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नौकरी में दलित आरक्षण के बहुत पक्षधर नहीं थे कांशीराम

Fri, 15 Mar 2013 03:47 PM IST
विजय जैन
विजय जैन Updated Fri, 15 Mar 2013 03:47 PM IST
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kanhsi ram was not in fevor of dalit reservations in job
बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम सरकारी नौकरी में दलितों के आरक्षण के बहुत पक्षधर नहीं थे। वह कहते थे कि दलित आरक्षण लेने वाली जातीय समूह की जगह आरक्षण देने वाले जातीय समूह में तब्दील हो। वह दलितों में एक जाति विशेष को ब्राह्मण के बाद सबसे ज्यादा शिक्षित जाति मानते थे।
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गौर करने वाली बात यह रही कि कांशीराम ने बाबा साहेब अंबेडकर के जन्मदिवस 14 अप्रैल, 1984 पर बसपा का गठन किया। वहीं, मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव ने उसी दिन मुख्यमंत्री पद की शपथ ली जिस दिन कांशीराम का जन्म दिन था।
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15 मार्च, 1934 को पंजाब के रोपड़ जिले के ख्वासपुर गांव में दलित (सिख समुदाय के रैदसिया) परिवार में जन्मे कांशीराम बहुजन शब्द का आज जन्मदिन है। कांशीराम हमेशा यह कहते थे कि हमेशा किसी भी तरह सत्ता के करीब रहना चाहिये क्योंकि सत्ता ही चाबियों की चाबी है जिससे सभी ताले खुल जाते हैं।
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वे कहते थे 'जब हम इस गैर बराबरी वाले समाज को ध्वस्त कर एक नए समाज की स्थापना के लिए संघर्ष की बात करते है तो हमें विकल्प भी प्रस्तुत करना होगा और यह विकल्प राजनीतिक सत्ता को हासिल किये बगैर संभव नहीं है'। उनका ये भी कहना था कि 'राजनीति सत्ता के लिए होती है और सत्ता बिना संघर्ष के नहीं मिलती'। 'जिस समाज की राजनीतिक जड़े मजबूत नहीं होती, उस समाज की राजनीति कभी कामयाब नहीं होती'

कांशीराम चाहते थे कि अधिक से अधिक महिलाएं राजनीति में आएं। वह कहते थे कि मैं चाहता हूं कि एक नहीं, कई मायावती राजनीति में आएं। वह चाहते थे कि भारत के हर राज्य में मायावती की तरह दलित समूह की महिलाएं उभरें व आगे बढ़ने की अपनी जमीन तैयार करें। भारतीय राजनीति में महिलाओं की इसी भागीदारी के दर्शन के तहत कांग्रेस का विरोधी होने के बावजूद वह सोनिया गांधी की कभी-कभी तारीफ भी करने लगे थे।

राजनीति में आने का रोचक प्रसंग
उन दिनों वे पूना में एक्स प्लोसिव रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेट्री ( ईआरडीएल) में अनुसन्धान सहायक के पद पर नौकरी कर रहे थे। इस दौरान ईआरडीएल मैनेजमेंट ने बुद्ध जयंती व अम्बेडकर जयंती के अवकाश को निरस्त करने का निर्णय ले लिया। इसका विरोध करने वाले वहीं के एक कर्मचारी को नौकरी से निलंबित कर दिया गया।

कांशीराम ने उस निलंबित कर्मचारी की मदद करते हुए न्यायालय में इसके विरोध में वाद दायर कर दिया। न्यायालय ने न्याय करते हुए निलंबित कर्मचारी के निलंबन को रद्द करने के साथ साथ बुद्ध व अम्बेडकर जयंती दोनों के अवकाश को बहाल कर दिया।

उसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और संकल्प लिया कि “मैं कभी शादी नहीं करूँगा और ना ही किसी प्रकार की कोई व्यक्तिगत संपत्ति अर्जित करूँगा।” कांशीराम जी ने बहुजन समाज के हित के लिए घर-बार, मां-बाप, सबका मोह छोड़ दिया। इनके किए प्रयासों की बदौलत ही बसपा उत्तरप्रदेश में प्रमुख पार्टी बनकर उभरी।


भले ही आज उनकी मूर्तियां बन गई हों, उनके नाम पर पार्क बन गए हों, पर भारतीय राजनीति में जो सम्मान उन्हें मिलना चाहिए था, वह उन्हें नहीं मिल पाया है। जाति के विरुद्ध लड़ाई, मनुवाद के खिलाफ संघर्ष, दलित अस्मिता की व्याख्या, दलितों को स्वाभिमान दिलाने के रास्तों के संदर्भ में उन्होंने कई नई और मौलिक राह बनाईं, जिन्हें अभी रेखांकित किया जाना व महत्व मिलना बाकी है।
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