भाजपा के खिलाफ राजनीति की धुरी बन सकते हैं केजरीवाल
दिल्ली विधानसभा चुनाव में मोदी-शाह की जोड़ी को मात देकर अरविंद केजरीवाल ने खस्ताहाल कांग्रेस के इतर मजबूत विपक्ष के विकल्प की संभावनाओं का रास्ता खोल दिया है। आम आदमी पार्टी के संयोजक केजरीवाल इस वैकल्पिक राजनीति की धुरी साबित हो सकते हैं।
आगामी दिनों में भाजपा को टक्कर देने के लिए केजरीवाल के साथ नीतीश, ममता और नवीन जैसे नेताओं के गठबंधन की संभावनाओं को राजनीतिक विश्लेषक नकार नहीं रहे हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक भाजपा को रोकने के लिए केजरीवाल के साथ राजनीतिक साझेदारी का नया दांव चलने से परहेज नहीं करेंगे। इससे इन नेताओं को अपने राज्यों में भाजपा की राह रोकने के लिए मजबूत आवाज मिलेगी। इन नेताओं ने दिल्ली चुनाव के नतीजों के रुझान के दौरान ही केजरीवाल को बधाई देकर इसके संकेत भी दे दिए हैं। चुनाव से पहले ममता बनर्जी ने दिल्ली के लोगों से आम आदमी पार्टी (आप) को वोट देने की अपील की थी।
पश्चिम बंगाल, बिहार और ओडिशा में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अपनी जमीन तैयार करने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। दिल्ली में केजरीवाल ने भाजपा के तमाम शोरशराबे, संघ के मजबूत कार्यकर्ताओं के नेटवर्क और मजबूत प्रचार तंत्र को धता बताते हुए शानदार विजय हासिल कर यह साबित कर दिया है कि साफ सुथरी राजनीति के पैमाने पर भी वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह को कड़ी चुनौती दे सकते हैं। पिछली गलतियों से संभले आप के रणनीतिकार राजनीति की व्यवहारिकता को अब नजरअंदाज नहीं करेंगे। संभावना है कि कांग्रेस की खस्ता हालत के बाद भाजपा के सामने अकेले खड़े होने की गलती आम आदमी पार्टी दोबारा नहीं करेगी और समान विचारधारा वाली पार्टियों के साथ सहयोग की संभावनाओं पर गौर करेगी।
अन्ना ने ही खड़ा किया विकल्प की राजनीति का आधार
महज साढ़े चार साल ही तो हुए हैं, रामलीला मैदान में लाखों का हुजूम, हाथ में तिरंगा और हवा में गूंजते भारत माता के उद्घोष। यह उस बुजुर्ग का गैर राजनीतिक आंदोलन था जिसने देश भर में नई क्रांति का संचार पैदा किया था। खुद अन्ना हजारे ने भी यह नहीं सोचा होगा कि उनका यह आंदोलन आने वाले समय में देश की राजनीति को नया विकल्प देने जा रहा है।
सच्चाई यही है कि सरकार की चूलें हिलाने वाले इस आंदोलन का बिखराव राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को लेकर हुआ। अन्ना नहीं चाहते थे कि उनके आंदोलन से जुड़ा व्यक्ति सक्रिय राजनीति में प्रवेश करे, लेकिन अरविंद केजरीवाल ने राजनीति के रास्ते को ही अपनी मंजिल बनाया। भले ही दिल्ली की इस सबसे बड़ी जीत के नायक सिर्फ और सिर्फ केजरीवाल ही हैं, लेकिन उन्हें आज इस मुकाम पर खड़ा करने वाले अन्ना हजारे ही माने जा रहे हैं। सच्चाई यही है कि अन्ना की जगाई अलख ने देश की राजनीति में ऐसा दरवाजा खोल दिया है जो विकल्प का बड़ा आधार बन खड़ा हुआ है।
सिर्फ केजरीवाल ही नहीं बल्कि उन्हीं के आंदोलन की एक और सिपहसालार किरण बेदी ने भी सक्रिय राजनीति का दामन थामा। समय बदला रूठे अन्ना ने न सिर्फ अरविंद केजरीवाल को सराहा बल्कि बेदी को भी भाजपा की हार के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया। अन्ना ने केजरीवाल की जीत की प्रशंसा करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी आगाह किया। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस जनता ने उन्हें भारी बहुमत देकर संसद भेजा है उसी जनता को दोबारा बरगलाया नहीं जा सकता। इसी लिए जो वायदे उन्होंने जनता से किए हैं उन्हें पूरा करें।
दिल्ली के बाद मिशन 2019 पर रहेगी केजरीवाल की नजर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की पार्टी को अपनी आंधी में उड़ाने वाले अरविंद केजरीवाल का अगला चुनावी पड़ाव कहां होगा। इसे लेकर चर्चा का बाजार गर्म हो गया है। पार्टी के सामने राष्ट्रीय राजनीति में धमक कायम करने की चुनौती बढ़ गई है। मगर पिछली गलतियों से सबक लेते हुए अब पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इसे लेकर जल्दबाजी में नहीं दिख रहा है। पार्टी का एक वर्ग 2019 के अगले लोकसभा चुनाव में ही आप को राष्ट्रीय राजनीति में सिक्का जमाने की सलाह केजरीवाल को दे रहा है। ताकि दिल्ली में बेहतर काम करने के लिए केजरीवाल को समय मिले और पार्टी मजबूत हो सके।
इतनी बड़ी जीत के बाद पार्टी के नेता खुद को राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा करने की चुनौती तो स्वीकार कर रहे हैं, लेकिन बेवजह की बयानबाजी में पड़ने से परहेज कर रहे हैं। आप नेता योगेंद्र यादव से जब पूछा गया कि अब पार्टी क्या भाजपा को बिहार और उत्तर प्रदेश में भी चुनौती देगी तो यादव का कहना था कि पार्टी हाईकमान इसे लेकर अंतिम फैसला करेगा। बड़ी जीत के बाद पार्टी से लोगों को उम्मीद है। उसे पूरा करने की जिम्मेदारी पार्टी की है। आप के शीर्ष सूत्रों की माने तो केजरीवाल 2019 के लोकसभा चुनाव के जरिए ही राष्ट्रीय राजनीति में आगाज करने के विकल्प के खिलाफ नहीं हैं। कई नेताओं का तो यहां तक कहना है कि 2019 से पहले किसी भी विधानसभा चुनाव में पार्टी नहीं लड़ने का फैसला कर सकती है। लेकिन, पंजाब में पार्टी को ज्यादा उम्मीद है। इसलिए किसी भी निर्णय से पहले बैठकों का दौर चल सकता है।
पार्टी के एक नेता ने कहा कि दिल्ली से पहले हरियाणा में हुए चुनाव में आम आदमी पार्टी ने हिस्सा नहीं लेने का फैसला कर बिल्कुल ठीक किया, जिसका असर दिल्ली में आज देखने को मिला है। दिल्ली में पिछली बार केजरीवाल जब मुख्यमंत्री बने थे तो उन पर आरोप लगा था कि 49 दिन में वह सत्ता छोड़ कर खुद को राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा करने के लिए बनारस में मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने भाग गए थे। पार्टी के बड़े नेताओं की माने तो इस साल बिहार, असम तो अगले सालों में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड चुनाव में पार्टी चुनाव लड़ने पर फिलहाल नहीं सोच रही है, जबकि पंजाब में वह अगला विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए तैयार है।