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जरा जल्दी में है 'आम आदमी का नायक'

Sat, 22 Feb 2014 04:45 PM IST
विनीता वशिष्ठ
विनीता वशिष्ठ Updated Sat, 22 Feb 2014 04:45 PM IST
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Kejriwal, a real hero of indian politics

कोई उसे धरनों का शहंशाह कह रहा है और कोई अवसरवादी। लेकिन दिल्ली के साथ साथ देश की जनता की नजर में लोकपाल आंदोलन का ये शिल्पी एक नायक है।

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कुछ भी कहें लेकिन अरविंद केजरीवाल नाम के इस शख्स ने देश परंपरागत राजनीति को बुरी तरह से झिंझोड डाला है। महज एक दो साल के राजनीतिक अनुभव के बल पर केजरी ने अप्रत्याशित तौर पर देश की राजनति को प्रभावित किया है।
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केजरीवाल भारतीय राजनीति में एक धूमकेतु की तरह उभरे हैं। अरविंद ने जिस तेजी से राजनीतिक पटल पर अपनी जगह बनाई है, उसने बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों तक को अपनी नीति पर फिर से सोचने को मजबूर कर दिया है। हालांकि अन्तरराष्ट्रीय पटल पर केजरी की छवि एक अप्रभावी नेता के रूप में बनी है। विदेशी मीडिया केजरी को अवसरवादी और इतिहास में कमजोर होने के साथ साथ सवालों से भागने वाला भगोड़ा आंक रही है।
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लोकपाल आंदोलन का रचयिता या विश्वासघाती

Kejriwal, a real hero of indian politics

5 अप्रैल 2011 को अन्ना हजारे ने जब लोकपाल की मांग को लेकर आमरण अनशन किया तो अरविंद केजरीवाल को बहुत कम लोग जानते थे। जनता नहीं जानती थी कि आंदोलन दरअसल इंडिया अगेंस्ट करप्शन का है न कि अन्ना हजारे का। ये विडंबना ही रही लोकपाल आंदोलन का रचयिता ही उसका खलनायक समझ लिया गया।

दरअसल केजरी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता को जगाने का मन 2010 में बना लिया था। ये वो दौर था जब कॉमनवैल्थ खेलों को लेकर देशी और विदेशी मीडिया भारत की लानत मलानत कर रहा था।

दिल्ली का मिडिल क्लास इन खेलों के औचित्य पर सवाल खड़े कर रहा था। एक तरफ इन खेलों से किसी को कुछ मिलना नहीं। दूसरा इनके जरिए सरकार ने जमकर भ्रष्टाचार किया और ऊपर से अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को शर्मसार होना पड़ा। केजरी ने मिडिल क्लास की नब्ज को समझ लिया था और उन्हें राष्ट्रीय पटल तक पहुंचने के लिए बस एक मौके का इंतजार था।

एक तरफ जहां लोग मौके की तलाश में रहते हैं, अरविंद ने मौका बनाया। अरविंद ने लोकपाल के इसी प्रारूप को लेकर तमाम तरह के सूरमाओं से चर्चा की। रात रात भर लोकपाल के ड्राफ्ट पर मंथन चलता। दिन भर बिना नहाए ये शख्स लोकपाल की कापियों का गट्ठर लिए विशेषज्ञों से मुलाकातें करता। इनमें कानूनविद, समाजसेवियों के साथ साथ आर्थिक जगत के दिग्गज भी शामिल थे।

लोग साथ आते गए, कारवां बनता गया

Kejriwal, a real hero of indian politics

इसी मुहिम को मजबूती तब मिली जब किरण बेदी और संतोष हेगड़े जैसे लोग अरविंद के साथ आए। अरविंद की टीम ने संशोधित जनलोकपाल को अपने ही जैसे विचार वाले लोगों में बांटना शुरू किया। अच्छा प्रयास था और जाहिर तौर पर प्रतिक्रिया भी अच्छी ही मिली।

अरविंद की खुशकिस्मती रही कि 1968 में संसद में पहली बार लोकपाल का आइडिया रखने वाले पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण और उनके बेटे प्रशांत भूषण इंडिया अगेंस्ट करप्शन की महिम में शामिल थे। प्रशांत भूषण ने एक बार कहा था 'लोकपाल बिल तो बहुत पहले से था लेकिन अरविंद ने इसे एक बेहतर और प्रभावी जनलोकपाल में तब्दील कर दिया।'

दिसंबर 2011 में संशोधित लोकपाल का ड्राफ्ट मंजूरी के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास भेजा गया तो समूह के लोगों के साथ साथ अन्ना हजारे के भी इस पर हस्ताक्षर थे।

