंत सिंह ने अंत तक कायम रखी। वर्ष 1956 में प्रकाशित ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ उपन्यास का आइडिया उन्होंने विभाजन के समय पाकिस्तान से कसौली तक किए गए सफर से लिया। इसी रचना से उन्हें साहित्य में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम और ग्रोव प्रेस अवार्ड मिला।

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हिमाचल से उनके लगाव का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी पत्नी की अस्थियां कसौली स्थित घर के पेड़ों की जड़ों में डाल दी थी। खुशवंत की आखिरी पुस्तक ‘द गुड, द बैड एंड द रेडिक्युलस’ नाम से प्रकाशित हुई, जिसका विमोचन भी कसौली में हुआ।
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जब उन्होंने लिखना बंद किया था, तो अपने बेटे राहुल के हाथों संदेश भिजवाया कि अब वह कभी नहीं लिखेंगे।

'हमेशा जुड़े रहेंगे वो हिमाचल से'

khushwant singh close relation with kasauli

दिल्ली से उनके पुत्र राहुल सिंह ने फोन पर अमर उजाला से बातचीत में कहा ‌था कि हिमाचल को खुशवंत सिंह ने हमेशा अपना दूसरा घर माना था। यहां का सादा रहन-सहन, तीखा खाना, प्रदूषण रहित वातावरण और स्वच्छ विचारों वाले लोगों का प्रभाव जीवन के अंतिम पड़ाव तक उन पर रहा।

कसौली में मनाया जाता है लिटरेरी फेस्ट
राहुल ने राज्य वासियों को आश्वस्त किया कि खुशवंत सिंह का नाता हिमाचल से कभी भी खत्म नहीं होने दिया जाएगा। इसे मजूबत बनाने के लिए हर साल खुशवंत सिंह का लिटरेरी फेस्ट कसौली में मनाया जाता है। वर्ष 2015 में खुशवंत सिंह का लिटरेरी फेस्ट खास होगा, इसमें सदी के महान लेखक को श्रद्धांजलि दी जाएगी।

पाक से आए थे कसौली

khushwant singh close relation with kasauli

राहुल के मुताबिक 1947 में खुशवंत सिंह लाहौर हाईकोर्ट में वकालत कर रहे थे। विभाजन के बाद वह अपने परिवार के साथ समर काटेज कसौली में आ गए। कसौली जीप तक पहुंचे। जीप हथियारबंद सिक्खों से लदी थी, जो अपने परिवार को लेकर पलायन कर रहे थे। इस दौरान दंगों ने उन्हें झकझोर कर रख दिया। 'ट्रेन टू' पाकिस्तान में इन्हीं पहलुओं का जिक्र है।

राजविला और टन्नू हलवाई से रहा अनोखा नाता
कसौली में अपर मॉल स्थित राज विला में उनकी कोठी है। कई किताबें उन्होंने यहीं लिखीं। जिसमें 'आई शैल नॉट हियर द नाइटिंगेल', 'हिस्ट्री ऑफ सिक्ख्स' जैसी पुस्तकें शामिल हैं। खुशवंत के निधन के समाचार से कसौली में शोक की लहर है।

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टन्नू के गुलाब जामुन

khushwant singh close relation with kasauli

खुशवंत सिंह अंतिम बार 2008 में कसौली आए थे। उनके बेटे राहुल का कहना है कि जब भी वह आते तो टन्नू हलवाई के बंद-समोसा व गरमा गरम गुलाब जामुन जरूर खाते।

टन्नू के बंद-समोसा व गुलाब जामुन का जिक्र उन्होंने अपने लेख में भी किया था। खुशवंत सिंह आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन हिमाचल की धरा से जुड़ा उनका प्यार इस प्रदेश की वादियों को हमेशा महकाता रहेगा।

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