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क्या यह कश्मीर में चुनाव का सही वक़्त है?

Sun, 26 Oct 2014 05:12 PM IST
Updated Sun, 26 Oct 2014 05:12 PM IST
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kashmir election reactions

तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए और नेशनल कांफ्रेंस के कड़े विरोध को दरकिनार करके भारतीय चुनाव आयोग ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा के लिए पांच चरणों के चुनावों की तारीख़ का ऐलान कर दिया।

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सितंबर में आई बाढ़ ने जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर तबाही मचाई और राजधानी श्रीनगर को तो लगभग बर्बाद कर दिया। इसीलिए चुनाव करवाना बड़ी बहस का मुद्दा बनता जा रहा था।
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जम्मू-कश्मीर विधानसभा का छह साल का कार्यकाल 19 जनवरी को ख़त्म हो रहा है। बहस इस बात पर थी कि क्या ऐसी स्थिति में चुनाव करवाना सही होगा जब हज़ारों बाढ़ पीड़ितों के पास अब भी रहने का ठिकाना नहीं है।

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चुनाव का विरोध, चुनाव का समर्थन

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सिर्फ़ सत्तारूढ़ नेशनल कॉंफ्रेंस ही नहीं बल्कि कई नागरिक संगठन भी इस स्थिति में चुनाव करवाने के ख़िलाफ़ थे। नेशनल कांफ्रेस का कहना था कि चुनाव को फिलहाल टाल देना चाहिए ताकि राहत और पुनर्वास कार्यों पर ध्यान दिया जा सके।

हालांकि नेशनल कांफ्रेस की सहयोगी कांग्रेस समेत अन्य पार्टियां वक़्त पर चुनाव करवाने के हक़ में हैं। अब चूंकि चुनाव आयोग ने 25 नवंबर से 20 दिसंबर तक पांच चरणों में चुनाव करवाने की घोषणा कर दी है इसलिए बहस अब चुनाव संचालन और इसमें भाग लेने में बदल गई है।

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने संकेत दिए हैं कि चुनाव में हिस्सेदारी कम हो सकती है और कुछ लोगों का भी यही मानना है। हालांकि अन्य राजनीतिक दलों का मानना है कि बाढ़ और बाढ़ के बाद सरकार के 'असंतोषजनक' प्रदर्शन के चलते लोग बदलाव के लिए बड़ी संख्या में मतदान कर सकते हैं।

राष्ट्रपति शासन की मांग

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चुनाव का विरोध करने वाले अलगाववादी राजनीतिक दल चुनावों के बहिष्कार के अपने अभियान को गति दे सकते हैं। राहत और पुनर्वास कार्यों में देरी से लोगों में काफ़ी रोष है और अलगाववादी दल इसे भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे और कोशिश करेंगे की कम से कम लोग मतदान करने निकलें।

आश्चर्यजनक रूप से राष्ट्रपति शासन की मांग की जा रही है क्योंकि ज़्यादातर लोगों का मौजूदा व्यवस्था से विश्वास उठ गया है और उन्हें इस शासन के तहत राहत और पुनर्वास कार्यों पर भरोसा नहीं है।

कश्मीर पर नज़र रखने वालों को लगता है कि यह समय चुनाव के लिए बहुत अच्छा नहीं है क्योंकि इससे पहले ही त्रस्त जनता पर और बोझ पड़ेगा।

लेकिन वर्तमान सरकार की विफलता को देखते हुए इस स्थिति में चुनाव करवाना एक 'अनिवार्य बोझ' बन गया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ज़्यादा 'लोगों के अनुकूल' सरकार आ सके जो पुनर्वास प्रक्रिया को ज़्यादा बेहतर ढंग से और पारदर्शी ढंग से निपटा सके।

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