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कैसे बना था मशहूर गाना 'ऐ मेरे वतन के लोगों'..

Mon, 27 Jan 2014 12:21 PM IST
Updated Mon, 27 Jan 2014 12:21 PM IST
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लता मंगेशकर के गाए मशहूर गीत 'ऐ मेरे वतन के लोगों' का स्वर्ण जयंती समारोह आज मुंबई में मनाने की तैयारियां हो रही हैं।

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सबसे पहले लता मंगेशकर ने कवि प्रदीप के लिखे इस गाने को गाया था 27 जनवरी 1963 को भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के सामने।

लेकिन क्या आपको पता है इस गाने का जन्म कैसे हुआ था। 1990 के दशक में बीबीसी के नरेश कौशिक से हुई एक खास बातचीत में खुद कवि प्रदीप ने ये बात बताई। पढिए कवि प्रदीप के ही शब्दों में इस गीत के पैदा होने की कहानी।

कैसे बना गाना?

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1962 के भारत-चीन युद्ध में भारत की बुरी हार हुई थी। पूरे देश का मनोबल गिरा हुआ था। ऐसे में सबकी निगाहें फिल्म जगत और कवियों की तरफ जम गईं कि वे कैसे सबके उत्साह को बढाने का काम कर सकते हैं।

सरकार की तरफ से फिल्म जगत को कहा जाने लगा कि भई अब आप लोग ही कुछ करिए। कुछ ऐसी रचना करिए कि पूरे देश में एक बार फिर से जोश आ जाए और चीन से मिली हार के गम पर मरहम लगाया जा सके।

मुझे पता था कि ये काम फोकट का है। इसमें पैसा तो मिलना नहीं। तो मैं बचता रहा। लेकिन आखिर कब तक बचता। मैं लोगों की निगाह में आ गया। चूंकि मैंने पहले भी देशभक्ति के गाने लिखे थे इसलिए मुझसे कहा गया कि ऐसा ही एक गीत लिखा जाए।

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तीन महान आवाजें

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उस दौर में तीन महान आवाजें हुआ करती थीं। मोहम्मद रफी, मुकेश और लता मंगेशकर।

उसी दौरान नौशाद भाई ने तो मोहम्मद रफी से 'अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं', गीत गवा लिया, जो बाद में फिल्म 'लीडर' में इस्तेमाल हुआ।

राज साहब ने मुकेश से 'जिस देश में गंगा बहती है' गीत गवा लिया। तो इस तरह से रफी और मुकेश तो पहले ही रिजर्व हो गए।

अब बचीं लता बाई। उनकी मखमली आवाज में कोई जोशीला गाना फिट नहीं बैठता। ये बात मैं जानता था।

तो मैंने एक भावनात्मक गाना लिखने की सोची। इस तरह से 'ऐ मेरे वतन के लोगों' का जन्म हुआ। जिसे लता ने पंडित जी के सामने गाया और उनकी आंखों से भी आंसू छलक आए।

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'दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल'

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1952 में आई फिल्म 'जागृति' में कवि प्रदीप का लिखा गीत 'दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल' भी बडा मशहूर हुआ था। ये गाना महात्मा गांधी को समर्पित था।

कवि प्रदीप ने बीबीसी को बताया, "ये गाना तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को बडा पसंद आया था। उन्होंने मुझसे ये गाना कई बार सुना।"

कवि प्रदीप ने बताया कि वो शिक्षक थे और कविताएं भी लिखा करते थे। एक बार किसी काम के सिलसिले में उनका मुंबई जाना हुआ और वहां उन्होंने एक कवि सम्मेलन में हिस्सा लिया।

जब कविता बहुत पसंद आई

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वहां एक शख्स आया था जो उस वक्त बॉम्बे टॉकीज में काम करता था। उसे उनकी कविता बहुत पसंद आई और उसने ये बात बॉम्बे टॉकीज के मालिक हिमांशु राय को सुनाई।

उन्होंने फौरन कवि प्रदीप को बुलवाया और कुछ सुनाने को कहा।

प्रदीप ने कहा, "हिमांशु राय जी को मेरी रचनाएं बहुत पसंद आईं और उन्होंने मुझे फौरन 200 रुपए प्रति माह पर रख लिया जो उस वक्त एक बडी रकम हुआ करती थी।"

इस इंटरव्यू में कवि प्रदीप ने बताया था कि वो 90 के दशक के संगीत से बिल्कुल खुश नहीं थे और इस वजह से उन्होंने गाने लिखने बंद कर दिए थे। साल 1998 में कवि प्रदीप का निधन हो गया था।

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