अन्ना के साथ ने भरा जोश

Kejriwal, a real hero of indian politics

सरकार की तरफ से कोई जवाब नहीं आया और फरवरी में किरन बेदी और केजरी महाराष्ट्र जाकर अन्ना से मिले। केजरीवाल अन्ना की सामाजिक प्रतिष्ठा को भली भांति पहचानते थे। केजरीवाल समझते थे कि अन्ना महाराष्ट्र के साथ साथ देश की जनता की नजर में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ने वाला जाना माना चेहरा है। केजरीवाल और किरन बेदी ने अन्ना से पूछा कि क्या वो लोकपाल ड्राफ्ट पर सरकार के जवाब को लेकर अनशन पर बैठ सकेंगे।
अन्ना ने महाराष्ट्र में अपने समर्थकों से पूछा - क्या लोकपाल के लिए मुझे अनशन करना चाहिए, जवाब हां में मिला।

केजरीवाल खुद बताते हैं  'रालेगण सिद्धी के संत यादव बाबा मंदिर के छोटे से कमरे में अन्ना और केजरीवाल ने तय किया कि अप्रैल माह में जंतर मंतर पर अन्ना आमरण अनशन शुरू करेंगे। केजरी ने तय किया कि अनशन वर्ल्ड कप के खत्म होने और आईपीएल के शुरू होने के बीच किसी दिन शुरू होगा।
ग्रुप का एक सदस्य याद करता है - अनशन का दिन सोच समझकर शनिवार रखा गया। केजरी जानते थे कि कामकाजी मिडिल क्लास वर्ग छुट्टी के दिन ही वहां आ सकता है। केजरी की सोच सच निकली और इन दो दिनों में भारी भीड़ ने आंदोलन को एक नई पहचान दी।

आंदोलन के शुरू के दिनों में अरविंद को काम करने के लिए कई वालंटियरों का तोहफा मिला। कई सेवानिवृत ब्यूरोक्रेट्स और पत्रकार भी इस आंदोलन में शामिल हुए। इसी दौरान केजरी को मनीष सिसौदिया का साथ मिला। आंदोलन के लिए बड़े बड़े बैनरों पर गांधी जी के साथ साथ अन्ना की तस्वीरें लगाई गई। ये केजरी की ही योजना थी कि अन्य सदस्यों की तस्वीरें बैनर और पोस्टरों पर न रखी जाएं।

और सच निकली केजरी की सोच

Kejriwal, a real hero of indian politics


कमान संभाली पर खो दिया आपा

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जनता के बीच संदेश पहुंचा कि गांधीवादी अन्ना लोकपाल के लिए आमरण अनशन करने जा रहे हैं। माहौल बन गया था और आंदोलन सफल था। मंच अन्ना संभाल लेते थे और बैक स्टेज पर केजरी काम कर रहे थे। मीडिया अटेंशन, पत्रकार वार्ता, नीति, सब कुछ देखना था और कहें तो केजरी ने अच्छी तरह से हैंडल कर रखा था।

सरल और सीधेसाधे अन्ना पत्रकारों के तीखे और गोल मोल टाइप के प्रेक्टिकल सवालों के जवाब नहीं दे पाते थे, लिहाजा उनके बगल में बैठकर केजरी अन्ना को मीडिया से भिड़ने के सूत्र बताते।

आंदोलन के दौरान मंच पर केजरी हमेशा अन्ना की बगल में देखे गए। कभी उनके कान में कुछ फुसफुसाते तो कभी उनके साथ छोटी छोटी पर्चियों का आदान प्रदान करते।

टीम के सदस्य भी मानते हैं कि केजरी ने कई मौकों पर आपा खो दिया। सभी नेताओं को चोर कहने वाले केजरीवाल जब बोल गए 'सभी जज भ्रष्टाचारी हैं,' तभी बगल में खड़े प्रशांत भूषण उनके कान में फुसफुसाए, 'सभी नहीं', तुरंत केजरी ने भूल सुधार की।

जनलोकपाल से दिल्ली की कुर्सी तक

Kejriwal, a real hero of indian politics
लोकपाल आंदोलन कब अन्ना आंदोलन में बदल गया, पता ही नहीं चला। केंद्र सरकार बिल पर रजामंदी और पारित कराने के वायदे के बीच लोकपाल की मुहिम और टीम अन्ना में बिखराव ला चुकी थी। सरकार के रवैये पर अन्ना की संतुष्टि और अरविंद की असंतुष्टि अब तक जारी है।

लोकपाल आंदोलन के दौरान अरविंद और अन्ना के बीच वैचारिक मतभेदों की बात अकारण ही नहीं उठने लगी थी। एक सफल होते आंदोलन को पलीता लगाने की कुछ लोगों की योजना सफल हो गई और अन्ना कुछ ही दिनों बाद रालेगण चले गए।

अरविंद केंद्र सरकार का कथित कपट जान चुके थे। लिहाजा सत्ता में आकर ही सत्ता से लोहा लेने की तैयारी हुई और इसका नतीजा सबके सामने है।

दो अक्तूबर 2012 को केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी का विधिवत गठन किया। अन्ना सदैव ही राजनीति में प्रवेश के खिलाफ रहे हैं और इसका असर देखने को मिला जब अन्ना ने आम आदमी पार्टी को अपना प्लेटफार्म इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं दी। अन्ना के साथ साथ किरन बेदी भी केजरीवाल की मिशन राजनीति का हिस्सा नहीं बनी।

विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित जीत का अकेला सेहरा केजरीवाल के सिर बांधा जाए, ऐसा खुद अरविंद भी नहीं चाहते। लेकिन अरविंद इतना जरूर जानते हैं कि आम आदमी पार्टी के लिए आगे का सफर बहुत कठिन होगा और नाकामियों का बोझ अकेले सिर पर उठाना मुमकिन नहीं।

मूंछें, मफलर और खांसी

Kejriwal, a real hero of indian politics

लोग मानते हैं कि केजरीवाल को स‌ुर्खियों में बने रहने का हुनर आता है। बड़े और रंगीन वादों के उलट अरविंद रोजमर्रा के मुद्दों की बात करते हैं।

अपने दोस्तों और बेचमेट्स की नजर में अन्तरमुर्खी केजरवाल प्रतिद्वंदियों की नजर में मुंहफट हैं। उनके बैच के जावेद अहमद खान की नजर में अरविंद बेहद शांत व्यक्ति है। वो ज्यादातर समय अपने कमरे में गुजारता था, लेकिन साथी अफसरों को अरविंद की ये बात पसंद नहीं थी। वो अपने ज्यादातर काम खुद करता था। यहां तक कि चपरासी को भी सबसे कम आवाज लगाने वालों में अरविंद शामिल था।

'भ्रष्टाचारी का मोबाइल पर स्टिंग कर लो, हम उसे जेल भेज देंगे' जैसे संवाद आम आदमी को उत्साहित कर देते हैं लेकिन दूसरी पार्टियों को ये छिछोरे लगते हैं।

जानने वाले कहते हैं कि केजरी जितना सामान्य और आम दिखते हैं, उतने हैं नहीं। दरअसल उनकी चैक वाली कमीज, नेवी ब्लू स्वेटर, मफलर और वैगनआर, सब उनके इमेज मैनेजिंग टीम की योजना है।

जानकार बताते हैं कि नीले रंग की वैगेनार ही उनकी पहचान नहीं हैं वो इतने मालदार तो हैं ही कि दूसरी गाड़ी ले सके। लेकिन ये गाड़ी उनकी आम छवि को बनाने में कारगर है सो इसी से घूम रहे हैं। एक सरकारी अधिकारी जिसकी बीवी भी सरकारी महकमे में अच्छे पद पर कायम है, अगर राजनीति में आए तो उसे ये हथकंडे अपनाने ही होंगे।

हां इतना जरूर है कि केजरी की खांसी जरूर 'आम ए जहान' हो गई है जो इलाज के बावजूद उनका साथ नहीं छोड़ रही है। ऐसे में जब एक एक करके केजरी के विधायक उनका साथ छोड़ रहे हैं केजरी की खांसी ज्यों की त्यों है और हर रैली और विधानसभा की कार्यवाही में जब तब उठ खड़ी होती है।

संभलो, राजनीति में जल्दबाजी अच्छी नहीं

Kejriwal, a real hero of indian politics

खुद केजरी की टीम के सदस्य मानते हैं कि केजरी हमेशा जल्दी में रहते हैं। उन्हें लगातार सलाह दी जाती है कि शांत रहकर सोचिए, जल्दबाजी मत कीजिए लेकिन केजरी उतावलेपन में कई बार बहक जाते हैं। इंडिया अगेंस्ट करप्शन के सदस्य शेखर सिंह बताते हैं कि केजरी हमेशा जल्दी में रहते हैं। 'वो (अरविंद) वही करते हैं जो उन्हें सही लगता है। कहीं न कहीं उन्हें अभी भी ये शंका है कि उनके आस पास के लोग उनके मिशन को गंभीरता से नहीं ले रहे।'

‌पहले जिस कांग्रेस को भ्रष्टाचारी कहा, बाद में उसी के समर्थन से सरकार बनाई (हालांकि राजनीतिक पंडितों की नजर में इसमें ‌कुछ अलग नहीं, सभी पार्टियां ऐसा करती हैं), पहले कहा - सरकार नहीं बनाएंगे, बाद में मोबाइल संदेशों के आधार पर सरकार बनाई, मुफ्त पानी और बिजली का पेंच से केजरीवाल की लोकप्रियता में पलीता लगा रहा है और साथ ही उनके समर्थकों को भी उनसे दूर कर रह है।

उन पर आरोप लगते हैं कि वीआईपी कल्चर और भ्रष्टाचार को खत्म करने का दावा करने वाले केजरी बाबू ‌डुप्लेक्स के लिए सिफारिशी चिट्ठी लिखते हैं और भूल जाते हैं। जनता दरबार लगाते हैं और खुद ही भाग खडे होते हैं। केजरी पर आरोप हैं कि उनका अपने मंत्रियों पर कोई कंट्रोल नहीं। उनके मंत्री मनमानी करते हैं और वो उनकी गलतियों को सही ठहराने के लिए धरना तक कर डालते हैं।

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