वो, जो खुद 'मंदिर' को लेकर जाते हैं यजमान के घर
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खोजाराम और पप्पूराम अपने कंधे पर लाल कपड़े में लिपटे और सिमटे 'कांवड़' को लेकर गांव-गांव घूमते हैं।
'कांवड़' यानि वो जहां श्रद्धालु नहीं बल्कि मंदिर खुद चलकर जाता है इनके साथ श्रद्धालु के घर।
पश्चिमी राजस्थान के ये कांवड़िया भाट समुदाय से हैं, जहां कांवड़ बांचने या पढ़कर सुनाने की परंपरा करीब 400 साल पुरानी है।
लकड़ी की कांवड़ के एक-एक पट में बने चित्रों में होती हैं कई कहानियां। रामायण और महाभारत से लेकर राजा हरिश्चंद्र और मोरध्वज तक की।
श्रवण इनके आदरणीय हैं
कभी श्रवण कुमार ने कांवड़ में बैठाकर अपने माता-पिता को तीर्थयात्रा करवाई थी। ऐसा माना जाता है कि 'कांवड़' सुनने से तीर्थयात्रा जैसा ही पुण्य मिलता है। श्रवण इनके बहुत आदरणीय हैं।
जयपुर साहित्य उत्सव में भाग लेने आए 55 साल के खोजाराम ने बीबीसी को बताया कि वो लोग मानते हैं कि 'कांवड़' को कुंदन बाई नाम की एक ब्राह्मण महिला ने उनके समुदाय को उपहार में दी थी। कांवड़ में छिपी कहानियों की ही तरह कुंदन बाई का हर दिन नया जन्म होता है।
कांवड़ बनाने का काम राज्य के चित्तौड़ जिले के सुथार समुदाय के लोग करते हैं।
पप्पूराम कहते हैं कि साल में एक बार वो अपने यजमान के घर जरूर जाते हैं। उनके यजमानों में अधिकतर जाट, राजपूत और सुथार परिवार हैं। खुशी हो या गम उन्हें कांवड़ बांचने के लिए बुलाया जाता है। उनके पास कई कांवड़ हैं। हर एक का वजन है करीब पांच किलो।
'मोड़ी' भाषा में सुनाते हैं कांवड़ की कहानियां
कांवड़िए कांवड़ की कहानियों को 'मोड़ी' भाषा में सुनाते हैं, जिसमें कोई मात्रा नहीं होती है।
कांवड़ बांचने को अभी तक पुरुषों का काम समझा जाता था। लेकिन अब वो इन परंपराओं को तोड़ इस हुनर को अपनी बेटियों को भी सिखा रहे हैं।
खोजाराम कहते हैं टीवी और इंटरनेट के बावजूद लोग कांवड़ सुनते हैं। क्योंकि वे अपने साथ अपने यजमानों के पुरखों का इतिहास भी साथ लिए चलते हैं।
उनकी बही में सबका ब्योरा है और श्रवण कुमार का सन्देश है, 'मां-बाप की सेवा का' जो कभी पुराना नहीं होगा।